
श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
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अद्भुत सौंदर्य
उतरा था
धरा पर एक
रात हमने देखा,
जहाँ मौन था किंतु
शब्द बोल रहे थे,
प्रकृति की सुन्दरता
भिन्न-भिन्न रूप रंग में
अपनी छटा
बिखेर रही थी ,
तारे भी इस मनमोहक
छवि को निहार रहे थे,
शांत निस्सीम क्लांत रात
गौशाला की रात थी !!
तभी एक शब्द कानो में पड़ा
गौ माता पुकार रही थीं,
कह रही थीं सो जाओ
बहुत रात हो चुकी है ,
उनकी आवाज सुन बत्तखों ने
गान शुरू कर दिया ,
बाकी पक्षी भी सुर ताल में
गीत गुनगुनाने लगे !
कुछ जीव सूकून की
नींद सो रहे थे कुछ
विचरण कर रहे थे,
मंद-मंद मलय
उनको सहला रही थी !
अचानक सूकून की
तंत्रा भंग हुई,
कोई जीव करूण
गुहार लगा रहा था,
वो दर्द में था
उसके साथ बहुत से जीव
जो असहाय थे नेत्रहीन थे,
जो हड्डी हड्डी हो चुके थे
वो भी जाग रहे थे !
उनकी तकलीफें
कम करने का
प्रयास हो रहा था
उनको प्यार का मरहम
लगाया जा रहा था!
मौन ओढ़े रात की
आंखें नम थी
हमसे सवाल कर रही थी,
प्रकृति की अनमोल
धरोहर हैं ये
क्यूँ मानव इनपर इतना
अत्याचार करते हैं,
स्वयं के लिए नर्क के द्वार खोलते हैं
अखिर क्या गुनाह है इनका??
कितना मुश्किल था ये समझना
जहा सबका जीवन इस रात मे
स्वप्नलोक में विचरण कर रहा था,
वहीँ इस धरती के कोने कोने मे
मासूम जीवन पीड़ा से तड़प रहे थे,
इनकी पीड़ा की आवाज इतनी
गहरी थी कि शब्द शिथिल पड़ रहे थे!
फिर भी एक चैन था क्युकी
यहां जीव सेवा का प्रण था,
जीवों की मुस्कान का
दृढ़ संकल्प था ,
जो निरन्तर चलायमान था
और रहेगा!
मेरी आत्मा भी परमात्मा से
पुकार कर रही थी
क्यों नहीं इनका जीवन
हम जैसों सा स्वस्थ्य बनाते
तुम तो पशुओं के नाथ हो
पशुपतिनाथ कहलाते!!
परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी
जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी
शिक्षा : एम. ए., एम.फिल – समाजशास्त्र, पी.जी.डिप्लोमा (मानवाधिकार)
निवासी : लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा “जीवदया अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४” से सम्मानित
विशेष : साहित्यिक पुस्तकें पढ़ने के शौक ने लेखन की प्रेरणा दी और विगत ६-७ वर्षों से अपनी रचनाधर्मिता में संलग्न हैं।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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