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आश्वासन पुराण

डॉ. मुकेश ‘असीमित’
गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
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सभा-मण्डप में धूप के छिन्न-भिन्न कण थिरक रहे थे। मध्य आसन पर विराजित महामुनि ने दीर्घ श्वास लेकर अपनी दृष्टि उस नवदीक्षित राजकुमार पर स्थिर की, जो राजनीति के रणक्षेत्र में प्रविष्ट होने के लिए अभिमन्यु- सा उत्साह लेकर आया था। राजकुमार ने करबद्ध होकर निवेदन किया “गुरुदेव, राजनीति का मार्ग कठोर और दुर्गम कहा गया है। कृपा कर वह दिव्य अस्त्र बताइए जिसके बल पर जनमानस जीता जा सके और सिंहासन की अक्षुण प्राप्ति हो।” मुनि के अधरों पर मंद मुस्कान उदित हुई; बोले- “वत्स, राजनीति में न शस्त्र काम आता है, न शास्त्र का गहन अध्ययन। यहाँ एक ही महामंत्र है आश्वासन। यही वह अदृश्य अस्त्र है जिसके बल पर राजसिंहासन डोलता भी है और टिका भी रहता है।”
मुनि का स्वर गंभीर हुआ, “लोकतंत्र की भूमि में जो सबसे हरी-भरी फसल उपजती है, वह न धान है न जौ- वह आश्वासन है। यह ऐसा बीज है जो कभी न सड़ता, कभी न मुरझाता। इसे केवल चुनावी मौसम की हल्की-सी फुहार चाहिए और यह स्वयं अंकुरित होकर जनमानस को लहलहा देती है। नेता इसे बोते हैं, जनता भ्रम रूपी जल से सींचती है, और पाँच वर्ष में यह फसल फिर तैयार हो जाती है।” मुनि ने दण्डिका भूमि पर टिका कर गंभीर स्वर में कहा कि राजनीति का मार्ग साधारण जप-तप से नहीं, बल्कि मंच पर चढ़ते ही अपने आपको मदारी बना लेने की कला से चलता है। जैसे पुराणों में नारद वीणा बजाकर लोकों को आंदोलित कर देते थे, वैसे ही तुम्हें चुनावी मंच पर पहुँचते ही एक हाथ में डमरू और दूसरे में आश्वासनों की पोटली थामनी होगी। ज्यों ही डमरू की ध्वनि- ‘धिन-धिन-धिन्ना’- आकाश में गूँजेगी, पोटली को फाड़कर वायदों की कठपुतलियाँ बाहर निकल आएँगी। कोई शिक्षा का वरदान बाँटेगी, कोई स्वास्थ्य का, कोई रोजगार का, कोई अच्छे दिनों का। वे सब उछलेंगी, नाचेंगी, अभिनय करेंगी, और जनता मोहित हो ताली बजाती रहेगी, मानो मोक्ष का द्वार खुल गया हो। जब प्रदर्शन समाप्त हो जाएगा, कठपुतलियाँ चुपचाप वापस पोटली में लौट जाएँगी, डमरू शांत हो जाएगा, और तुम रथ पर आरूढ़ होकर आगे बढ़ जाना।
मुनि के स्वर में हल्की करुणा झलकी- “जनता भी क्या करे वत्स, वह भी आश्वासन की घुट्टी के बिना जीवित नहीं रह सकती। नेता उसे स्वर्ग धरती पर लाने का आश्वासन देते हैं, बाबा उसे मरणोपरांत स्वर्ग भेजने का, विज्ञापन उद्योग उसे गोरा, लंबा, बलवान और भाग्यशाली बनाने का। आश्वासन का जाल सर्वत्र व्याप्त है; उसी में संसार भ्रम-मंडल की भाँति घूम रहा है। जनता डुबकी लगाती है और हर बार सोचती है कि इस बार शायद मोती मिले।”
राजकुमार विस्मय से भरकर बोला- “गुरुदेव, पर जो वचन पूरे नहीं होते उनका क्या?”
मुनि ने आँखें मूँदकर उत्तर दिया- “वत्स, आश्वासन न सत्य है न असत्य। यह दोनों के मध्य स्थित एक दिव्यमायातत्त्व है। न इसे पूरा करने की बाध्यता है, न निभाने का कर्तव्य। यह केवल स्थिति को टालने का माध्यम है।जब जनता पूछे- ‘हे नेता, वादा कब पूरा होगा?’ तब शांतचित्त कह देना ‘यथासमय।’ ‘यथासमय’- राजनीति का सर्वाधिक चमत्कारी शब्द। इसका कोई काल नहीं, कोई सीमा नहीं, और जनता इसे प्रश्नविहीन स्वीकार कर लेगी ।” विजय उसी की होती है जो आश्वासन के तंतु से गठबंधन की रस्सियाँ बुनना जानता हो। एक दल को आश्वासन, दूसरे दल को प्रतिज्ञान, तीसरे को परोक्ष वचन- इसी प्रकार सरकार रची- बुनी जाती है। राजा सिंहासन पर बैठते ही प्रथम आश्वासन मंत्रिमण्डल को देता है, फिर अपने गणों को, और सबसे अंतिम में जनता को। यही परंपरा है, यही शाश्वत धर्म।”

मुनि ने आगे कहा- “यदि कभी राज्य में राजनीतिक विद्यापीठ खुलें, तो उनमें ‘आश्वासन शास्त्र’ अवश्य पढ़ाया जाएगा। उसमें वादे बुनने की कला, उसे हवा में उड़ाने की नीति, घोषणाओं का रहस्य, जनमोहन मंत्र- सब पढ़ाया जाएगा। बिना इस विद्याविधान के कोई भी नेता परिपूर्ण नहीं हो सकता।”
मुनि ने दण्डिका सँभालकर गहरी साँस ली और धीमे, ठहराव भरे स्वर में बोले- “वत्स, इस लोक में न सेवा चिरस्थायी है, न विकास अचल, न वचन अक्षय। इस शासन–जगत में एक ही तत्व अमृततुल्य है- आश्वासन। यही वह सोने के वरक है जो हर चुनावी व्यंजन के ऊपर लपेटकर उसे उदरस्थ योग्य बनाती है । यही वह अदृश्य रेशमी डोरी है जो नेता और जनता को बाँधे रखती है । इसी के सहारे कुर्सी स्थिर रहती है, इसी से राजसत्ता अंकुरित होकर शाखाएँ फैलाती है।
अतः, वत्स, अब उठो। आश्वासन-पोटली कंधे पर बाँधो, डमरू का स्वर जगाओ, और मंच पर उतरकर अपनी कठपुतलियों को नचाओ। क्योंकि राजनीति के इस महालोक में यदि कोई तत्व परम–सत्य है, तो वह आश्वासन ही है- शेष सब तो क्षणभंगुर माया का जाल मात्र।”

परिचय :-  डॉ. मुकेश ‘असीमित’
निवासी : गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
व्यवसाय : अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ
लेखन रुचि : कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं
प्रकाशन : शीघ्र ही प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से), काव्य कुम्भ (साझा संकलन) नीलम पब्लिकेशन, काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन) लायंस पब्लिकेशन।
प्रकाशनाधीन : व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन)  किताबगंज   प्रकाशन,  गिरने में क्या हर्ज है -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह) भावना प्रकाशन। देश विदेश के जाने माने दैनिकी, साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित 
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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