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खुदा ही खुदा है

डॉ. मुकेश ‘असीमित’
गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
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खुदा की तलाश किसे नहीं? जिसे भी हो, वह हमारे शहर,गड्डापुर, आ जाए। यहाँ तलाश शर्तिया पूरी होगी। गारंटी वैसी ही, जैसी दाद-खाज, खुजली, भगंदर, नपुंसकता और खोया प्यार लौटाने वाले विज्ञापन देते हैं। गड्डापुर में खुदा मंदिर-मस्जिद में कम, गली-सड़क पर अधिक मिलता है। फर्क इतना है कि यहाँ खुदा दिखता
नहीं, पैर पड़ते ही महसूस होता है। कहीं सीवर लाइन का खुदा, कहीं अमृत जलधारा का खुदा, कहीं बिजली विभाग का खुदा, तो कहीं नगर परिषद का सर्वधर्म समभाव वाला खुदा। पूरा शहर खुदामय है।
विकास और खुदाई का चोली-दामन का साथ है। जहाँ विकास आएगा, वहाँ पहले धरती का सीना खुलेगा। पुल बनेंगे, सड़कें बनेंगी, टावर खड़े होंगे, स्टेशन अमृतमय होगा, तो खुदाई अनिवार्य है। रेलवे का ‘अमृत स्टेशन’ प्रोजेक्ट आया तो हमारे स्टेशन ने सचमुच अमृतकाल का दर्शन करा दिया, चारों ओर मलबे के पर्वत और भीमकाय गड्ढे। एक गड्ढा पाटा नहीं जाता कि दूसरा श्रद्धापूर्वक खोद दिया जाता है, ताकि विकास की अखंड
ज्योति बुझने न पाए।
कहते हैं, गड्ढे जितने गहरे, विकास उतना गहन। बारिश में ये गड्ढे साधारण गड्ढे नहीं रहते, विकास-सरिताएँ बन जाते हैं। आदमी, जानवर, वाहन, सब इसमें डुबकी लगाते हैं। कई तो ऐसी पवित्र डुबकी लगाते हैं कि सीधे भवसागर पार करने की संभावना बन जाती है। शायद पुराणकारों ने भवसागर की कल्पना हमारे नगर-नियोजन को देखकर ही की होगी। हमारे यहाँ विकास पानी की तरह बहता है, कभी सड़क पर, कभी नाली में, कभी लोगों के सिर के ऊपर से। विकास लाने वालों का तर्क है कि विकास बहकर बाहर न निकल जाए, इसलिए उसे गड्ढों में जमा रखना पड़ता
है। बरसात में नालियाँ भी इस विकास से लबालब भर जाती हैं। चारों ओर सड़ांध, कीचड़ और बदबू का ऐसा लोकतांत्रिक वातावरण बनता है कि कुत्ते, सूअर, सांड और मनुष्य, सब समान अधिकार से उसका आनंद लेते हैं।
नगर परिषद ने इस कार्य के लिए अवैतनिक सफाई कर्मचारियों की अनूठी व्यवस्था की है। आप उन्हें सांड, शूकर, कुत्ता आदि लोकप्रिय नामों से पुकार सकते हैं। बिना टेंडर, बिना वेतन, बिना हड़ताल,ये कर्मचारी विकास को सड़क से घर-घर पहुँचाते हैं। सवैतनिक दोपाए कर्मचारी कभी हड़ताल पर हों तो भी चिंता नहीं; ये चौपाए विकास-दूत चौबीसों घंटे सेवा में लगे रहते हैं, “विकास आपके द्वार” योजना के असली ब्रांड एंबेसडर वही हैं।
अब हालत यह है कि शहरवासियों को साफ सड़कें चुभने लगी हैं। गड्ढे न दिखें तो लोग बेचैन हो जाते हैं, जैसे पुत्र-वियोग हो गया हो। चमचमाती सड़क देखकर उन्हें संदेह होता है, कहीं विकास रुक तो नहीं गया? कई जिम्मेदार नागरिक स्वयं योगदान देते हैं। टेंट गाड़ना हो, सबमर्सिबल लगाना हो, पाइप डालना हो, धरती में एक नया अध्याय खोल दिया जाता है। राजनीति की नींव भी इन्हीं गड्ढों में मजबूत होती है। पिछले विधायक ने विकास के गड्ढे बिना भेदभाव हर क्षेत्र में खुदवाए थे। नए विधायक आए तो उन्हें पुराने विकास की शक्ल पसंद नहीं आई। जहाँ वोट मिले, वहाँ गड्ढे पटवाने लगे; जहाँ वोट नहीं मिले, वहाँ विकास को प्राकृतिक रूप से फलने-फूलने दिया। हारे हुए विधायक तिलमिला उठे,“देखो भाइयो-बहनो, यह मेरे विकास पर लांछन है! मेरे गड्ढे पटवाए जा रहे हैं। यह जनता के साथ धोखा है। हम आए तो और गहरा विकास लाएँगे।”

उन्होंने घोषणा की, “जहाँ-जहाँ सड़क बची है, उसे भी जीवंत किया जाएगा। बिजली के तार अंडरग्राउंड, टेलीफोन केबल अंडरग्राउंड, गैस पाइपलाइन अंडरग्राउंड। सड़क का अंतिम कतरा भी खुदामय होगा।” सभा तालियों से गूँज उठी, “शहर का नेता कैसा हो, खुदी राम जी जैसा हो!”

परिचय :-  डॉ. मुकेश ‘असीमित’
निवासी : गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
व्यवसाय : अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ
लेखन रुचि : कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं
प्रकाशन : शीघ्र ही प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से), काव्य कुम्भ (साझा संकलन) नीलम पब्लिकेशन, काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन) लायंस पब्लिकेशन।
प्रकाशनाधीन : व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन)  किताबगंज   प्रकाशन,  गिरने में क्या हर्ज है -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह) भावना प्रकाशन। देश विदेश के जाने माने दैनिकी, साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित 
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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