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मेरी अमरनाथ यात्रा (वो अनभिज्ञ)

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
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यदि इंसान मन मे संकल्प साध ले, तो निश्चित ही पूर्ण होता है। अमरनाथ की यात्रा भी एक दृढ़ संकल्प थी। वहां के लोग, वहां के वातावरण से हम अनभिज्ञ थे। हमें बताया गया था, कदम कदम पर खतरा है एवं भयपूर्ण वातावरण है। किन्तु संकल्प साधा था ईश्वर को पूर्ण करना ही होगा।
अमरनाथ की यात्रा में सर्वप्रथम श्रीनगर पहले पड़ाव तक, वायु मार्ग, रेल मार्ग, एवं सड़क मार्ग से पहुंचना था, हम हवाई मार्ग से श्रीनगर एयरपोर्ट पहुचें। वहां से पद यात्री, यात्रा प्रारंभ करते हैं जो सरकार के संरक्षण में समूह बना कर कारवाई जाती है।
मार्ग को और सुगम करने हेतु “अमरनाथ से २ किलोमीटर पंजतरणी” हेलिकॉप्टर से पहुंचना होता है, हम इसी मार्ग से पहुचे। वहां से अमरनाथ गुफा जाने के लिए, खच्चर, पालकी का प्रयोग किया जाता है। हमने पंजतरणी से पैदल यात्रा प्रारम्भ की।
किसी जीव पर अपने शरीर का दोगुना बोझ डालकर तीर्थ करना मेरी आत्मा के विरुद्ध था, यहाँ ये सवाल है मेरा भक्त गणों से “महादेव” पशुपतिनाथ कहलाते हैं और हमारे देव हैं पूजे जाते हैं, फिर हम पशु पर ही अत्याचार करते हुए तीर्थयात्रा कैसे करते हैं, ये कैसी श्रद्धा कैसी पूजा है?
हमारी पदयात्रा प्रारंभ हुई, समुद्रतट से अमरनाथ गुफा की दूरी १२,७५६ फीट है। जैसे-जैसे ऊँचाई बढ़ती जाती है इंसान को ऑक्सीजन की कमी अनुभव होती है, इसलिए अमरनाथ यात्रा के पहले, यात्रीगण की, “मेडिकल जांच” आवश्यक होती है।
रास्ता संकरा, बर्फ से पटा हुआ, और लगातार हो रही बारिश ने मार्ग को और जटिल बना दिया था। प्रारम्भ में मुझे भी गहरी खाई देखकर डर लगा किन्तु जैसे जैसे प्रभु मार्ग बनाते जा रहे थे वैसे वैसे हम भयमुक्त होते जा रहे थे। जबकि लोगों ने बहुत कहा सवारी पर बैठ जाइये, जान जा सकती है यदि पांव फिसला तो नीचे १२ फीट खाई में ही मिलेंगे।
मेरा अटल विश्वास अपने महादेव पर था। जब यात्रा सुनिश्चित की है तो वही पहुंचाएंगे भी। कुछ समय पाश्चात्य समतल स्थान दिखने लगा, रंग- बिरंगी पताकाएं दिखने लगी, हर हर महादेव का जयकारा सुनाई देने लगा। मन खुशी से झूम उठा। विकट परिस्थितियों से जुझते हुए अखिरकार महादेव ने माता पार्वती और पुत्र गणेश के साथ दर्शन दिए। नंगे पाँव बर्फ पर पैर जम गए थे, चलना मुश्किल हो रहा था, क्योंकि हम भीड़ से बचने के लिए सर्दियों के मौसम में गए थे। प्रभु के समक्ष १ से २ मिनट से ज्यादा रुकने नहीं दिया जा रहा था, हम वहीं आसन जमा कर बैठ गए, बरफानी बाबा के समक्ष पहुंच कर सारे कष्ट दूर हो गए। हृदय और आत्मा भाव-विभोर हो गए, नैनो से अश्रुधारा बहने लगी। देवों के देव, माता पार्वती, स्फटिक की तरह चमक लिए हुए, साथ में छोटे से पुत्र गणेश, हम किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए थे। जहां लोगों को खड़े नहीं होने दिया जा रहा था वहां हम १५ से २० मिनट बैठकर बस निहारते रहे माता पार्वती का परिवार। पूरा परिवार बर्फ से ही निर्मित हुआ होता है। स्वयं के अंदर समाहित होता जा रहा था ये दृश्य, प्रार्थना कर रहे थे कि समय यही रुक जाए और सद्गति मिल जाए।
किन्तु इंसान जो सोचता है वो कहाँ ही हो पाता है। वापस तो लौटना ही था। अपने आत्मा और नैनो में वो नयनाभिराम दृश्य समेटे मैं वापसी की राह पर चल पड़ी। लगातार होती बारिश ने संकरे रास्तों को और विकट बना दिया था। ढलान पर वापस होना था, शनैः-शनैः कदम आगे बढ़ाना था, तभी अचानक मुझे किसी ने धक्का दिया, या भीड़ इतनी थी कि मैं धक्का खा गई, मेरा संतुलन बिगड़ गया, मैं उन रास्तों पर तेजी से फिसलती हुई खाई की तरफ जाने लगी। कोई ऐसी वस्तु जिसे मैं पकड़ लूँ, और स्वयं को रोक सकूं, वहाँ मिल ही नहीं सकती थी, क्योंकि वहाँ सिर्फ और सिर्फ बर्फ थी। पीछे से आवाजे सुनाई दी, शोर कानो में पड़ा, “ये महिला तो गई सद्गति हुई इसकी” मैंने भी नेत्र बंद कर लिए और केवल नमः शिवाय बोलते रहे, तभी अचानक मेरे शरीर से किसी के पाँव टकराए और मैं रुक गई, वो एक मोड़ जैसा रास्ता था, एक हाथ मेरी तरफ बढ़ा, कोई शब्द नहीं, मैंने उन हाथों को पकड़ा, संतुलित किया स्वयं को, खड़ी हुई, मैंने उस ईश्वर स्वरूप को आभार प्रकट करना चाहा किन्तु वहाँ कोई नहीं दिखा, पीछे लोग तेज आवाज करते आते दिखाई पड़े, चारों तरफ देखा कहीं कोई नजर नहीं आया।
वो अपरिचित कौन था …?? मैं तो सद्गति को प्राप्त हो रही थी, फिर किसने मुझे रोका …?? आज भी “वो अनभिज्ञ” हैं। ईश्वर स्वरूप उनके पैर और हाथ नैनों में बसे हैं। इतनी भाग्यशाली नहीं हूँ कि इष्टदेव के चरणों में सद्गति मिले, ईश्वर ने वापस भेजा, क्योंकि अभी और परीक्षाएं देनी शेष हैं, अभी और जिम्मेदारियों का निर्वाह करना है।
…….. खराब मौसम के कारण हमारा वापस लौट कर “पंजतरणी” तक आ पाना भी स्थगित हो गया। वहां रहने ठहरने के लिए घर, होटल, सराय नहीं होते, मात्र स्थान्तरित टैंट होते है, वही हमें रात गुजारनी थी। एक आश्चर्यजनक सच्चाई से सामना हुआ, वहां ऐसे लोग जो दर्शन करने आते है किन्तु मौसम की मार से उसी दिन वापस नहीं हो पाते, उनको इन टैंटो में रुकना पड़ता है, मित्रतापूर्ण व्यवहार से वो लोग जो “मुस्लिम समुदाय” के ही होते हैं आपका स्वागत करते हैं। भले ही वो आपको, होटल या धर्मशाला जैसी सुविधाएं ना उपलब्ध करा पाए किन्तु जैसे-तैसे रुकने का इंतजाम दिल से करते हैं। चूंकि वो क्षेत्र सीमा से लगा हुआ है इसलिए वहाँ आए दिन आतंकवादी गतिविधियां होती रहती हैं। चप्पे-चप्पे पर सेना के नौजवान दिखाई देते हैं। हम भी डरे-सहमे थे, सारी रात बारिश से भीगे कंबल में, जागते हुए ही बिता दी। अगले दिन सबसे पहली हवाई सेवा से हम वापस आए।
….. वो अनभिज्ञ आज भी मुझे ऐसे याद है जैसे ये घटना कल की हो, और उसको याद कर के शरीर के रोम-रोम से एक ही आवाज आती है ऊॅ नमः शिवाय …

परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी
जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी
शिक्षा : एम. ए., एम.फिल – समाजशास्त्र, पी.जी.डिप्लोमा (मानवाधिकार)
निवासी : लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा “जीवदया अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४” से सम्मानित
विशेष : साहित्यिक पुस्तकें पढ़ने के शौक ने लेखन की प्रेरणा दी और विगत ६-७ वर्षों से अपनी रचनाधर्मिता में संलग्न हैं।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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