
समीक्षक- सुधीर श्रीवास्तव
‘प्रयागराज का महाकुम्भ २०२५- आस्था का महामेला’ महाकुम्भ के बहुआयामी स्वरूप के काव्यात्मक/ चित्रात्मक अभिव्यक्ति को सैद्धांतिक/वैचारिक और आध्यात्मिकता का अनुपम उदाहरण है। वरिष्ठ कवयित्री डॉ. पूर्णिमा पाण्डेय “पूर्णा” द्वारा रचित प्रस्तुत संग्रह कविताओं का संकलन नहीं, अपितु महाकुंभ का आँखों देखा हाल जैसा महसूस कराता है। महाकुम्भ २०२५ जीवंत अनुभवों, आस्था, अध्यात्म, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं का सशक्त, संग्रहणीय दस्तावेजी, ग्रंथ स्वरुप में महाकुम्भ के विभिन्न आयामों का खूबसूरत और प्रभावी चिंतन पूरे मनोयोग से चित्रित किया गया है। विविध रचनाओं यथा गंगा मैया, आध्यात्मिक चेतना का पर्व, सफाईकर्मी, संगम ही संगम, विदेशी मेहमान, किन्नर अखाड़ा, मकर संक्रांति, कल्पवास, दंडी स्वामी, रुद्राक्ष वाले बाबा, कांटे वाले बाबा, हे महाकुंभ, कल्पवास में पाया, नागवासुकी मंदिर, पुलिस का व्यवहार, इतिहास का सबसे बड़ा मानव समागम, सतुआ बाबा आश्रम, याद किया जाएगा….आदि संग्रह की रचनाएँ पाठकों को महाकुम्भ के बहुआयामी परिदृश्यों से रुबरु कराती प्रतीत होती हैं। लेखिका ने अपने धर्मावलंबी होने के अनुभवों को पूरी सजगता के साथ संग्रह में धार्मिक पक्ष के साथ ही सेवा, स्वच्छता, प्रशासनिक व्यवस्था, सामाजिक समरसता तथा सांस्कृतिक विविधता को उकेरकर अपनी सामाजिक, व्यवहारिक जिम्मेदारियों का अनूठा उदाहरण पाठकों के सामने ईमानदारी से रखने का यथासंभव प्रयास कर सरल, सहज, प्रभावी और भावपूर्णता के साथ प्रस्तुत किया है। कविताओं में आस्था, अनुभूति, धर्म का सम्मिश्रण, संवेदना , समर्पण, हृदयाभाव स्पष्ट दिखाई देता है।
अपने जीवन साथी राकेश पाण्डेय जी को समर्पित कर संग्रह की बतौर लेखिका ने रिश्तों की महत्ता, महत्व और मान-सम्मान को रेखांकित करते हुए महाकुंभ कल्पवास केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं, बल्कि एक संवेदनशील सहभागिता की भी रही है, जिसने समूचे महाकुम्भ निकट से देखा, समझा और महसूस कर शब्दों में उतार कर पाठकों को घर बैठे महाकुंभ का दर्शन ही नहीं धार्मिक वातावरण की ऊंचाइयों में सहभागिता का बोध कराने जैसा है। विशेष रूप से सफाईकर्मी, पुलिस का व्यवहार तथा विदेशी मेहमान जैसी कविताएँ महाकुम्भ के मानवीय और सामाजिक पक्ष को उजागर करती हैं। क्योंकि आम जन मानस भी जानता है कि महाकुम्भ केवल धार्मिक आयोजन भर नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, सभ्यता राष्ट्रीयता और धार्मिक वातावरण के वैश्विक आकर्षण का पर्याय बन चुका है। करोड़ों देशी-विदेशी श्रद्धालुओं की आस्था, संत- समाज समागम, कल्पवासियों का कठिन जीवन तप तथा संगम की आध्यात्मिक स्मृतियों को भाव-विभोर करने के साथ धार्मिक संचेतना की ओर मोड़ देता है।
प्रस्तुत संग्रह ‘प्रयागराज का महाकुम्भ २०२५- आस्था का महामेला’ केवल एक काव्य संग्रह भर नहीं है अपितु संग्रहणीय, पठनीय और संदर्भ कृति के साथ महाकुम्भ की दिव्यता, भव्यता और सांस्कृतिक गरिमा को समेटे एक पूर्ण ग्रंथ जैसा है। जिसे डॉ. ‘पूर्णा’ की सफल साधना , प्रतिबद्धता और शोधपरक चिंतन की उत्कृष्ट प्रस्तुति की संज्ञा दी जा सकती है, जिसे उनके जैसा विराट व्यक्तित्व वाली महिला ही कर सकती थी और इस दिशा में लेखिका ने अपनी अनेकानेक जिम्मेदारियों, व्यस्तताओ के बीच इसे से बखूबी निभाया।जिसके लिए साहित्यिक क्षेत्र के अलावा सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक क्षेत्र के प्रत्येक नागरिक को डा. पूर्णा का आभारी होना चाहिए।
प्रस्तुत संग्रह के लिए डा. पूर्णा को बधाइयां शुभकामनाएं और स्वस्थ सानंद दीर्घायु जीवन की कामना के साथ…..।
परिचय :- सुधीर श्रीवास्तव
जन्मतिथि : ०१/०७/१९६९
शिक्षा : स्नातक, आई.टी.आई., पत्रकारिता प्रशिक्षण (पत्राचार)
पिता : स्व.श्री ज्ञानप्रकाश श्रीवास्तव
माता : स्व.विमला देवी
धर्मपत्नी : अंजू श्रीवास्तव
पुत्री : संस्कृति, गरिमा
संप्रति : निजी कार्य
विशेष : अधीक्षक (दैनिक कार्यक्रम) साहित्य संगम संस्थान असम इकाई।
रा.उपाध्यक्ष : साहित्यिक आस्था मंच्, रा.मीडिया प्रभारी-हिंददेश परिवार
सलाहकार : हिंंददेश पत्रिका (पा.)
संयोजक : हिंददेश परिवार(एनजीओ) -हिंददेश लाइव -हिंददेश रक्तमंडली
संरक्षक : लफ्जों का कमाल (व्हाट्सएप पटल)
निवास : गोण्डा (उ.प्र.)
साहित्यिक गतिविधियाँ : १९८५ से विभिन्न विधाओं की रचनाएं कहानियां, लघुकथाएं, हाइकू, कविताएं, लेख, परिचर्चा, पुस्तक समीक्षा आदि १५० से अधिक स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर की पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित। दो दर्जन से अधिक कहानी, कविता, लघुकथा संकलनों में रचनाओं का प्रकाशन, कुछेक प्रकाश्य। अनेक पत्र पत्रिकाओं, काव्य संकलनों, ई-बुक काव्य संकलनों व पत्र पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल्स, ब्लॉगस, बेवसाइटस में रचनाओं का प्रकाशन जारी।अब तक ७५० से अधिक रचनाओं का प्रकाशन, सतत जारी। अनेक पटलों पर काव्य पाठ अनवरत जारी।
सम्मान : विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं द्वारा ४५० से अधिक सम्मान पत्र। विभिन्न पटलों की काव्य गोष्ठियों में अध्यक्षता करने का अवसर भी मिला। साहित्य संगम संस्थान द्वारा ‘संगम शिरोमणि’सम्मान, जैन (संभाव्य) विश्वविद्यालय बेंगलुरु द्वारा बेवनार हेतु सम्मान पत्र।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।







