ममता की वो खान है
सुधीर श्रीवास्तव
बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश)
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कुण्डलिया छंद
ममता की वो खान है, मानें हम संताप।
अपने निज व्यवहार से, करते हम सब पाप।।
करते हम सब पाप, सभी हम जो हैं भरते।
उसकी पीड़ा आज, देख क्यों नहीं समझते।
कहें मित्र यमराज, समझिए इतनी समता।
प्यारे पढ़ लो आप, मित्र लाचारी ममता।।
मानो ज्ञान भंडार का, निज जीवन आयाम।
अज्ञानी बन बैठना, बदनामी तव नाम।।
बदनामी तव नाम, भलाई आखिर किसमें।
करना वो ही काम, भाव सुखदा हो जिसमें।
आप बढ़ाओ कोष, मित्र अब इतना जानो।
बाकी सबकुछ आप, सोच समझकर मानो।।
जिनकी होती है नहीं, स्वाभिमान पहचान।
हम सब उनको जानते, इतना होता ज्ञान।।
इतना होता ज्ञान, व्यर्थ है चर्चा करना।
होशोहवास में आप, मित्र संभलकर रहना।
दूरी रखिए आप, कहानी जो है इनकी।
क्यों उनकी पहचान, शोर है चहुँदिश जिनकी।।
परिचय :- सुधीर श्रीवास्तव
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