यमराज मित्र के दोहे
सुधीर श्रीवास्तव
बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश)
********************
दूर्वा श्री गणेश को, माँ दुर्गा श्रृंगार।
भोग लगाओ प्रेम, होगा जन उद्धार।।
सभी निभाते भूमिका, जैसा बुद्धि विवेक।
सबके अपने रंग हैं, भले विवेक अनेक।।
सबकी अपनी भूमिका, सबका अपना सार।
कम लोगों को ही मिले, सार्थकता विस्तार।।
कुछ लोगों की भूमिका, देती है दुख घोर।
सबसे ज्यादा नाचते,बने हुए जो मोर।।
अपना कोई अब नहीं, देने वाला भाव।
बिना दाम के जेब का, टीस रहा है घाव।।
बेगाने ही बन रहे, बगलगीर तो आज।
दुनिया के दस्तूर का, उल्टा दिखे समाज।।
अपने भारत वर्ष का, बढ़ा विश्व में मान।
उनको मिर्ची लग रही, जो जनमे नादान।।
आजादी के पर्व का, बना रहे उत्साह।
बिना किसी मतभेद के,सबको हो परवाह।।
आज तिरंगा विश्व को, देता है विश्वास।
हम सबको भी गर्व है, बढ़ती दिखती आस।।
हम सबका कर्तव्य है, हो शहीद का मान।
क...








