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राम वनगमन (आल्हा/वीर छंद)

नरेंद्र सिंह
मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार)

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(आल्हा/वीर छंद)

राम संग भी लक्ष्मण सीता,
वन में जाने को तैयार।
कौशल में सब लगे विलखने,
छाती मुक्का दे-दे मार।।
कैसे अब तो राज चलेगा,
बुरा नगर का होगा हाल।
यही सोचकर जनता प्यारी,
रो-रो कर हो रही निढाल।।

उधर महल में राजा दशरथ,
हाय राम कर रहे पुकार।
अंतिम साँसे गिन-गिन राजा,
भोग रहे थे कष्ट अपार।।
जीव-जंन्तु भी चौंक रहे थे,
झेल रहे सदमे की मार।
कोहराम सर्वत्र मचा था,
सबके नयन बहाये धार।।

इक कैकेई का मुखमंडल,
चमक रहा था मानो खास।
कुल कलंकिनी चहक रही थी,
मानो उसके उर उल्लास ।।
मना रही थी जल्दी वह तो,
राम चले जाए वनवास।
राज तिलक हो शीघ्र भरत का,
कोई बाधा रहे न पास।।

परिचय :-  नरेंद्र सिंह
निवासी : मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार)
सम्प्रति : सेवनिवृत्त वरिष्ठ प्रबंधक (पी.एन.बी.)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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