
रूपेश कुमार
चैनपुर (बिहार)
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ग्वालियर, मध्यप्रदेश की पावन धरा ने
जन्म दिया एक बालक को, नाम हुआ अटल,
स्वरों में कविता, शब्दों में सत्य,
वाणी थी सरल, मन प्रखर, अडिग, स्थिर, निर्मल।
पिता शिक्षक संस्कारों की छाया,
माँ की ममता, राष्ट्र का स्वप्न,
बाल्यकाल से ही चेतना जागी,
भारत बने विश्व में उज्ज्वल स्वर्ण-रत्न।
कलम उठी तो कविता बह चली,
राजनीति आई तो सेवा बन गई,
विचारों में मतभेद रहे होंगे,
पर मर्यादा कभी न टूटी, न झुकी, न गई।
जनसंघ से संसद तक की यात्रा,
संघर्षों से रचा हुआ इतिहास,
एक नहीं, कई बार पराजय मिली,
पर हर हार बनी भविष्य का प्रकाश।
“हार नहीं मानूँगा” कहने वाला,
स्वयं उस पंक्ति का प्रमाण था,
लोकतंत्र का सच्चा प्रहरी वह,
विपक्ष में भी जिसकी वाणी समाधान था।
तीन-तीन बार बने प्रधानमंत्री,
पर सत्ता कभी सिर पर न चढ़ी,
सरल जीवन, उच्च विचार,
यही पहचान जन-जन के मन में गढ़ी।
पोखरण की धरती जब गर्जना कर उठी,
भारत ने आत्मविश्वास पाया,
शांति चाहता था, पर निर्बल नहीं,
यह संदेश विश्व तक अटल ने पहुँचाया।
लाहौर तक बस लेकर जाना,
मित्रता का अनुपम उपहार,
“युद्ध नहीं, संवाद चाहिए”
कह गया भारत का वह उदात्त विचार।
कारगिल की घड़ी कठिन थी,
धैर्य, साहस और नीति का मेल,
विजय मिली, मानवता भी बची,
यही था अटल का राजधर्म खेल।
राज्यों का पुनर्गठन हो या
सड़कें, शिक्षा, संचार का विस्तार,
विकास के हर अध्याय में
अटल की दृष्टि रही दूरदर्शी, विराट।
कवि-हृदय अंत तक जीवित रहा,
राजनीति में भी कविता बसी,
“मौत से ठन गई” रचने वाला
आशा का दीपक बना रहा सदा ही।
सम्मान मिले अनेक उन्हें,
पर भारतरत्न सर्वोपरि महान,
जन-जन के हृदय में जो बसे,
वह पदक नहीं, वह था जनमानस का मान।
आज १०१वीं जयंती पर,
भारत नमन करता है शीश,
एक व्यक्ति नहीं, एक युग थे आप अटल जी,
आपको कोटि-कोटि नमन, आशीष।
परिचय :- रूपेश कुमार छात्र एव युवा साहित्यकार
शिक्षा : स्नाकोतर भौतिकी, इसाई धर्म (डीपलोमा), ए.डी.सी.ए (कम्युटर), बी.एड (महात्मा ज्योतिबा फुले रोहिलखंड यूनिवर्सिटी बरेली यूपी) वर्तमान-प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी !
निवास : चैनपुर, सीवान बिहार
सचिव : राष्ट्रीय आंचलिक साहित्य संस्थान
प्रकाशित पुस्तक : मेरी कलम रो रही है
सम्मान : कुछ सहित्यिक संस्थान से सम्मान प्राप्त !
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।

