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मंजिलों तक का सफर

साक्षी लोधी
नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश)
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लम्हे गमों के अकेले बिताने पड़ते हैं
कदम एक एक कर जमाने पडते हैं
सीधे सीधे कुछ नहीं मिलता जमाने मैं
काटों में भी रास्ते बनाने पडते हैं

मिलते मिलते रह जाती हैं मंजिले
मौके कई ऐसे भी गवाने पड़ते हैं
रात दिन एक हुए किसने देखे
सबूत कामयाबी के दिखाने पडते हैं

मिली हैं मंजिलें जिनको पूछो जरा उनसे
कितने जोखिम डर डर के उठाने पड़ते हैं
ऐसे ही नहीं मिलता मुठ्ठी भर आसमां
जमीं के ऐसे कई हिस्से गबाने पड़ते हैं
हारने वाले तन्हा लड़ते रहते हैं खुद से
जीतने बालों के साथ जमाने लड़ते हैं

किनारों पे मोती मिलते नहीं अक्सर
गहराइयों में गोते लगाने पड़ते हैं
एक खुआब मुकम्मल करने के वास्ते
शोक अपने सारे दफनानें पड़ते हैं

परिचय :-  साक्षी लोधी
निवासी : नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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