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जाड़े की धूप

सुरभि शुक्ला
इन्दौर (मध्य प्रदेश)

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जाड़े की गुनगुनी
धूप में छत पर बैठना
एक सुकून भरा वो
एहसास देता है
जैसे कोई माथे पर
प्यार भरा हाथ फेर देता है
कुछ देर के लिए
सारे गम भुला देता है।
ना किसी से कुछ कहना
ना किसी से कुछ सुनना,
अपने मन के भीतर
एकांत में महसूस करना।
और चाय की
चुस्कियां लेते हुए
साथ में एक किताब
को लेकर पढ़ना
उसके भावों और
शब्दों में खो जाना
देर तक धूप को
निहारते-निहारते
उसकी गोदी में लेटकर
और उसकी पीले
नारंगी साड़ी के
पल्लू से अपना चेहरा
ढककर सारे काम छोड़कर
एक बहुत गहरी
नींद में सो जाना।

परिचय :-   सुरभि शुक्ला
शिक्षा : एम.ए चित्रकला बी.लाइ. (पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान)
निवासी : इन्दौर (मध्य प्रदेश)
जन्म स्थान : कानपुर (उत्तर प्रदेश)
रूचि : लेखन, गायन, चित्रकला
सम्प्रति : निजी विद्यालय में पुस्तकालयाध्यक्ष
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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