Monday, February 2राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर आपका स्वागत है... अभी सम्पर्क करें ९८२७३६०३६०

खेल शुरू बजाओ ताली, खेल ख़त्म बजाओ ताली

डॉ. मुकेश ‘असीमित’
गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
********************

एक कवि सम्मेलन में हमें आगे की पंक्ति में बैठा दिया गया। यह आयोजकों की कृपा कम और हमारी जुगाड़-साधना का प्रतिफल अधिक था। वीआईपी दीर्घा का टिकट हमने कबाड़ से खोज निकाला था, पर मंच पर बैठे कवि महोदय ने हमारे भीतर का सारा वीआईपी-पन झाड़कर बाहर कर दिया। इतनी तालियाँ बजवाई गईं कि क्षण भर को आत्मा कांप उठी कहीं पिछले जन्म में हम पेशेवर तालीबाज़ तो नहीं थे? फिर सांत्वना मिली नहीं, वीआईपी दीर्घा में वही बैठ सकता है जो समय-असमय ताली बजाने में पारंगत हो। मन में यह भी संतोष रहा कि यदि इस जन्म में ठीक से तालियाँ बजा दीं, तो शायद अगले जन्म में घर-घर ताले बजाने वाली योनि में जन्म न लेना पड़े। कवि ने इशारों-इशारों में यह आश्वासन भी दिया था। नेता और कवि में एक अद्भुत समानता है दोनों तालियों के भूखे होते हैं। नेताओं को टिकट दिलाने से लेकर कवियों की दो जून की रोटी तक सब तालियों की आँच पर ही पकता है।मंच, माला और माइक के बिना उन्हें ताली मिलती नहीं, इसलिए दोनों इस त्रिवेणी संगम में स्नान करने के लिए ऐड़ी-चोटी का ज़ोर लगाए रहते हैं।
कविता पाठ हो या चुनावी भाषण, तालियाँ ही असली “रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट” होती हैं। तालियों की भी अपनी अर्थव्यवस्था है। यह एक रणनीतिक निवेश है कहीं सम्मान के लिए, कहीं पुरस्कार के लिए, और कहीं लिफ़ाफ़े के वज़न को जायज़ ठहराने के लिए। कवि सम्मेलन में कवियों की सूची उनकी ताली उत्पादन क्षमता के आधार पर तय होती है। कौन कितना बजेगा और कितनी देर बजवाएगा सब पहले से निर्धारित रहता है। ताली बजवाने के लिए कवि हर विधा अपनाते हैं। कभी डर, कभी धमकी “ताली नहीं बजाई तो अगले जन्म में हर दरवाज़े पर ताली बजाते फिरोगे” जैसी मीठी घुड़की दी जाती है। आयोजक इधर भर कर दें तो कविता की जगह नृत्य होगा, अर्थ की जगह अंग-प्रदर्शन । कविता एक पंक्ति पर अटक जाएगी, वही पंक्ति बार-बार दोहराई जाएगी “अगली पंक्ति पर आपका ध्यान चाहूँगा” ध्यान कविता के लिए नहीं, ताली के लिए।
“दे ल्हा के” के नाम पर पुकार उठती है- “ताली बजा दे रे बाबा… तू एक बजाएगा, बगल वाला दो बजाएगा…” यहाँ कविता आत्मा की पुकार कम और तालियों की ललकार अधिक लगती है। साहित्यिक चिंतन भी अपनी सीमाएँ लांघने लगता है। तालियों की गड़गड़ाहट के लिए चेहरे पर भोंड़ी मुद्राएँ उतर आती हैं, भाषा में अश्लीलता का तड़का लग जाता है। यदि आप केवल खुद हँसे और दूसरों को न हँसाया, तो भांड कहलाने का
अधिकार कैसे पाएँगे?
यही ताली-संस्कृति राजनीति में भी दिखाई देती है। चुनावी रैलियाँ, धरने, हड़तालें सबका उद्देश्य जनता से ताली बजवाना है। भगवान ने जनता को दो हाथ इसलिए दिए हैं कि वे ताली बजा सकें। खाली हाथों की यही उपयोगिता है। जो जनता से ताली बजवाते हैं, वे संसद और विधानसभा में खुद भी ताली बजाने इकट्ठा होते हैं। एक हाथ कुर्सी पर टिका रहता है, इसलिए आजकल मेज़ थपथपाकर ही ताली का काम चल जाता है। सत्ता पक्ष का काम थपथपाहट से हो जाता है, विपक्ष को कभी-कभी मेज़ पर रखे काग़ज़, माइक और स्याही भी उछालनी पड़ती है। विधेयक हों या विरोध सब ताली के वज़न से तय होते हैं। आदमी चाहता है कि जीवन ऑटोमोड पर चल जाए। तब तालियों का भी स्वचालन हो गया। रिकॉर्डेड तालियाँ आ गईं। अब दर्शक को मेहनत नहीं करनी पड़ती। स्टैंड-अप शो, टीवी मनोरंजन, बाबा के सत्संग हर जगह मशीनी तालियाँ बज रही हैं। साहित्यिक मंच भी अछूते नहीं। लिट-फेस्ट में तालियों की गड़गड़ाहट से साहित्य के आकाश में छेद किए जा रहे हैं। एक पहुँचे हुए साहित्य-शिरोमणि की शर्त है भाषण के दौरान चाय-नाश्ता नहीं परोसा जाए। श्रोता खाली हाथ रहें, ताकि ताली बजाने में कोई व्यवधान न हो। ज़ुबान पर ताला लगा हो तो भी चिंता नहीं ताली तो बज सकती है।

अब तालियाँ सहज नहीं रहीं, खरीदी जाती हैं। समर्थन के लिए, भीड़ के लिए, निष्ठा की याद दिलाने के लिए। ताली न बजाने वाले संदेह के घेरे में आ जाते हैं। उन्हें मुख्य ताली-धारा में लाना सत्ता का कर्तव्य बन जाता है। शो तब तक चलता रहेगा, जब तक तालियाँ बजती रहेंगी। पर्दा गिरे या जनता की आँखों पर पर्दा पड़ा रहे उपाय एक ही है आँखें बंद रखो और ताली बजाते रहो। प्रश्न मत पूछो। सत्ता प्रश्न नहीं, अनुमोदन चाहती
है। इसलिए बजाते रहिए तालियाँ,खेल चलता रहेगा, तमाशा चलता रहेगा। तालियाँ बजेंगी तो झूठ के बादल भी बरसेंगे, आँखों में धूल झोंकी जाएगी, पंद्रह लाख भी आ जाएँगे, अच्छे दिन भी।याद है न ताली और थाली बजाकर हमने कोरोना को भी भगा दिया था?
तो फिर “जय खप्पर वाली! तेरा वचन न जाए खाली लो, बजा दो ताली!”

परिचय :-  डॉ. मुकेश ‘असीमित’
निवासी : गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
व्यवसाय : अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ
लेखन रुचि : कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं
प्रकाशन : शीघ्र ही प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से), काव्य कुम्भ (साझा संकलन) नीलम पब्लिकेशन, काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन) लायंस पब्लिकेशन।
प्रकाशनाधीन : व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन)  किताबगंज   प्रकाशन,  गिरने में क्या हर्ज है -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह) भावना प्रकाशन। देश विदेश के जाने माने दैनिकी, साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित 
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

प्रिय मित्र, शुभचिंतक एवं परिवारजन आपको प्रेषित मेरी नई स्वरचित रचना, कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें …🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ
प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें
hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर 98273 60360 पर सूचित अवश्य करें …🙏🏻 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच का सदस्य बनने हेतु हमारे चलभाष क्रमांक 98273 60360 पर अपना नाम और कृपया मुझे जोड़ें लिखकर हमें भेजें…🙏🏻

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *