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बदलते युग का शोर

ललित शर्मा
खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम)
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आधुनिक युग नया दौर
चहुँऔर मचा खूब शोर,
कहीं तारीफ का बजता ढोल बिगुल
कहीं नजरअंदाज करने में है गुल,
तकरार आमने आमने पुरजोर
घमासान जंग में
दुर्बल को मिटाने में
प्रतियोगिता में मचा शोर,
भारी भरकम मची दौड़
मेहनत पर फेरकर पानी
करने को लगाते जोर
मजबूत साख मिटाने में
लगाए जोर करते कमजोर,
बदलते आधुनिक युग में
बस मचाते बस, यही शोर
बदलते समय यही सोच में,
बदले बोलने के व्यवहार संग
इंसान अब इंसान से
प्रश्न पूछने और सोचने को
कहाँ है संस्कार
संस्कृति उच्च विचार,
सोचता इंसान
क्या करूँ, कैसे करूँ
नम नेत्र से एकांत बैठे
बदलते आधुनिक युग में
भीतरघात की वेदनाओं में,
सच्चाई बताने में कमजोर
सौहार्द समन्वय भाईचारे में
पतन की डोर
जाने कितनी हो रही
बदलते युग मे कमजोर

परिचय :- ललित शर्मा
निवासी : खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम)
संप्रति : वरिष्ठ पत्रकार व लेखक
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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