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जड़कला

प्रीतम कुमार साहू ‘गुरुजी’
लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़)
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(छत्तीसगढ़ी बोली)

किसान मन के सोनहा धान
लुआँ मिंजा के घर आगे
मेहिनत के फल मिलगे
कोठी डोली म धान धरा गे।।

अग्घन, पूस के महीना म संगी
लद-लद जाड़ जनाए
कथरी, कमरा, अउ साल ओढ़े
गोरसी म आगी सुलगाए।।

कतको कपड़ा पुर नई आवय
जड़कला हर जब आथे
ताते कपड़ा अउ ताते जिनिस
सबों के मन ल भाथे।।

नोनी, बाबू अउ, लइका सियान
जाड़ म ठिठुरत काँपय
संझा बिहनिया जम्मो जुरमिल
भुर्री बार के तापय।।

कुहरा निकलय मुहुँ डहर ले,
नहाय बर मन ढेरियाय
उठत बिहनियाँ सुरुज के अगोरा
घाम ह बने सुहाय।।

तिवरा भाजी, राहेर के बटकर
सबो के मन ल भाय
चिरपोटी पताल के चटनी संग
अंगाकर गजब मिठाय।।

परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक)
निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)
घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।

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