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नन्हें साथी

सुधा गोयल द्वारा लिखित ‘नन्हें साथी’ पुस्तक की विवेचना

समीक्षक :- नील मणि
मवाना रोड (मेरठ)
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अदम्य नारी रत्न सम्मान एवं कोहर प्रसाद पाठक स्मृति बाल साहित्य श्री सम्मान से सुशोभि श्रीमती सुधा गोयल जी का बाल साहित्य-संग्रह नन्हें-साथी मेरे हाथों में होना अपने आप में एक सुखद अनुभव है। १०७ पृष्ठों में सजी ३७ बाल कहानियों की यह पत्रिका बाल मन की दुनिया का ऐसा आईना है, जिसमें बच्चे अपने बचपन की शरारतें, जिज्ञासाएँ और संवेदनाएँ साफ़ देख पाते हैं। एक के बाद एक छोटी, मनोरंजक और दिलचस्प कहानियाँ बच्चों को बाँधे रखती हैं। यह संग्रह केवल मनोरंजन नहीं करता, बल्कि संवेदनशीलता, नैतिक मूल्यों और सुसंस्कृत समाज की नींव भी रखता है। पढ़ते-पढ़ते रुकने का मन नहीं होता- हर कहानी अगली कहानी की ओर सहज ही खींच ले जाती है।
शब्दों की चंचलता मन मोह लेती है। भाषा सरल, स्पष्ट और कहीं-कहीं हल्की हास्य से भरी है, जो बच्चों के मन तक बिना किसी थकान के पहुँचती है। मेरे द्वारा बनाए गए चित्रों से सजी यह पत्रिका हाथ में लेकर देखना और भी संतोष से भर देता है- कहानियाँ जैसे चित्रों में बोल उठती हैं। कंजूस भोलू में ख्याली पुलाव धराशायी होते हैं नानी की कहानी में बच्चों के गीत सजते हैं दर्द की देवी के फूल संघर्ष के बाद सत्य की विजय का संदेश देते हैं नन्हें साथी में कीट-पतंगों और पक्षियों के मानवीय, स्नेहिल व्यवहार बच्चों को संवेदना सिखाते हैं दादी में जैसे हवा भर गई, घंटी सा गोल चेहरा जैसे प्रतीक चेहरे पर मुस्कान बिखेर देते हैं। सबक आलसी बच्चों को आईना दिखाती है।
लालची दीनाराम की भारी काया और सिर पर चोटी बच्चों को हँसने पर मजबूर कर देती है- और मन पर नियंत्रण का संदेश भी देती है।
बूढ़े तोते की बुद्धिमानी, धूर्तता की सजा, लो अंगूर खाओ- चोरी बुरी है
काली कोयल- बच्चों में सुधार कैसे लाएँ
हीरे की अंगूठी- पाखंड और गोरखधंधे पर करारा व्यंग्य
संगीत का एकलव्य- सच्ची लगन की ताकत
मेहनत का फल- अब्राहम लिंकन के बचपन से राष्ट्रपति बनने तक की प्रेरक यात्रा
सोनू की बाँसुरी- परियों, साहूकार और मासूमियत की दिलचस्प कथा हर कहानी कुछ न कुछ सिखाती है बिना उपदेश दिए। इसके अतिरिक्त चतुर खरगोश, बेवकूफ मगरमच्छ, भोलू राम, करनी का फल, पैसों की बरसात, मेरा गाँव मेरा घर, भील और हिरनी जैसी कहानियाँ बाल मन को आनंद और संस्कार दोनों देती हैं। नन्हें साथी सचमुच हर बच्चे के हाथ में होनी चाहिए- यह केवल पढ़ने की सामग्री नहीं, बल्कि संस्कारों की थाती है, जो बच्चों को हँसाते हुए अच्छा इंसान बनना सिखाती है। आभारी हूँ आंटी इस पत्रिका का हिस्सा मुझे बनाने का अवसर देने के लिए।

कम होते हुए हम
हम ऐसे दौर में जी रहे हैं
जहाँ फोन वायरलेस हैं,
पर बातचीत तार-तार है।
चूल्हे आग़ रहित हैं,
पर पेट की आग बुझती नहीं।
गाड़ियाँ की-लेस हैं,
पर रास्ते दिशाहीन।
खाना फैटलेस है,
पर सोच भारी होती जा रही है।
टायर ट्यूबलेस हैं,
पर भरोसे में हवा नहीं।
कपड़े स्लीवलेस हैं,
और संस्कार धीरे-धीरे
आउट ऑफ़ फैशन।
युवा डिग्रीधारी हैं,
पर जॉबलेस।
नेता-भाषण फुल हैं,

पर ज़िम्मेदारी-लेस।
रिश्ते स्टेटस अपडेट हैं,
और भावनाएँ नेटवर्क एरर।
एटीट्यूड हाई लेवल है,
संवेदनशीलता लो बैटरी।
पत्नी फियरलेस है,
पति क्लू-लेस।
बच्चे फ़ादरलेस हैं,
पर टाइमलेस।
फीलिंग्स हार्टलेस हैं,
और दिल EMOJI से भरे।
शिक्षा बुकलेस है,
ज्ञान सर्च-रिज़ल्ट।
दोस्त ऑनलाइन हैं,
पर अकेलापन ऑफ़लाइन।
सच फिल्टर में छुपा है,
और झूठ ट्रेंडिंग।
आवाज़ें बहुत हैं,
पर सुनने वाला कोई नहीं।
सब कुछ होता जा रहा है “लेस”
इंसान, इंसानियत,
आत्मा, धैर्य, विश्वास-
फिर भी…
इस शोर, इस खोखलेपन,
इस तेज़ रफ़्तार खालीपन के बीच

एक चीज़ अब भी ज़िंदा है-
हमारी उम्मीदें
शायद इसलिए
मैं अब भी निराश नहीं,
बस…
हूँ स्पीचलेस।

परिचय :- नील मणि
निवासी : राधा गार्डन, मवाना रोड, (मेरठ)
घोषणा : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।


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