
डॉ. मुकेश ‘असीमित’
गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
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“डॉक्टर साहब, आप तो ये बताओ, इलाज में कुल खर्चा कितना बैठेगा?”
मरीज़ एक्सीडेंट का है। जाहिर है, मरीज़ के सभी अटेंडेंट डील ब्रेकर बनकर आए हैं। इनमें असली घरवाले कौन हैं, यह पता लगाना मुश्किल है। भीड़ देखकर लगता है कि मामला एक्सीडेंट का है और एक्सीडेंट करने वाले को पकड़ लिया गया है। मरीज़ को अस्पताल के हवाले कर दिया गया है, और बाहर एक्सीडेंट करने वाले का गिरेबान पकड़कर गालियां दी जा ही हैं, धमकाया जा रहा है। पुलिस केस की धमकी से जितना ऐंठ सकते हैं, उतना ऐंठने की कोशिश में लोग लगे हुए हैं।
इस बीच, कुछ ऐसे मामलों के दलाल, जो इस मौके का निवाला खाने के आदी होते हैं, तुरंत सूंघकर आ जाते हैं। ये वो लोग होते हैं जो दोनों पार्टियों से अपनी जान पहचान बना लेते हैं। कुछ वकील, जिनकी रोज़ी-रोटी ऐसे ही मामलों पर निर्भर करती है, अपनी घिसी-पिटी वकालत के साथ मामले को कोर्ट के बाहर पैसे देकर सुलझाने का सुझाव देते हैं। बस, एक मोटा कमीशन दोनों तरफ से मिल जाए, तो सब सेट हो जाता है।
मरीज़ के पास कोई नहीं है। उसे अस्पताल के स्टाफ ने संभाल रखा है। वहीं, कुछ लोग बीच-बीच में आकर स्टाफ से सवाल करते जा रहे हैं, “क्या हो रहा है भाई, मरीज़ का इलाज शुरू नहीं किया अभी तक? प्राइवेट अस्पताल होते हुए भी ये हाल है!”
“कितना खर्च लगेगा”- उनमें से सभी ने बारी बारी से पूछा।
मैंने कहा, “मुझे देखने तो दो ,करना क्या है इसमें।” मैंने सभी को बारी बारी से बताया..।
“अरे डॉक्टर साहब, पार्टी के सामने बता दो, कितना खर्चा लगेगा?”
“१० हज़ार लगभग” मैंने कहा।
“अरे डॉक्टर साहब, इसके अलावा मरीज़ को लाने-ले जाने का खर्चा भी तो होगा। बाद का खर्चा भी तो है न?”
मैंने कहा, “भाई, ये अनिश्चित है। बाद में भी खर्चा हो सकता है, एक्स-रे , दूसरी जांचें.फॉलो अप में प्लास्टर आदि। अभी तो सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है।”
“ठीक है,” वो बोले, “चलो मान लिया १० हज़ार अभी का। बाद का २० हज़ार और मान लो, इनके खाने-पीने का भी खर्चा। अच्छा, अब आप ५० हज़ार बता दो, पार्टी को ला रहे हैं आपके पास।”
मैंने कहा, “भाई, आप ही बता दो। मैं तो जो मेरे यहां लगेगा, वही बता सकता हूँ।”
खैर, मुझसे निराश होकर वे खुद ही सेटलमेंट में लग गए। हो भी गया, स्टाम्प भी लिखा गया। इधर मेरा स्टाफ उनके घरवालों से सहमति का फॉर्म लिए खड़ा था ताकि इलाज शुरू कर सकूं। मरीज़ का कच्चा प्लास्टर लगा दिया गया, और इंजेक्शन भी लगवा दिए गए थे, जिससे थोड़ी राहत मिली। ऑपरेशन की तैयारी चल रही थी।
थोड़ी देर बाद अटेंडेंट फिर आए, बोले, “अच्छा, अब बताओ डॉक्टर साहब, आपने कितना बताया? १० हज़ार?”
“डॉक्टर साहब, ये तो बड़ी लूट मचा रखी है। १० हज़ार? ५००० में दूसरा अस्पताल तैयार हो जाएगा।”
एक और बोला, “अरे, सरकारी अस्पताल ले चलो। मेरे जानकार डॉक्टर हैं, एक पैसा नहीं लगेगा।”
फिर किसी ने सलाह दी, “वो जीप वाला था, उसने एक पहलवान (देसी इलाजी), जो की देसी तरीके से हड्डी सेट करता है, उसकी जगह बताई, जो शहर से ४० किलोमीटर दूर थी। वहां मरीज ले जाने का अच्छा-खासा किराया मिल जाता है। सच पूछो तो इन जीप वालों ने ही उसे फेमस कर दिया है।”
मरीज़ और उसके अटेंडेंट जाने लगे। मेरे स्टाफ ने कच्चे प्लास्टर और इंजेक्शन का चार्ज लेने के लिए १००० रुपये का बिल थमाया। फिर भीड़ भड़क गई। “लो जी, लूट मचा रखी है! किसने कहा था प्लास्टर लगाने के लिए? अस्पताल में तो बस घुसे नहीं कि प्लास्टर लगा देंगे!” “यार, हद है! आदमी को सांस भी नहीं लेने देते, बस आते ही इंजेक्शन घुसेड़ देते हैं, प्लास्टर लगा देते हैं। हम तो पार्टी से एग्रीमेंट में थे, हम नहीं देंगे एक पैसा। हमें इलाज नहीं कराना!”
“चलो भाई, ले चलो मरीज़ को, बड़ी लूट है यार!”
मरीज़ जा रहा है। अस्पताल सिर्फ इलाज के लिए नहीं, बिडिंग सेंटर भी हैं, आउट ऑफ़ कोर्ट सेटलमेंट का अड्डा, इलाज के लिए टेंडर भरे जाते हैं, बोली लगाई जाती है। ऊंची बोली पर मामला सेटल करने के लिए धमकाया-फुसलाया जाता है, कोर्ट के चक्कर दिखाकर मोटी रकम वसूली जाती है। आपदा में अवसर ढूंढने वाले हर तरफ होते हैं, तो मरीज़ और उसके रिश्तेदार क्यों पीछे रहें?
निवासी : गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
व्यवसाय : अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ
लेखन रुचि : कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं
प्रकाशन : शीघ्र ही प्रकाशित पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से), काव्य कुम्भ (साझा संकलन) नीलम पब्लिकेशन, काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन) लायंस पब्लिकेशन।
प्रकाशनाधीन : व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन) किताबगंज प्रकाशन, गिरने में क्या हर्ज है -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह) भावना प्रकाशन। देश विदेश के जाने माने दैनिकी, साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित
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