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शाल्मली: एक मौन सार्थकता

विशाल त्रिवेदी “अल्पज्ञ”
सेंधवा (मध्य प्रदेश)
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आकाश की नीलिमा
को चुनौती देता,
एक दरख्त खड़ा है
नग्न शाखाओं पर
सिंदूरी मशालें जलाए।
उसे मलाल नहीं कि वह
किसी के जूड़े की शोभा नहीं,
न ही उसे दुख है कि
देवताओं के चरणों तक
उसका सफर नहीं पहुँचता।
उसका सौंदर्य प्रदर्शन
की वस्तु नहीं,
वह तो एक ‘होने’ का उत्सव है।
वह खिलता है तब,
जब पतझड़ सब कुछ
छीन लेता है,
जब उम्मीद की टहनियाँ
ठूँठ होने लगती हैं,
तब वह रक्तिम आभा
बनकर फूटता है-
धैर्य का पर्याय बनकर।
उसका धर्म किसी प्रशंसा
का मोहताज नहीं,
वह छाया नहीं देता,
पर आश्रय देता है;
वह खुशबू नहीं बाँटता,
पर रंग भर देता है-
उन रास्तों में, जिन्हें लोग
‘सूखा’ कह कर छोड़ देते हैं।
उसकी सार्थकता उन
पंछियों की चहचहाहट में है,
जो उसकी ऊँचाई पर
भरोसा करते हैं।
सीखना हो तो सेमर से सीखें-
कि समय पर खिलना ही
असल उपलब्धि है,
और जब विदा का वक्त आए,
तो बिना किसी शोर के,
अपनी मिट्टी को लाल
कालीन की तरह सजा कर,
चुपचाप झड़ जाना ही
सबसे बड़ी गरिमा है।
शायद जीवन भी ऐसा ही है-
जो सराहा नहीं जाता,
जो याद नहीं रखा जाता,
वही अक्सर मौसमों के बदलने की
पहली गवाही देता है।

परिचय :- . विशाल त्रिवेदी “अल्पज्ञ”
निवासी : सेंधवा (मध्य प्रदेश)
सम्प्रति : व्यावसायिक रूप से एक अध्यापक के रूप में कार्यरत।
साहित्य सेवा : आप विगत ३० वर्षों से अधिक समय से साहित्य सेवा में संलग्न हैं। एक वरिष्ठ साहित्यकार और वर्तमान में सेंधवा काव्य मंच के संयोजक हैं। आप ‘अल्पज्ञ’ और ‘आदिल’ नाम से लेखन करते हैं।
साहित्यिक पृष्ठभूमि एवं कार्य
प्रारंभिक लेखन : आपने अपने अध्यापन काल से ही साहित्य साधना में रुचि ली और विभिन्न समाचार पत्रों तथा प्रतिष्ठित पत्रिकाओं जैसे कादंबिनी एवं हंस में नियमित रूप से लेखन किया। भारतीय छंद शास्त्र के अध्येता होने के साथ-साथ आप छंदमुक्त कविताओं की रचना भी करते हैं।
प्रकाशन : वर्ष १९९९ में आपका काव्य संग्रह ‘संवेदना’ प्रकाशित हुआ। इसी वर्ष, भजनों का संग्रह ‘माता है दाता’ (माता बड़ी बिजासन की महिमा पर आधारित) भी प्रकाशित हुआ।
विविध विधाएँ : आप गीत, कविता, तथा गज़लों का लेखन कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त, आपने विद्यार्थियों के लिए नुक्कड़ नाटक तथा बाल गीतों का भी सृजन किया है।
प्रसारण एवं संगोष्ठियाँ : आपकी कविताओं का प्रसारण आकाशवाणी, इंदौर द्वारा किया जा चुका है। उज्जैन में अध्यापन काल के दौरान आपने कालिदास अकादमी की साप्ताहिक संगोष्ठियों में नियमित रूप से काव्य पाठ किया।
संपादकीय अनुभव : आपने सेंधवा महाविद्यालय की वार्षिक स्मारिका में संपादक के रूप में भी कार्य किया है।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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