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बाप रे बाप

डॉ. मुकेश ‘असीमित’
गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
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आज हम बात करेंगे ‘बाप’ की। भगवान ने सबको एक ही बाप दिया, लेकिन दुनिया में तो बापों की बाढ़ आई हुई है। हर कोई ‘बाप’ बनने पर तुला है, कोई ‘बेटा’ बनना नहीं चाहता। एयरपोर्ट, ट्रैफिक लाइट या रेलवे लाइन पर झगड़ते लोग अक्सर चिल्लाते मिलते हैं- “तू जानता है, मेरा बाप कौन है?” और कई बार कोई सीधा-सादा आदमी उन्हें जूतों से याद भी दिला देता है कि उनका बाप कौन है।

जिसका बाप विधायक है, वो मोहल्ले में कोतवाल बनकर घूमता है। ‘बाप का आशीर्वाद’ लेकर गालियाँ बाँटता है, लोगों को डराता है। बाप बेचारा अपने बेटों की परवरिश में खुद कूट-कूटकर संस्कार भरता है और बदले में वही बेटे उसके सिर पर सवार होकर बाप के बाप बन जाते हैं। कहते है- “गुरु गुड़ रह गया, चेला चीनी हो गया”, और अब तो बेटा बाप का भी बाप बन गया है, जबकि बाप सिर्फ़ ‘पति’ रह गया है।

घर के हालात भी कुछ कम नहीं- सुबह-सुबह जब बेटा और बहू कहते हैं, “आपसे नहीं होगा पापा… जमानबदल गया है,” तो बाप बेचारा रिमोट की तरह कोने में रख दिया जाता है। चैनल क्या बदलेगा, अब तो उसकी किस्मत ही नहीं बदलती! बाप का असली मूल्य अब एटीएम मशीन से आँका जाता है। जेब में रखे चेकबुक की तरह, ज़रूरत पड़ने पर ही याद किया जाता है। बेटे-बेटियाँ उसका बटन दबाते हैं, और जब कैश खत्म हो जाता है तो उसे “पुराना मॉडल” बताकर वृद्धाश्रम भेज देते हैं।

ज़रूरत पड़ने पर गधे को भी बाप बनाना पड़ता है , और बाप को गधा। सोशल मीडिया पर तो कई ठरकी अपनी डीपी में फिल्मी हीरो का चित्र लगाकर इनबॉक्स में किसी बाला से गुहार लगते फिरते है- “आओ, अपना मिलन हो और मुझे बाप बना दो!” जैसे ही रिक्वेस्ट एक्सेप्ट हुई, इनबॉक्स में ‘बाप बनने की योग्यताएँ’ बताने लगते हैं। इधर मोहल्ले में कोई औरत चौखट से बाहर निकली नहीं कि पाँच ठरकी पीछे दौड़ पड़ते हैं- सबको बाप बनने की जल्दी है। और उधर, जो उम्र घुटनों में बाम लगाने की है, वही लोग अब भी बाप बनने की दौड़ में घुटने घिस रहे हैं।

कभी-कभी यह ‘बाप बनने’ की लहर नेताओं को भी छू जाती है। जो उम्र में परदादा होने चाहिए, वे फिर से पितृत्व की घोषणा करते हैं और फिर उसी वैद्य को कोसते हैं- “बाप तो बना दिया, पर डीएनए के फूट प्रिंट छोड़ दिए !” विज्ञान भी सोच में पड़ गया है कि ऐसी औषधि बनाए जो बाप बनाए भी और साक्ष्य मिटा भी दे। अब तो बाप का असली रुतबा ‘भाई’ ने छीन लिया है। पहले लोग कहते थे- “यह बस्ती मेरे बाप की है।” अब
कहते हैं- “यह इलाका मेरे भाई का है।” घर में बाप का रोल बस बिल चुकाने, पेंशन निकालने, खर्चा देना, घर का किराया भरना, बच्चों के बाप होने के बावजूद “पापा, थोड़े पैसे और चाहिए” सुनते रहना और टीवी के नीचे रखी चप्पलों में सीमित रह गया है।

कभी बाप की चप्पल बेटे को आदमी बनाती थी, अब बेटे की चप्पल बाप की इज़्ज़त उतार देती है। बाप की मेहनत से घर बना, और बेटे ने शान से बेच दिया। बाप की पेंशन बहू के ब्यूटी पार्लर में उड़ जाती है, और बेटा बाप के टूटे चश्मे की जगह गर्लफ्रेंड की सनग्लासेस खरीदता है। विदेश गया भारतीय बाप भी वहाँ का नहीं हो पाता- साल में एक बार इंडिया आता है, बच्चों पर चप्पल बरसा कर ‘बापपना’ ताज़ा करता है। यही उसका देसी स्पा थेरेपी है। और फिर भी, बाप रे बाप! यही बाप है जो बेटे के लिए अपनी चप्पलें घिसता है, ताकि वह अपने पैरों पर खड़ा हो सके। और जब बेटा खड़ा हो जाता है, तो बाप को झुकने पर मजबूर कर देता है।

आज का बेटा चाहता है बाप की दौलत, पर नहीं चाहता बाप का तजुर्बा। चाहता है बाप की छत, पर नहीं चाहता बाप का साया। और बाप… बेचारा सोचता रह जाता है- “कहीं मेरा बेटा भी वही न कह दे- तू जानता है, मेरा बाप कौन है?”
बाप रे बाप!

परिचय :-  डॉ. मुकेश ‘असीमित’
निवासी : गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
व्यवसाय : अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ
लेखन रुचि : कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं
प्रकाशन : शीघ्र ही प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से), काव्य कुम्भ (साझा संकलन) नीलम पब्लिकेशन, काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन) लायंस पब्लिकेशन।
प्रकाशनाधीन : व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन)  किताबगंज   प्रकाशन,  गिरने में क्या हर्ज है -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह) भावना प्रकाशन। देश विदेश के जाने माने दैनिकी, साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित 
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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