
सुधा गोयल
बुलंद शहर (उत्तर प्रदेश)
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पता नहीं लोग कहां से टूटे-फटे पुराने जूते उठा लाते हैं और मंचों पर फेंकने लगते हैं। कुछ को जूते लग भी जाते हैं तो कुछ माइक स्टैंड का सहारा लेकर बच भी जाते हैं। जोश में कुछ लोग अपने नए जूते भी उछाल देते हैं। मैं भी बचपन में कई बार इमली और अमिया तोड़ने के लिए पत्थर की जगह चप्पल उछाल देती थी। पर जब भी चप्पल पेड़ की फुनगी पर अटक गई और लाख कोशिशें के बाद भी नीचे नहीं गिरी तो चप्पल उछालना छोड़ दिया क्योंकि चप्पलों का उछालना कई बार बड़ा महंगा पड़ा।
लोग चप्पल जूते की जगह सड़े टमाटर और सड़े अंडे उछालते हैं जो सामने वाले को घायल कम रंगीन अधिक कर देते हैं। महंगाई का जमाना है पुराने जूते काम आ सकते हैं पर सड़े टमाटर फेंकने के अलावा और किसी काम के नहीं रहते। अब इन्हें कहां फेंका जाए यह आपकी जरूरत पर निर्भर करता है।
सड़कों पर जूते चलना आम बात है। सड़कों पर ना चलेंगे तो और कहां चलेंगे? हां जूते स्वयं नहीं चलते चलाए जाते हैं। चाहे हाथ से चलाएं जाएं या फिर पांव से पर चलेंगे जरूर। पहले जब जूते का चलन नहीं था तब जूते से संबंधित मुहावरे भी नहीं बने थे। एक स्पेशल अस्त्र-शस्त्र से ही लोग अछूते थे। लड़ाई के लिए बेशक हाथ में कुछ हो या ना हो पर पैरों में जूते हों तो काम चल जाता है। पैरों से निकाला और चालू/चलाने के लिए किसी बटन को दबाने की आवश्यकता नहीं। एक जूता चलता है तो सैकड़ों चलने को बेताब हो जाते हैं।
किसी दिलजले ने औरत को पांव की जूती का खिताब दे दिया पर वह यह भूल गया कि जब पैर की जूती सिर पर विराजमान होती है तो क्या हश्र होता है। लोग अपना उल्लू सीधा करने के लिए चांदी का जूता भी चलाते हैं जिसकी मार बड़ी मीठी और सुखदाई होती है। यह तो भुक्त भोगी ही समझ सकता है। वैसे भी आजकल चांदी के दाम आसमान छू रहे हैं।
एक बार मैं जूते खरीदने एक दुकान पर गई। छूटते ही दुकानदार ने पूछा- “बहन जी कौन से दिखाऊं पहनने वाले या खाने वाले”?
पहले मैं जरा चौकी फिर उत्सुकता जागी तो बोली और क्या-क्या क्वालिटी है? कोई लेटेस्ट ट्रेंड? मुझे भी आनंद आने लगा था।
दुकानदार बोला- “देखिए मैडम जूता खाने की नहीं खिलाने की चीज है। जूता ऐसा शस्त्र है जिसका अपना शास्त्र है”- और फिर वह अलग-अलग ब्रांड के जूते निकाल कर दिखाने लगा।
“देखिए मैडम यह एक नया ब्रांड है। इज्जत उतार जूता। टारगेट को हिट करके वापस आने की पूरी गारंटी है। आजकल इसके बहुत डिमांड है। यह दूसरा देखिए, जूता नहीं मिसाइल है बेशर्मों की धज्जियां उड़ा दे, उन्हें धो कर रख दे।”
मुझे सोच में डूबा देकर दुकानदार बोला- “मैडम जूते किसके लिए लेंगी? आप अपने लिए या साहब के लिए?
मैंने चौंक कर दुकानदार की ओर देखा। उसकी आंखों की चमक बता रही थी कि जूते की खरीदारी में ही समझदारी है। वह चाहे साहब के सिर की सवारी करें या मैडम के पैरों की।
जूता का ऐसा शास्त्र मेरे सामने पहले नहीं आया था। तभी कुछ सिरफिरे जूता लेकर मंत्रियों पर दौड़ पड़ते हैं। जूता और जूते वाला दोनों रातों-रात प्रसिद्धी के शिखर पर पहुंच जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय ख्याति वाले बन जाते हैं। संसद में जूते का चलन मीडिया वाले खूब दिखते हैं।
जूते की तीन बहने-जूतियां, चप्पल और सैंडल हैं जो अक्सर जूते की मर्दानगी के साथ-साथ स्वयं भी दो-चार हाथ आजमा लेती हैं। वैसे ज्यादातर सैंडल चप्पल और जूतियां ही शोकेस में सजी-धजी मुस्कुराती ललचाती रहती हैं। किशोरियों उनकी मजबूती पर कम खूबसूरती पर अधिक ध्यान देती हैं। इसलिए हाथ में कम लेती हैं। जैसे नई-नई जूतियां ज्यादा चरमराती हैं वैसे ही चप्पलें भी जल्दी उखड़ जाती हैं। खैर यह तो पहनने पहनाने या खरीदने वाले जाने पर मैं तो कहूंगी कि बाप के पैर का जूता बेटे के पैर में आकर गायब होने लगा है। इसका दुनिया में शोर मचा है।
बस आज जूते की बात इतनी ही क्योंकि पतिदेव के हाथों में जूते का डिब्बा मुझे दीखने लगा है अभी-अभी बाजार से लौटे हैं। पता नहीं ऊंट किस करवट बैठे?
परिचय :– सुधा गोयल
निवासी : बुलंद शहर (उत्तर प्रदेश)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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