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“कवि, कविता और वो …”- कवि शब्दशेखर ‘उन्मुक्त’

डॉ. मुकेश ‘असीमित’
गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
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कवि के लिए कविता जैसे चौथ का चाँद, और कवि जैसे चकोर- एकटक निहारता हुआ अपनी कविता को… कविता ही उसकी ओढ़नी, बिछावन, सब कुछ। कवि महोदय की रातें और पत्नी की नींद के बीच छिड़ जाती है छंदों की जंग। बस दिख जाए कविता- विचारों के उमड़ते-घुमड़ते बादलों के बीच कहीं एक झलक मिल जाए, एक पूँछ सी ही नजर आ जाए, फिर तो खींच के निकाल लेंगे बाहर! कवि बेचारा, कविता का मारा- मारा-मारा फिरता है जंगल में। कविता जैसे बाघिन- दिखेगी तभी ‘साइटिंग’ होगी। ‘दिखेगी तनिक गम्म तो खाओ! कवि अपनी लेखनी की बंदूक ताने बस फिरता है दिखे कहीं, तो करे शिकार। पूरी कविता नहीं तो पूँछ ही मिल जाए, उसी को ले जाकर दिखा देंगे! कविता की पूँछ पकड़ना भी बहुत ही “कवियोचित”, काम है, मित्र।
इधर कवि से अग्निसमक्ष सात फेरे लेकर आयी वो ..यानी कि कवि की भार्या करवा चौथ के व्रत में कवि का दीदार करने को आतुर, और कवि टहल रहा है छत पर अपने खोए हुए प्रेम की तलाश में। कवि का एकतरफा प्यार… कविता डरी-सहमी सी, सिकुड़ी सी, आंसू भरे डर के मारे…छुपी पडी है ! उसे डर है, बाहर निकलते ही, ‘मुआ’ छेड़ेगा उसे।
ऐसे ही हैं कवि शब्दशेखर ‘उन्मुक्त’। वो ‘कवि’ हैं ‘कवि’ कहलाना पसंद करते हैं। खुद के द्वारा, खुद के लिए, स्वघोषित कवि ऐसे छंदबद्ध, स्थितप्रज्ञ की तरह निर्लिप्त भाव से आत्ममुग्ध! न मंच देखें, न बिस्तर। सुबह उठते ही जब लोग कुल्ला करते हैं, ये कुल्ले से “काव्य-ध्वनि” निकालते हैं “गर्गल कल-कल ध्वनि में करें कविता!”
प्रेमिका से मिलन से पहले लोग चेहरा सँवारे, ये कविता मिलन के लिए अपना गला सँवारें चाहें उसे नेशनल हाईवे की तरह चिकना बनाना ताकि कविता सरपट दौड़े इनके गले से! नींद खुलते ही या नींद में ही कविता-पन इनका जागृत, सतर्क! न दिन देखें, न रात। न बात, न करामात।
बस जब जी चाहे शुरू कर दें कविता का प्रलयंकारी प्रवाह! कभी 3 बजे उठ जाएँ, तो पत्नी संग मनुहार करें “प्रियंवदा! श्रवण करो! यह मुक्तछंद तुम्हारे लिए ही जन्मा है।”
श्रीमती जी, जो स्वप्न में नींबू और प्याज की बढ़ती महंगाई, रसोई में खत्म होते जा रहे सिलेंडर की समस्या से जूझ रही होती हैं, चौंककर उठती हैं
“कौन मर गया?” कोई नहीं… भाग्यवान! क्यों हमेशा मरने-मारने की बात करते हो… इसे श्रवण कर लो प्रिये… कविता मर जाएगी अगर तुरंत मैंने इसे नहीं सुनाया तो! दिन में वे पतीले खटखटातीं, और रात में कविताएँ चखतीं। पूर्ण निशाकाल कविता-ज्वर चढ़ता।
बिस्तर में कविता की ऐसी दरिया बहती है कि असली दरिया भी जलन से सूख जाए! रात में कभी भी कविता लग जाए बहुमूत्र रोगी की तरह! उम्र भी हो गई है अगर समय से बाथरूम न भागे तो बिस्तर गीला हो जाए। समय से कविता न सुनाएँ तो… कविता लगने का प्रेशर भी ब्लैडर फुल होने जैसा ही है साहब! ‘लूज़ मोशन’ आने जैसा है यह भी… कविता न सुनाएँ और अगर शब्दशेखर जी के सिर पर चढ़ जाए तो मित्र! कहीं पगला-वगला न जाएँ यह डर रहता है उनकी भार्या को।
शब्दशेखर की ‘गोल्डन नाइट’ भी ‘पोएट्री नाइट’ की तरह मनाई गयी मोहल्ले में सब सो रहे थे, सिर्फ़ दो आत्माएँ जाग रही थीं एक नवकवि और दूसरी नवविवाहिता। “सुनो न,” उन्होंने आँख मिचमिचाते हुए करवट बदली, “फिर वही… कविता?” नवकवि महोदय पलंग पर पालथी मारे, हाथ में मोबाइल लिए, फेसबुक लाइव में व्यस्त थे। बाल बिखरे हुए, आँखें चमकती हुईं, और होंठों पर छंदमयी मुस्कान।
“श्रीमती जी,” वे बोले, “देखिए तो सही, कितनी प्यारी लाइन निकली है ‘तेरी यादें बिछी थीं बिस्तर पर, मैं लेटा तो कविता बह निकली…’कृपा मत बहाइए, बिस्तर गीला हो जाएगा कविता से? श्रीमती जी ने तकिए को पीछे सरकाते हुए संशय व्यक्त किया। उपमा, कविताओं में बिल्कुल घरेलू, जमीनी स्तर की “तुम्हारी आँखें जैसे भिंडी के फूल पर गिरी ओस की एकांत बूँद!”
श्रीमती जी चिल्ला उठती हैं “अबे ओ कविराज! ये कविताओं में सब्ज़ियाँ न घुसाया करो! सपना भी सब्ज़ी मंडी का आता है!
वैसे ही सब्ज़ियाँ इतनी महंगी हैं इन्हें कविता में प्रयोग में लोगे तो खायेंगे क्या?” एक रात तो हद ही हो गई पत्नी बोलीं, “अब बहुत हुआ! या तो तुम कविता लिखो, या तलाक़नामा!”
कवि जी बोले- “क्या शानदार काव्य-अंतरा दिया है तुमने!
‘तलाक़नामा’- बहुत खूब! इसे मैं अगली कविता का शीर्षक बना लूँगा!” अब वे अपनी नई कविता में “तलाक़नामा” के विविध प्रतीकत्मक प्रयोग की मशक्कत कर रहे हैं।

परिचय :-  डॉ. मुकेश ‘असीमित’
निवासी : गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
व्यवसाय : अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ
लेखन रुचि : कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं
प्रकाशन : शीघ्र ही प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से), काव्य कुम्भ (साझा संकलन) नीलम पब्लिकेशन, काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन) लायंस पब्लिकेशन।
प्रकाशनाधीन : व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन)  किताबगंज   प्रकाशन,  गिरने में क्या हर्ज है -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह) भावना प्रकाशन। देश विदेश के जाने माने दैनिकी, साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित 
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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