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पहली पाती प्रेम की

माधवी तारे
लंदन
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सुनते-सुनते गजल जगजीत की
याद आई पहली पाती प्रेम की
गुणों के बखान भर से कृष्ण को
रुक्मिणी ने लिख भेजी बात मन की
काल बदला हाल भी
प्यार की न अब बात भी
देखने की खूबसूरती
बात कहां अब प्यार की
इसे छोड़ उसे पकड़
फिर भी स्नेह की नहीं खबर
इस शिप से उस शिप में जाती
रहती आज की जेन ज़ी
प्रेम के सुनहरे रंगों में हम
जी रहे हैं पतझड़ को हम
प्रेम की पाती फिर भी मन में
पहली धक-धक, पहली याद
गहरे कहीं अब अपने साथ
आज की बात हलांकि कुछ और ही
प्यार व्यार सब व्यापार
प्यार बचा सिर्फ शब्द
भावनाएं खो गई कहीं

परिचय :-  माधवी तारे
वर्तमान निवास : लंदन
मूल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश)
अध्यक्ष : अंतर्राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच (लन्दन शाखा)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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