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कोयल की कॅूक

डॉ. सुरेखा भारती

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दीदी sss ……ओ दीदी !
आंगन में झाडू लगा रही मुन्नी, आवाज लगी रही थी। अब इसको क्या हो गया….. मैंने झल्लाते हुए अन्दर से ही बोला, क्या है? क्यो चिल्ला रही हो..?
दीदी बाहर तो आओ sss …..
मैं बाहर आंगन में पहुंची, देखा मुन्नी दीवार के एक कौने मैं चुपचाप खड़ी है। ‘देखो…देखो कोयल कॅूक रही है…..’। उसे देखकर मैं ने भी सहसा कोयल की बोली सुनने का प्रयत्न किया। दूर कही कोयल बोल रही थी, कुछ पल के लिए मुझे भी अच्छा लगा।
थोडी देर मुन्नी उसकी आवाज सुनती रही। कोयल की बोली बंद हो गई। उसने मेरी तरफ देखा और कहने लगी – दीदी, गाँव में हमारे आंगन में बड़ा सा आम का पेड़ था। इन दिनों कोयल उस पर बैठ कर कॅूकती थी, मैं भी उसके जैसी आवाज निकालकर उसे चिढ़ाती थी, फिर वह चूप हो जाती, फिर थोडी बाद कूँकती थी।
अब शहर में आ गए हैं, अब कहाँ कोयल की कूक सनाई देती है। मेरा सारा दिन तो इसके-उसके यहाँ काम करने में चला जाता है। वकील साहब ने इतना बडा़ बंगला दिया है, रखवाली करने के लिए, पर हम तो एक कमरे में ही, दोनो मियां-बीबी और तीन बच्चे रहते हैं। यहां मन नहीं लगता। लगता है अभी चली जाऊँ अपने गाँव। अपनी जमीन, अपना घर अपना ही होता है।
मैंने देखा यह कहते हुए उसकी आँखें भर आई हैं, आँसू छलक ही रहें थे कि कोयल ने फिर से कूकना शुरू किया, और मुन्नी के चेहरे पर मंद मुस्कान उभर आई।

परिचय :- डॉ सुरेखा भारती
कवियत्री, लेखिका एवं योग, ध्यान प्रशिक्षक इंदौर 


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