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बेटियां

नम्रता गुप्ता
नरसिंहपुर

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मै कहानियों की दुनिया की
सैर कराने आयी हूं
अपने ही एक किरदार को
मै आज समझने आयी हूं
बेटी बन में आज बेटी की
परिभाषा बतलाने आयी हूं

कहानी की कोई परी
होती है बेटियां
नाजुक छुईमुई सी
होती है बेटियां

जरूरत पड़े तो काली बन
संहार करती है बेटियां
नया सृजन कर दुनिया
बनाती है बेटियां
फिर क्यों दुनिया पर ही
बोझ कहलाती है बेटियां

फूल की कोमल कली सी
होती है बेटियां
पल-पल अपनी जड़ों को
मजबूत करती है बेटियां

पापा की राजदुलारी
होती है बेटियां
मां की परछाई
कहलाती है बेटियां
वन को उपवन बनाती है बेटियां

बहू के रूप में दो कुलों को
जोड़ देती है बेटियां
मुश्किल वक़्त में सूर्य की
किरण होती है बेटियां
फिर अपने प्रियतम की
अर्धांगिनी बन जाती है बेटियां

अम्बर से धारा को रोशन
कर देती है बेटियां
जब मानव जन्म कर मां
कहलाती है बेटियां
रातों को अपनी बच्चो पर
वारती है बेटियां
तो कभी नजर उतारती
नजर आती है बेटियां

पतझड़ में भी शहदाब सा
लहरती है बेटियां
जब दादी-नानी बन कहानियों की
बरसात कराती है बेटियां
ज़िन्दगी के हर सफर में कितने
किरदार निभाती है बेटियां
शायद इसलिए दुर्गा, काली,
भगवती कहलाती है बेटियां

परिचय :- नम्रता गुप्ता
जन्म : १९ जुलाई १९९२
शिक्षा : एमसीए आरजीपीवी विश्वविद्यालय से
निवासी : नरसिंहपुर
कविता लेखन में गहरी रूचि


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