
द्रोणाचार्य दुबे
कोदरिया महू इंदौर (म.प्र.)
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मैं रोटी कैसे खाऊं मेरा बच्चा भूखा सोया
आज न जाने किन गलियों में मेरा बेटा खोया।
मेरे कलेजे का टुकड़ा मुझसे रुठा आज है वो
मेरी आंखों का तारा मेरे दिल का साज है वो
वृद्धाश्रम में उसे याद करके मेरा दिल है रोया
मैं रोटी कैसे खाऊं मेरा बच्चा भूखा सोया
आज न जाने किन गलियों में मेरा बेटा खोया।
पूत कपूत भले ही हो माता कुमाता नहीं होती
बच्चों की याद में माता की आंखें सदा ही रोती
संस्कारों में मेरे कमी थी जो ऐसा बीज बोया
मैं रोटी कैसे खाऊं मेरा बच्चा भूखा सोया
आज न जाने किन गलियों में मेरा बेटा खोया।
मैं भले ही दुख में रहूं पर दुख न उसे कभी आवे
मैं भले ही उसे याद करूं मेरी याद न उसे सतावे
आंसूओं की बारिश ने मेरा आंचल है भिगोया
मैं रोटी कैसे खाऊं मेरा बच्चा भूखा सोया
आज न जाने किन गलियों में मेरा बेटा खोया।
मैं रहूं या न रहूं पर वो सदा ही खुशहाल रहे
ईश्वर का आशीर्वाद भी सदा उसके भाल रहे
मैंने उसे माफ करके उसका कलंक है धोया
मैं रोटी कैसे खाऊं मेरा बच्चा भूखा सोया
आज न जाने किन गलियों में मेरा बेटा खोया।
परिचय :- द्रोणाचार्य दुबे
निवासी : ग्राम कोदरिया महू
सम्प्रति : सहायक प्राध्यापक
विशेष : महू अंचल में कई ग्रामीण अंचलों में कवि सम्मेलनों के संयोजन का कार्य किया है । हिंदी तथा मालवी भाषा में कविता पाठ करते हैं। नवोदित साहित्यकारों को प्रोत्साहित करना तथा मंच प्रदान करना प्रमुख लक्ष्य है। विभिन्न समाचार पत्रों में रचनाएं प्रकाशित होती रहती है।
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