
विशाल कुमार महतो
राजापुर (गोपालगंज)
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बुद्धि, विवेक और भाषा ज्ञान की
सबकुछ हमें सिखाया है,
मंजिल की सीढ़ी चढ़ने का
एक मुक्ति-मार्ग दिखलाया है,
शिक्षा की उस वट-वृक्ष की,
मजबूत शाखा और डाली है,
हे गुरुवर आपके चरणों की
वो छाव कितनी निराली है।।दिए हुए उस ज्ञान की दीपक,
हरपल तन-मन मे जलते हैं,
गुरुजनों का ज्ञान पाकर ही,
इस जग में आगे बढ़ते है।
कर संघर्ष जीवन मे,
अपने सदा ही अच्छा करते हैं,
और जो न तरे सौ तीर्थ से,
वो गुरु के ज्ञान से तरते है।
मानव के तन में शब्दों की
शक्ति गुरु ने ही तो डाली है,
हे गुरुवर आपके चरणों की
वो छाव कितनी निराली है।।बिना गुरु कृपा के जग में
कितने शिष्य अधूरे है,
हुवे ज्ञानी सदा वही,
जो गुरु आदेश से जुड़े हैं।
गुरु ही ब्रह्मा, गुरु ही विष्णु,
गुरु ही रूप करुणे है,
कुछ काम जीवन मे पूरे हैं,
कुछ गुरु बिना ही अधूरे है,
गुरू की ज्ञान सूरज की रौशनी
और किरणों की लाली हैं,
हे गुरुवर आपके चरणों की वो
छाव कितनी निराली है।।“सूरज की रौशनी वाली सुबह,
और किरणों वाली शाम लिखता हूँ,
माता-पिता के स्नेह-प्यार में
इस जग का चारो धाम लिखता हूँ,
आपके ही सेवा में बीते जीवन,
यही कला कृति और काम लिखता हूँ,
हे गुरदेव हृदय से सादर आदर पूर्वक,
आपके चरणों मे प्रणाम लिखता हूँ।।”
निवासी : राजापुर (गोपालगंज)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।
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