
महेन्द्र सिंह कटारिया ‘विजेता’
सीकर, (राजस्थान)
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घनघोर घटाओं में
विपदा की कौंध अपार,
सखी कैसे गाएं गीत मल्हार।…..
मच रहा चहुंओर हाहाकार,
कोरोना महामारी से हुआ
जीवन बड़ा दुश्वार।
फैली है बेकारी
ठप हुए सारे कारोबार,
न कहीं मंगलाचार,
न लगे कहीं कोई त्यौहार।
बाग-बगीचों में
ना कोई मधुर बहार।
सखी कैसे गाएं गीत मल्हार।…..
विरहा की बदरी से
हो रही फुहार,
मानों प्रकृति ने
किया न कोई श्रृंगार।
कही विपदा की घनी बौछार,
सब जन अच्छे दिनों की
राह रहे निहार।
भय की उत्कंठा से
पार न करते देहरी द्वार।
सखी कैसे गाएं गीत मल्हार।…..
दुश्वारी चुनौतियां
खड़ी सामने मुँहवार।
आंतक का अत्याचार,
युवा है बेरोजगार।
भ्रष्टों ने फैला रखा भ्रष्टाचार।
रूका न अभी
कहीं व्यभिचार।
लाचार सी खड़ी है
सारी सरकार।
सखी कैसे गाएं गीत मल्हार।…..
सपनों में अभी है
सुखद भविष्य का इंतजार।
फिर से होगी
देव अतिथियों की
वही मनुहार।
चाहे शत्रु करें कितना ही
प्रचण्ड प्रहार।
सीना तान खड़े वीर
बन पहरेदार।
बैरी दौड़ेगा दबे पाँव
सुन वीरों की हुंकार।
सखी कैसे गाएं गीत मल्हार।…..
परिचय :- महेन्द्र सिंह कटारिया ‘विजेता’
निवासी : सीकर, (राजस्थान)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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