
सरिता चौरसिया
जौनपुर (उत्तर प्रदेश)
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अंधकार को चीर कर
आती झींगुर की आवाजे
सनसनाती हुई
हवाओं का झोंका
पेड़ों के झुरमुट से
झांकता, ताकता,
चांदनी की झिलमिल
आहट सन्नाटा…
छू जाती है अंतर्मन को।कौन कहता है?
सन्नाटे से डर लगता है?
हां, लगता है डर,
बिल्कुल लगता है
मुझे भी लगता था बहुत डर,
जब मैं छोटी थी,
हर सन्नाटे से
कांपता था मन
हर कोने को ताड़ता था मन,
शायद कोई झांक रहा हो,
खट पट की आहट पर,
लगता कोई
मुझको डरा रहा हो।।आज परिस्थिति उलटी है,
नही लगता डर
अब किसी सन्नाटे से,
किसी अंधेरे से
अब तो अच्छा लगता है एकांत
एकांत ही मन की शान्ति है
अब तो झींगुर की आवाज में
भी संगीत सुनाई पड़ता है,
चांदनी के झिलमिल
में प्रकाशित होता
मन जाना चाहता है
विश्रांति की ओर
रोजमर्रा की
जिम्मेदारियों के बीच
अब खुद को तलाशता है मन
नही लगता अब
कभी सन्नाटे से डर,
यही है जो मुझे मुझसे
साक्षात करवाता है,
मुश्किल है भीड़ में
अपने को ढूंढ़ पाना,
इसलिए प्रिय है एकांत
अब पूछते हैं सब की
तुम्हे डर नहीं लगता?
हां, नही लगता
क्यूं, क्यूं…? क्योंकि
अब मैं बड़ी जो हो गई हूं।।
परिचय :- सरिता चौरसिया
पिता : श्री पारसनाथ चौरसिया
शिक्षा : एम. ए. हिंदी (बी.एड.)
जन्म स्थान : जौनपुर (उत्तर प्रदेश)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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