
काबिलियत
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रचयिता : संगीता केस्वानी
आज ज़ीनत बहुत खुश है, मानो भाव -विभोर है, कि जैसे उसके आखों से आँसू नही थम रहे और होठों पे एक प्यारी सी मुस्कान है। हो भी क्यों न आज उसे अपनी मेहनत और तपस्या का फल जो मिला था। आज “रज़िया” ने दसवीं की परीक्षा में पूरे स्कूल में टॉप किया है। उसकी सफलता और ट्रॉफी देख अनायास ही रो पड़ी और यादों के गलियारे से होते हुए उसे वो सारे मंज़र याद आगये, जब अहमद ने उसकी काबिलियत पर सीधा-सीधा तंज कसा था और उसे तलाक का जोरदार तमाचा मारा था।जो शारीरिक रूप से ना सही मगर मानसिक रूप से उसे घायल कर गया था।
आज मानो उसका सारा सफर, मेहनत और संघर्ष उसकी आँखों के सामने एक चल -चित्र सा घूम रहा था।जो उसने अपनी बेटी रज़िया को इस काबिल करने में तय किया था। अहमद से अलग होने बाद से लेके उसके जॉब और जीवन-चक्र को चलाने की जदओ- जेहद और बेटी को एक अछी परवरिश देने का उसका संगर्ष मानो आज सार्थक होता दिखाई दे रहा था।
आज ज़ीनत को अपनी मेहनत पर गर्व और अहमद की छोटी सोच पर अफसोस हो रहा था, जिसने उसे ये कहके तलाक दिया था, कि बेटियाँ इतनी काबिल नही होती जितना बेटे साबित होते है।
समय का फेर देखो, आज उसी अहमद का बेटा ,”फारूख” उसी “रज़िया” से मदद मांगने आया है,जो आज अखबार की सुर्खियां बटोरती आसमान की बुलंदियां छू रही है।
लेखिका परिचय :- संगीता केस्वानी
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