
भीमराव ‘जीवन’
बैतूल (मध्य प्रदेश)
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नफ़ा देखकर सौदा करती,
दिल्ली कारोबारी।
दस हजार में बिका आज फिर,
अपना चमन बिहारी।।
आसमान में धूल धुएँ ने,
चहुँदिक पैर पसारे।
अर्थ समझने में शब्दों के,
चश्में भी सब हारे।।
लालच के सिर चढ़ कर बैठी,
फिर से नई उधारी।।
दस हजार में बिका आज फिर,
अपना चमन बिहारी
आजादी के अमृत काल में,
छल ने किए धिंगाने।
छीन निवाले हाथों से फिर,
पकड़ा दिए फुटाने।।
ली समेट फिर बहुरे बल की,
हरी-भरी फुलवारी।।
दस हजार में बिका आज फिर,
अपना चमन बिहारी।।
प्यास हुई बेकाबू, जल के,
झरने सूखे सारे।
आश्वासन की ड्योढ़ी से हम,
आस लगाकर हारे।।
ज्ञान कोठरी पर ताले जड़,
छलता रहा लबारी।।
दस हजार में बिका आज फिर,
अपना चमन बिहारी।।
आँतों की हड़ताल हुई ज्यों,
दौड़े भूखे बंदे।
बीज बताकर छलनाओं ने,
रोप दिए थे फंदे।।
देख छटपटाते जीवन को,
खुश है आज शिकारी।।
दस हजार में बिका आज फिर,
अपना चमन बिहारी।।
निवासी : बैतूल मध्य प्रदेश
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।
