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नौकरिहा दामाद

प्रीतम कुमार साहू ‘गुरुजी’
लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़)
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(छत्तीसगढ़ी कहिनी)

गाँव के गउटियाँ कहत लागें दुकलहा करा कोनो जिनिस के कमी नइ रिहिस। खेत, खार, धन दउलत, रुपिया, पइसा सबों जिनिस रिहिस। सादा जीवन उच बिचार के रद्दा म चलत दुकलहा अउ दुकलहिन मजा म जिनगी बितावत रहय। फेर संसो के बात ए रिहिस कि उँकर एके छिन बेटी चँदा जेकर बर नौकरिहा सगा देखत-देखत चार बछर होगे रिहिस। चँदा के उमर चालीसा लगे बर दु बछर कम रिहिस। सगा मन ठिकाना नइ परत रिहिस।
ऐसना बेरा म पचास एकड़ खेत के जोतनदार बने रोठहाँ सगा धर के सुकलहा हर अपन मितान दुकलहा करा आनिस। फेर दुकलहा हर ये कहिके सगा मन ल मुँहाटी ले लहुँटा दिस के लइका के कुछु नौकरी चाकरी नइ हे कहिके। मोर बेटी ह अतेक पढ़े लिखे हे त नौकरिहा दामाद होना चाही।
पाछु सुकलहा हर कहिस घलोक देख मितान खेती किसानी का नौकरी ले कम आय ! मनखे के चाल चलन अउ चरित ह पबरीत होना चाही। जुग जोड़ी बने रहय। बर-बिहाव हर जनम-जनम के बँधना होथे। सिरीफ नौकरी ल देख के मनखे ल बने नइ समझना चाही। फेर दुकलहा ल तो नौकरिहा दामाद के भूत संवार रिहिस।
बिसौंधी के कटे ले दुकलहा हर गदकत बिहाव के कारड ल देवत कहिस, मोर बेटी चँदा के बिहाव अकती भाँवर म माढ़े हे मितान सपरिवार आहु। त सुकलहा हर कहिस ले बने होगे मितान जेसन दामाद जोहत रेहेस तेसना दामाद मिलगे।
गाँव भर ल झारा मांदी खवावत, बने बाजा गाजा के संग अकती भाँवर म अपन बेटी चँदा के बिहाव ल करिस।
बेटी चँदा अपन जुग जोड़ी संग सुग्घर जिनगी ल जिए लगिस।
फेर मनखे के चाल चलन ह कहाँ ले छुपाही पंद्रही के बीते ले चँदा के गोसइय्या कचरू के चाल चलन ह दिखे लगिस। गाँजा भांग अउ मंद महुँआ के पियइय्या कचरू के असल चरित ह उजागर होय लगिस।
जनम के कोढ़िहा अलाल कचरू ददा के सरग सिधारे के पाछु अनुकम्पा म सरकारी बाबू बने ले कचरू के जिनगी हर सुधरे के बजाय अउ बिगड़ गे रिहिस।
पुरखा के दस अकड़ खेत ल ताश जुआ म उड़ा डरिस। चार काठा के खेत ले देके बाँचय रहय। उहू म कचरू के रोज-रोज के पियइ-खवई म का बाचही। ऑफिस ले घर अतिस त रोज लटलट ले पिय के घर अतिस। रोज-रोज के झगरा अउ मार ले चँदा हर दुबरागे रिहिस।
कचरू के असल चरितर ले तँग आके चँदा हर भाग के एकेझन मइके आगे।
चँदा हर सुसकत अपन गोसइय्या के असल चरित ल उजागर करिन अउ जम्मों दुःख पीरा ल बने फरिहार के बताय लगिस। चँदा के पीरा ल सुन के दाई-ददा के आँखी डहर ले आंसू के धार बोहागे।
अब तो दुकलहा ल अपन मितान सुकलहा के गोठ हर रहि-रहि सुरता आय लगिस। दुकलहा हर माथा ल धर के बइठगे अउ कहे लगिस मोला माफ़ कर दे बेटी ऐमा मोरे गलती आए। नौकरिहा दामाद के मोला भुत सवार होगे रिहिस जेन मे हर रिस्ता जोरे खातिर कचरू के असल चरित ल देखे के बजाय सिरीफ उँकर नौकरी ल देख के रिस्ता ल तय कर देव।

परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक)
निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)
घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।

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