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बिन पते का पत्ता

ललित शर्मा
खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम)
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हरा-भरा, नीला-पीला
पेड़ की डाली का
मैं बस पत्ता कहलाता हूँ,

तना, डालियों, शाखाओं का
मामूली सा रंगबिरंगी पत्ता,
पेड़ की स्वाभिमान बढ़ाता हूँ
पेड़ का जीवनसाथी बनकर
मैं तो मामूली पत्ता कहलाता हूँ,

पेड़ की रौनक क्या है
प्रकृति की रौनक क्या है,
चार चांद लगाने आता हूँ,
मैं मामूली सा पत्ता कहलाता हूँ,

हरियाली को हरदम
हरा भरा खिलाता हूँ,
मैं प्रकृति की आज्ञा से पहले
पेड़ की डाली में आ नहीं पाता हूँ
हरा-भरा खिलाखिला
मुर्झाता छोड़ चला जाता हूँ,

हवा आंधी तूफान का
भरोसा नहीं कर पाता हूँ
अस्तव्यस्त प्रकृति में
हरा भरा सा खुशहाल
बेहाल बनकर तमाशा सा
जमीन पर उतर आता हूँ

अस्तित्वहीन, मूकदर्शक
निर्जीव मुर्झाया मृत सा
न जाने कहाँ कौन सी दिशा में
दूर दर-दर की ठोकरों में
जमीन के कण-कण में
समय चक्र की भांति
कालचक्र में समा जाता हूँ
कल सुहाना, फिर बेगाना
कहीं जलाकर राख
कहीं बनाते खाद
कहीं कचरे के ढेर में
मेरा होता हिसाब
न जाने किसे क्या दे पाता हूँ
मैं तो पेड़ का पत्ता
बस कहलाता हूँ
प्रकृति के नियमों में
आकर लौट जाता हूँ
अपना पता
मैं पत्ता बता नहीं पाता हूँ।

परिचय :- ललित शर्मा
निवासी : खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम)
संप्रति : वरिष्ठ पत्रकार व लेखक
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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