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दीपशिखा

सुधा गोयल
बुलंद शहर (उत्तर प्रदेश)
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आज उनकी मृत्यु को पूरा एक बरस हो गया है। मैंने उन्हें भुलाना चाहा है, पर वह एकांत के क्षणों में मेरे मन मस्तिष्क पर छा गई है। उसका व्यक्तित्व हावी हो गया है। वह मेरी पत्नी थी। अग्नि के सम्मुख सप्तपदी की साक्षी मेरी ब्याहता पत्नी उमा, जिसे मैंने पत्नी से अधिक कुछ नहीं समझा।
पत्नी यानि पति का नाम, पति के बच्चे, पति का घर, रोटी कपड़ा यही सब एक पत्नी को चाहिए और मैं देता रहा। इसके अलावा भी और कुछ उसे चाहिए या मुझे कुछ देना है, इस कुछ को मैंने मात्र अपने लिए समेटे रखा। उसने भी कभी कुछ नहीं कहा। कभी कहीं असंतोष का भाव उसके चेहरे पर नहीं आया। वह पूर्णतया खुश थी।
एक पत्नी को जो चाहिए था वह उसे मिला था। पति के रुप में मैं देने के योग्य था। तीस सालों तक वह मेरे साथ रही। पत्नी इतने दिनों तक एक आदत बन जाती है। यह मैं मानता हूं, पर आदत से प्रेम किया जाता है, या प्रेम और आदर एक दूसरे के पूरक हैं, मैं ऐसा नहीं मानता। आदमी जानता है कि फलां आदत गलत है उसे छोड़ देना चाहिए। इसके लिए प्रयत्न भी करना चाहिए। अतः जिसे प्रेम किया जाता है उसे छोड़ा नहीं जा सकता। इसलिए मैं कह रहा हूं कि पत्नी एक आदत है।
जिस कुछ को मैंने सहज भाव से अपने लिए समेटे रखा था, उस कुछ को पाने की कितनी लालसा उसमें थी, यह मुझे उसकी डायरी पढ़ कर ही पता लगा। मैं तो समझता था कि उसे लिखना पढ़ना कुछ भी नहीं आता। मानवीय अनुभूतियों को वह गंवार क्या समझे।कितनी बड़ी भूल थी। कितना मिथ्या अंहकार था। ज्यों-ज्यों डायरी के पृष्ठ पलटता गया मैं उसके सामने हारता गया। पृष्ठों से उसका चेहरा एक दिव्य आभा के साथ झांकने लगा। मेरी आंखें शर्म से झुकने लगीं। वह हारकर भी जीत गयी और जिसे मैं अपनी जीत समझे बैठा था वह सचमुच मेरी हार निकली। मैं अपनी ही दृष्टि में गिर गया।
औरत कितनी भी भोली हो, कितनी भी नासमझ हो, पति के दिल की भाषा पढ़ने की शक्ति उसके पास अवश्य होती है। बेशक वह मुंह से कुछ न कहें। स्वंय पूरा जीवन दीपशिखा सी जलती रहती है। उफ़ नहीं करती। कितना धैर्य है उसमें। क्या पुरुष इतना धैर्यवान है।तिल-तिल स्वंय को जलाकर प्रकाश देना कोई औरत से सीखें। इन तीस सालों में मैं एक बार भी उसे नहीं समझ सका। हालांकि बुद्धिजीवियों में मेरी गणना होती है। मेरी विद्वता का सब लोहा मानते हैं। मैं पूरा समय किताब के काले अक्षरों को पढ़-पढ़ कर महानता व बुद्धिमता का मुखौटा लगाए स्वंय को भरमाता रहा, पर इन्सानी दिलों को पढ़ने की ताकत स्वंय में पैदा न कर सका। इंसान का
मन पढ़ने के लिए किसी स्कूल कालेज की आवश्यकता नहीं होती। व्यक्ति के क्रिया कलाप और आचरण स्वंय ही सब कह देते हैं।
उमा ने बहुत जल्दी मुझे खुली किताब की तरह बांच लिया था और स्वंय को मेरी इच्छानुसार ढ़ाल लिया था। आज मैं जितना भी सोचता हूं मेरा सिर ग्लानि से झुकता जाता है। मैं अपनी ही दृष्टि में गिर गया हूं। उमा मरकर अमर हो गयी है। वह कुछ जो मैंने अपने लिए सुरक्षित रखा था, उमा की महानता के आगे कुछ भी नहीं है।
उमा ने बहुत जल्दी मुझे खुली किताब की तरह बांच लिया था और स्वंय को मेरी इच्छानुसार ढ़ाल लिया था। आज मैं जितना भी सोचता हूं मेरा सिर शर्म से झुकता जा रहा है। वह कुछ जिसे मैंने अपने लिए सुरक्षित रखा था उमा की महानता के आगे कुछ भी नहीं है।
काश, ये डायरी मैंने पहले पढ़ी होती तो उमा के चरणों में सिर रखकर अपना अपराध कुछ कम कर सकता। आज वह नहीं है, मेरा अपराध मुझे अशांत किए हुए है। इस अपराध की सजा क्या हो जिससे मेरी आत्मा को शांति मिल सके यही सोच मुझे उद्वेलित किए हुए हैं।
डायरी के पन्नों पर लिखी इबारत का कोई नाम नहीं होता। कोई नाम है भी नहीं। उन सब पन्नों को समेट जो इबारत मुझे मिली जिसने स्वयं जल जलकर आंखों के अंजन से इबारत लिखी। मैं उस इबारत का नाम दीपशिखा दे रहा हूं। इससे अच्छा कोई और नाम हो ही नहीं सकता।
मैं अपना अपराध आप सबके सम्मुख रख रहा हूं। आप जो भी सजा मुझे देंगे मंजूर होगी। मैंने उसमें कहीं कोई भी संशोधन नहीं किया है। शायद डायरी के पन्नों के ये स्याह शब्द मुझे जैसे मिथ्यादम्भी व्यक्ति को सही राह दिखा सकें। मेरी तरह उन्हें भी पश्चाताप की अग्नि में जलना पड़े मेरा यही उद्देश्य है। डायरी की इबारत इस प्रकार थी-
मैं जानती हूं नरेश कि मैं तुम्हारे योग्य नहीं। छल से तुम्हें मेरे योग्य बनाया गया है। जिन परिस्थितियों में तुम छले गए कोई भी छला जा सकता था, पर तुम्हारी दृष्टि में मैं छलनामयी हो गई क्योंकि छल का निमित्त मैं थी। मुझे स्वंय इस बात कि दुःख है। तुम्हारी महत्वाकांक्षाएं मेरे ही कारण जड़ हो गई। तुम अनन्त आकाश में उड़ना चाहते थे। तुम्हें लगा कि मैंने तुम्हें कैद कर लिया है। तुमने स्वंय को कटे पंख पाखी सा पाया। तुम्हें लगा कि तुम महज छटपटा सकते हो उड़ नहीं सकते। तुमने इस स्थिति के बारे में सोचा ही नहीं था।
कभी-कभी ऐसा बहुत कुछ घट जाता है जिसके बारे में इंसान कल्पना भी नहीं कर सकता। ऐसा ही कुछ हमारे साथ भी हुआ। जो कुछ भी घटित हुआ उसके लिए हम दोनों के परिवार वाले दोषी हैं। पर तुमने अनकहे ही सारा दोष मेरे सिर मढ़ दिया। मुझे जरा भी शिकायत नहीं है। दोष कमजोर का होता है। समरथ को नहीं दोष गुसाईं। मैं पत्नी हूं और उससे भी बड़ी बात एक औरत हूं
औरत होना ही सबसे बड़ा दोष है।
बेशक तुमने अपनी जुबान से कभी कुछ नहीं कहा। जो एक पत्नी को मिलना चाहिए वह सब तुमने मुझे दिया और उसे मैंने तुम्हारा प्रसाद समझकर ग्रहण किया। इतना ही मिल गया यही क्या कम है? पर स्वाति नक्षत्र रुपी नेह की एक बूंद के लिए मैं जीवन पर्यन्त चातक सी प्यासी रही। तृषा से मेरी दृष्टि तुम्हारे चेहरे पर लगी रही। तुम्हारी आंखों में कुछ टटोलती रही और हर बार शून्य में गूंजती आवाज की तरह टकराकर मेरे पास लौटती रही।
सब कुछ भरा भरा था। खूब अपनत्व से भरा शोरगुल था। मैं उसके बीच नितांत अकेली थी-बिल्कुल तुम्हारी तरह। तुम अपने उस कुछ के साथ जी रहे थे और मैं तुम्हारा कुछ यानि पूर्ण समर्पण पाने के लिए जी रही थी। इस उम्मीद में कि मरुस्थल में भटके राही को कभी तो पानी की झलक मिलेगी।
तुम बहुत कंजूस रहे नरेश। तुम क्या जानो समर्पण क्या होता है। तुमने तो ख्यालों की एक अलग ही दुनिया बसा ली थी। तुम उसी में डूबे रहते थे। उबरकर देखना तुम्हें नहीं आया, या तुम उबरना नहीं चाहते थे। तुम सोचते होंगे ऐसा कर मुझ पर एहसान कर रहे हो।अपना फर्ज पूरा कर रहे हो। इस प्रकार तुम्हें एकांत में मानसिक हत्या करते देखकर मुझे दुःख होता था। बस यही सोचती रहती कि ऐसा क्या करूं कि तुम्हें रोक सकूं।
तुम रात दिन किताबों में डूबे रहते। जाने किस शान्ति की तलाश उन पृष्ठों में भटक रहे थे जो निर्जीव और काले थे। उन शब्दों में तुम कुछ खोज रहे थे जो नितांत तुम्हारे नहीं थे। यदि खोजना ही था तो तुम स्वयं शब्द गढ़ते, फिर उत्तर भी समझ लेते पर दूसरों के कन्धों पर बंदूक रखकर क्याअचूक निशाने लगे हैं?
तुम पुरातनवादी हो। कायर नहीं हो। न परिस्थितियों से समझौता करना आता है, न टकराना। तुम केवल भटकना जानते हो। स्वंय को भरमाए रखने का भटकना कितना आसान तरीका है। तुम स्वंय से भाग रहे हो, अपने विचारों से भाग रहे हो। न कोई दिशा है न उद्देश्य। उद्देश्यहीन दौड़ भटकन ही तो है। तुम पढे लिखे हो, विद्वान हो, तुम्हारे बारे में सही सही धारणा बना सकूं इतनी समझ मुझ में कहां है। पर इतना तो जानती ही हूं कि पति-पत्नी का रिश्ता बड़ा भावपूर्ण होता है अपनत्व भरा सा। एक दूसरे को जी लेने के बाद भी पूर्ण संतुष्टि नहीं मिलती। और और की चाह बनी रहती है। आंखों में प्यार और समर्पण का उद्धार वेग लहराया करता है। चेहरा कितना सौंदर्यमय हो जाता है।वाणी से ध्वनि के मधुर झरने फूटने लगते हैं। कानों में घंटियां सी गूंजने लगती हैं। मौका मिलते ही अधर फड़कने लगते हैं। हाथ आलिंगनबद्ध हो जाते हैं। दाम्पत्य जीवन की ऐसी धारणाएं बड़ी भावप्रधान होती हैं। तभी एक दूसरे के मन में त्याग और श्रद्धा पैदा होती है। त्याग से त्याग फलित होता है।
तुम्हारे चेहरे पर इन्हीं भावों की एक झलक देखने को मैं आतुर रही। यदि तुम एक बार भी अनुराग पूर्ण दृष्टि से देख लेते तो मैं जीवन की सार्थकता पा लेती। मेरा पत्नीत्व सफल हो जाता। लेकिन न कभी तुम्हारी आंखों में चमक उभरी और न अधर फड़फड़ाए। कोई उत्कंठा भी तुम्हारे पास नहीं है। है तो मात्र खीज और चिड़चिड़ाहट। पता नहीं क्यों।
एक बार तुम्हारी लिखी कुछ पंक्तियां पढ़ीं थीं। तुमने लिखा था- “कुछ रिश्ते मात्र ढ़ोने के लिए होते हैं, जिन्हें न तो उतार कर फेंका जा सकता है, न गले लगाया जा सकता है। बस पूरी उम्र ढ़ोते हुए घिसटा जा सकता है। चाहे व्यक्ति टूटकर टुकड़े-टुकड़े हो जाए। “मुझे लगा था रिश्तों की ये बात तुमने अपने लिए लिखी है। मन हुआ नीचे लिख दूं – “मेरे हमसफ़र। बोझा ढोते थक गये हो। टूटो मत। झुको मत। बोझ की गठरी को उतार कर नीचे रख दो। थोड़ा विश्राम कर लो। रिश्ते जब बोझ बन जाएं तब उन्हें उतार फेंकना ही ठीक है।”
पर मुझ नादान की बात पर तुम खीज कर रह जाते। मैंने मन ही मन सौगंध खाई है कि कभी प्रतिवाद नहीं करुंगी। लिखती तो प्रतिवाद हो जाता। तुम रात भर बैठे-बैठे पढ़ते रहते हो। मुझे बड़ा तरस आता है। तुम्हारे साधना पथ की पथिक बन उसे झाड़ पोंछ सकती, पर इतना अधिकार भी तुम नहीं देते। एक बार तुम्हारी किताबें झाड़ पोंछ कर लगा दीं थीं, देखते ही तुम दहाड़ उठे थे- “मेरी स्टडी में यह सब किसने किया?”
तुम्हारी प्रश्नचिह्नित निगाहें मेरे चेहरे पर आ चिपकीं। मेरी दृष्टि नत हो गई। मैं अपराधिनी बनी तुम्हारे सामने खड़ी थी। “आगे से मेरी किताबें छूने की जरूरत नहीं। “एक और बम का धमाका कर तुम स्टडी में चले गए। प्रतिक्रिया क्या हुई यह जानने के लिए तुम्हारे पास वक्त न था। मेरी छाती में अनेकों ज्वालामुखी धधक रहे थे। बाहर आना चाहते थे। मैंने अपने होंठ भींच लिए। धुआं आंखों के रास्ते बाहर निकल गया।
तुम्हारी तपस्या से अभिभूत हो तुम्हें शांति देने के लिए मैंने बालों में अंगुली फिराकर आश्वस्त करना चाहा। तुमने झटककर मेरा हाथ हटा दिया। मेरे दिल के आइने में एक और दरार पड़ गई।
तुम बैग लेकर कहीं जा रहे थे। “कब लौटोगे?”
“पता नहीं। चलते समय टोका मत करो”।
अनमने मन से कहकर तुम चले गए। एक विष बुझा तीर मेरी छाती में आकर धंस गया। मैं आह भी न कर सकी। तुम कहां जाते हो, क्यों जाते हो, कब लौटेंगे – यह मेरे अधिकार क्षेत्र में नहीं। मेरा धर्म तो केवल यही है कि तुम्हारी कुशलता के लिए कामना करुं। तुम्हारे जाने के बाद में मन ही मन दोहराती- “से भगवान, जीवन संग्राम में भटके, स्वंय से भागते और लड़ते मेरे पति को राह दिखाना।
तुम लौटते में सोचती-दो दिन के प्रवास के बाद तुम्हें कहीं मेरी याद आई होगी, कोई चाह उमड़ी होगी। तुम मुझे अपने आगोश में समेट लोगे। पर ऐसा कभी कुछ नहीं हुआ। यंत्र चालित सी मैं और वैसे ही तुम अपने अपने काम में व्यस्त हो जाते। तुम कपड़े बदलते, हाथ मुंह धोते, मैं चाय का प्याला पकड़ा देती। चाय का घूंट भरते भरते दो-चार शब्दों में बच्चों की कुशलता पूंछ लेते। बस इतना ही।
तुम हाथ धोकर लौटते, मैं सोचती – तौलिए की जगह मेरे आंचल से पोंछोगे। इसी इंतजार में आंचल का कोना थामे खड़ी रहती। कहीं कुछ पिघलने लगता। वैसे जिंदगी में ऐसे बहुत कम अवसर आए जब मैं कहीं तुम्हारे साथ बाहर निकली। मन में साध होती की तुम्हारे मन पसंद श्रंगार करुं। तुम्हारी पसंद की साड़ी पहनूं। तुम्हारी आंखों में अपने लिए प्रशंसा का भाव देखूं।
मैं पूछ बैठती- “कौन सी साड़ी पहनूं?”
“कुछ भी पहनोगी सब ठीक लगेगा”- तुम्हारा दो टूक उत्तर मेरे दर्द को सहला जाता।
“ये साड़ी मुझ पर कैसी लगती है”?
तुम किताबों पर नजरें गड़ाए ही उत्तर देते – “ठीक है”।
मैं सोचती क्या बस यही ठीक है सुनने को आती थी। ठीक तो सभी कुछ चल रहा है।
दिन भर की थकावट तुम्हारी बाहों पर सिर रखकर उतारना चाहती। तुम पास रहकर भी बेहद दूर रहते। कहीं खोए-खोए से। तुम्हारे स्पर्श में बेहद ठंडापन रहता। संबंधों के दायरे निभाते या तो तुम हिंसक हो उठते या बेहद बेगाने। इन दोनों का संधि स्थल मुझे नहीं मिला। मुझे अपना दाम्पत्य बलात्कार की आधारशिला पर खड़ा मिलता।
पत्नीत्व की पूर्णता मां बनने में है। मैं मां बन उलझी रहूं और तुम्हारे बारे में कुछ सोच न सकूं तभी तुम मुझे प्रसाद रुप में लगातार बच्चे थमा देते। मैं पांच बच्चों की जननी बनकर भी प्यासी रही। समुद्र के किनारे खड़ा व्यक्ति खारे जल से क्या तृप्ति पाएगा। मेरी सेहत का तुम्हें ख्याल न था। आठ साल में पांच बच्चों की मां बनकर मैं अस्थि पंजर हो गई। तुम्हें इस सबसे क्या मतलब? तुम रोटी कपड़ा और छत देकर अपना फर्ज पूरा कर रहे थे।
आज चारों तरफ तुम्हारा नाम है। तुम्हारी लिखी किताबें विश्व विद्यालय के पाठ्यक्रमों में लग रही हैं। सेमिनार और गोष्ठियों में तुम्हें आमंत्रित किया जाता है। तुम्हारा अभिनंदन होता है। तुम पुरस्कृत होते हो।
मैं जानती हूं कि तुम बहुत ऊंचे उठ गये हो और मैं वहीं खड़ी रही गई हूं। तुम गगन बन गये हो और मैं मात्र धरा ही हूं। मैं तुम्हारे चरण चिन्ह समेट सकती हूं। परन्तु क्या तुम्हें एक पल को भी स्मरण आया कि तुम इतने ऊपर कैसे उठे? तुम्हारा यह साधना पथ किसने बुहारा? घर परिवार की चिंताओं से किसने मुक्त रखा? ये मेले किसकी चिताओं पर सजे?
मैंने तुम्हें बहादुर समझा। तुम अपने परिवार और अपने पिता की इज्जत बचाने के लिए शहीद हो गए। वह इज्जत जो मेरे पिता के पास गिरवी थीं। तुमने स्वंय को समर्पित कर अपने पिता का कर्ज उतारा है। पिता का कर्ज उतारना हर बेटे का फर्ज़ है। तुम्हें तो परम तृप्ति मिलनी चाहिए थी। गर्व से सिर ऊंचा करना चाहिए था। शहीद का सिर हमेशा ऊंचा होता है। वह अपनी ही कुंठाओं में दमित नहीं होता।
तुम्हें स्वंय का शहीद होना या बिकना पसंद नहीं था तो अपने पिता से कहते। अपने आक्रोश का शिकार मुझे क्यों बनाया? जहां तक पत्नी धर्म की बात है – मैने तन और मन से निभाया है। तुम्हारी खुशी को अपनी खुशी समझा है। तुम्हारे दुःख को बहुत गहराई तक महसूसा है। काश! तुमने भी समझा होता। पूरा जीवन बस एक बेजुबान एक गाय को खूंटे से बांध कर, चारा पानी डालकर अपने फर्ज की इतिश्री करते रहे। मुझे कोई शिकायत नहीं है तुमसे।
हां नरेश, ये समझाने वाली मैं कौन हूं। मैं तो तुम्हारे पैरों की धूलि भी नहीं। मुझे बताना भी नहीं चाहिए। मेरे सफर की अंतिम बेला निकट है। तुमसे कभी कुछ नहीं मांगा। अब भी नहीं मांगूंगी। मैं थकी हारी पथिक तुम्हारे नाम को अपने माथे पर सजाए प्रयाण करना चाहती हूं। बस एक ही कामना है। ढ़ेरों पुरस्कार तुमने पाए। अपनी आंखों से अनुरागमय मुस्कान का एक पुरस्कार मुझे भी दे दो। मेरा सफ़र पूरा हो जाएगा। मुझे जीवन की सार्थकता मिल जाएगी। मैं समझूंगी कि तुमने मुझे माफ़ कर दिया।

यह इबारत डायरी के पन्नों से उतारी है। मेरी हृदयहीनता का परिचय सबको मिल गया होगा। आपकी प्रतिक्रिया ही मेरी सजा होगी। जो चाहे दें। शायद मेरा अपराध कम हो सके।

परिचय :– सुधा गोयल
निवासी : बुलंद शहर (उत्तर प्रदेश)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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