
सुधा गोयल
बुलंद शहर (उत्तर प्रदेश)
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आज आलमारी की सफाई करते समय एक चार तह किया कागज नीचे गिरा। मैंने उठाकर खोलकर देखा। कुछ समझ में नहीं आया। आड़ी तिरछी रेखाएं खिंची थी और एक सिरे पर तारीख पड़ी थी। तारीख पर नजर पड़ते ही चौंक पड़ी।- “अरे यह तो मेरे नन्हें कुमुद का खत है। करीब पैंतीस साल पहले का। ऐसे ही कितने खत रोज लिखता था और मैं तारीख डाल कर उन्हें एक फाइल में लगा देती थी।
मैं काम पर जाती। कुमुद घर पर आया के साथ रहता। मैं जब लौटकर आती एक कागज का टुकड़ा थमा देता जिस पर आड़ी तिरछी रेखाएं खींची होतीं। मैं पत्र को चूम लेती। फिर धीरे-धीरे अंगुलियां फिराती। उन स्थानों को स्पर्श करती जहां जहां उसकी कलम गुजरी होती। वह मेरी पीठ पर झूल जाता और कहता- “मम्मा पढ़ो न।”
मैं उसकी आंखों की चमक देखकर उन रेखाओं पर अंगुली सरकाती जाती और बोलती जाती – “मेरी प्यारी मम्मा, तुम मुझे छोड़ कर क्यों चली जाती हो? मुझे जरा भी अच्छा नहीं लगता। यही लिखा है न?”
वह खुश हो कर कहता – “आपने ठीक पढ़ा मम्मा।”
मैं उसके माथे पर चुम्बन जड़ देती। गोद में बिठाकर पर्स से चाकलेट निकाल कर देती। वह वायदा लेता- “अब तो नहीं जाओगी?”
“प्रोमिस, अब पूरे समय अपने लाडले के साथ रहूंगी।”
“मेरी प्यारी मम्मा”- कहकर वह मुझे चूम लेता। मैं निहाल हो जाती।
अगले दिन फिर दफ्तर से लौटती। उसकी मुट्ठी में एक कागज का टुकड़ा दबा होता- “मम्मा, आपकी चिट्ठी।”
“अच्छा आज भी मम्मा की चिट्ठी आई है। लाओ दिखाओ, पढ़ें तो क्या लिखा है?”
मैं पहले कुमुद को प्यार करती। अपनी गोद में बिठाती। फिर पत्र पढ़ना शुरू करती – “मम्मी, आया गंदी है। मैं गिर गया। रोता रहा। इसने चुप नहीं कराया”
उसने ओठों पर अंगुली रखकर कहा- “धीरे-धीरे”।
“क्यों, आया से डरता है। ठहर, मैं अभी उसकी क्लास लेती हूं”।
“नहीं मम्मा, आप उसको कुछ मत कहना। आपके जाने के बाद मुझे डांटेगी और कान पकड़कर साॅरी बोलने को कहेगी। “उसने सहमते हुए कहा।
“नहीं मेरे बच्चे, वह ऐसा कुछ नहीं करेगी। उसे समझाना तो पड़ेगा ही।”
मुझे एकदम तेज गुस्सा आ रहा था कि आया की अभी अच्छी सी खबर लूं, पर फिर स्वयं को समझाया – किसी काम में लगी होगी। ध्यान नहीं दिया होगा। बाद में समझा दूंगी।
“तू तो मेरा लाड़ला है। किसकी हिम्मत है जो तेरा ध्यान न रखें।”
“पर मम्मा, आप मुझे छोड़कर रोज रोज क्यों जाती हो? आया के साथ रहना मुझे जरा भी अच्छा नहीं लगता।”
“नहीं जाऊंगी तो बेटे के लिए चाकलेट कहां से आएगी?”
“मुझे चाकलेट नहीं आप चाहिए। आगे से कभी चाकलेट नहीं मांगूंगा।”
उसकी मासूम सी बात सुनकर मेरी आंखें भर आईं। बित्ते भर का बच्चा अपना मन मार सकता है पर मां से दूर नहीं रह सकता।
“जब तुम बड़े हो जाओगे तब नंही जाऊंगी।”
“मैं कब बड़ा होउंगा?”
“थोड़े दिन बाद। मम्मा का कहना मानोगे, स्कूल पढ़ने जाओगे, अच्छे बच्चे बनोगे।”
“क्या मैं अभी अच्छा बच्चा नहीं हूं?”
“तुम बहुत अच्छे बच्चे हो। मेरे लाडले हो। अभी पढ़-लिखकर बड़े बनना है। सुपर बाॅय”- मैने प्यार से उसे चूम लिया। “अब जाओ खेलों। मम्मा थकी है। थोड़ा आराम करेगी।”
कुमुद उठकर चला गया और अपने खिलौनों में मस्त हो गया।
अगले दिन फिर एक चिट्ठी कुमुद की मुट्ठी में दबी थी। मेरे दरवाजा खोलते ही वह अपना हाथ आगे बढ़ा देता। मैंने चिट्ठी खोली। आज कुछ अलग तरह की रेखाएं थी। जैसे कुछ और कहना चाहता हो। मैं उन रेखाओं पर अंगुली घुमाती रही।
“बताओ न मम्मा क्या पढ़ा?”
“आज मेरे बच्चे ने लिखा है कि आंटी मोबाइल पर बातें करती रही और मुझे दूध नहीं दिया। ठीक पढ़ा न।”
“हां मम्मा समझाओ इसे। मुझे बहुत तंग करती है।”
“मेरे बेटे को आगे से तंग नहीं करेगी”।
“क्यों अब घर पर रहोगी”- उसका फिर वही सवाल।
“मैं उसे समझाऊंगी। पहले वह तुम्हारा काम करेगी फिर कुछ और। तुम भी अच्छे बच्चे की तरह उसकी बात मानोगे।”
“मैं उसी की बात मानता हूं, वही मेरी बात नहीं मानती। मेरे साथ खेलती भी नहीं है। लोरी भी नहीं सुनाती, कहानी भी नहीं। बस टीवी देखती रहती है। कहीं भी साथ लेकर नहीं जाती”- कहते कहते रुआंसा हो उठा।
“और क्या-क्या करती है? सारी बात बताओ मुझे”- मैने कुमुद का सिर सहलाया। उसने आया की ढ़ेरों शिकायतों का पिटारा खोल दिया। मैने कुमुद को तो समझा दिया कि आया फिर ऐसा करेगी तो निकाल दूंगी। लेकिन आया को निकालना बात का कोई हल नहीं था। आया आसानी से मिलती कहां हैं जो ईमानदारी से काम कर सकें। दूसरी आया की क्या गारंटी होगी कि वह ठीक ही होगी। क्या पता वह इतना भी ध्यान न दें। क्रैश में डालने को मेरा मन गवारा नहीं करता था। कोई ऐसा रिश्तेदार भी नहीं था जो कुछ समय के लिए कुमुद को संभाल लेता। सब कुछ अकेले ही मैनेज करना था। मैने रिश्ते छोड़ दिए रिश्तों ने मुझे छोड़ दिया। यह तो दुनिया का चलन है। एक हाथ दो दूसरे हाथ से लो।
मैंने मन ही मन कुछ निश्चय किया। जब कुमुद अपने खिलौनों से खेल रहा था मैंने आया को अपने पास बुलाया – “सुनो वासु, तुमसे कुछ कहना है।”
“क्या कोई ग़लती हो गई आंटी?”
“नहीं ऐसा कुछ नहीं हुआ। बस तुमसे कुछ पूछना है। मेरे पीछे कुमुद तुम्हें ज्यादा तंग करता है।”
“कुछ खास नहीं। इस उम्र में सभी बच्चे ऐसा करते हैं। रोते हैं, ज़िद करते है, सामान उठाकर फेंक देते हैं, खिलौने तोड़ देते हैं। निगाह बचते ही इधर-उधर चढ़ जाते हैं, गुस्सा हो जाते हैं, गला फाड़कर रोने लगते हैं। निकर गीली कर लेते हैं। दूध नहीं पिएंगे, कुछ खाएंगे नहीं। इनके पीछे-पीछे खुशामद करते भागना पड़ता है।”
“अरे इतना परेशान करता है। मैंने तो तुमसे कभी कुछ पूछा ही नहीं।”
“….और मैडम एक कागज पर आड़ी तिरछी रेखाएं खींचेगा और मुझसे कहेगा कि मैंने मम्मी से शिकायत कर दी है।”
मैं हंस पड़ी। “वही सब तुम्हें बता रही हूं। तुम किसी दिन अपने पास लिटाकर इसे कहानी सुनाना या सुलाते समय लोरी। मैं तुम्हें चाकलेट लाकर दूंगी। तुम खुश होकर कभी-कभी चाकलेट दे देना। हां जब चिट्ठी लिखने बैठे तो तुम कहना कि चलो आज मैं तुम्हें चिट्ठी लिखना सिखाऊं। फिर कुमुद का हाथ पकड़कर कभी फूल कभी पत्ता, तितली, चिड़िया कुछ भी बनवाना और कहना – लो तुम्हारी चिट्ठी पूरी हो गई।”
“मैडम यह कोई बड़ी बात नहीं है। कल से ऐसा ही करुंगी। अब बेबी को पार्क में घुमा लाऊं?”
और वासु उसे घुमाने ले गयी। लौटा तो उसके हाथ में गुब्बारा था और खूब प्रसन्न लग रहा था।
“क्या बात है। आज मेरा बेटा बड़ा प्रसन्न लग रहा है?”
“आज आया आंटी ने मुझे झूले पर झुलाया और आंख मिचौली भी खेलीं।”
“आंटी अच्छी है न?”- पूछने पर कुमुद मेरी तरफ देखकर मुस्कराया।
आफिस से लौटने के बाद कई दिन तक मुझे कोई पत्र नहीं मिला। मुझे खुशी हुई कि कुमुद का मन लग रहा है। वासु ने मेरी बात समझ ली है।
करीब पंद्रह दिन बाद कुमुद ने फिर एक पत्र थमाया- “मम्मा आपकी चिट्ठी”- कहते हुए उसने वासु को आंख मारी
“अरे फिर से चिट्ठी, अब इस वासु का कुछ तो करना ही पड़ेगा। इसे छोड़ूंगी नहीं”- मैने गुस्से में कहा।
“पहले आप पढ़ो मम्मा।”
मैंने चिट्ठी खोली। आज आड़ी तिरछी रेखाएं नहीं थीं, बल्कि टेढ़ा मेंढ़ा छोटा सा फूल बना था। मैंने पढा- “आंटी अच्छी है। मेरे साथ खेलती है। मैं खुश हूं। यही लिखा है न”.
“हां मम्मा” और वह मेरे गले में झूल गया। मैं भी खुश हुई कि कुमुद की शिकायतों को विराम मिला। अब वह रात को मेरी बगल में लेटकर वासु की सुनाई कहानी टूटी-फूटी भाषा में अटक-अटक कर सुनाता था। किसी कविता की एकाध पंक्ति भी। पूरे दिन उसने क्या किया, वासु ने क्या क्या खिलाया- सब बताया। फिर मुझसे भी कहानी सुनकर सोता। अब चिट्ठी पर चूहे या फूल पत्ती बनी होती। गोल-गोल चंदामामा और सितारे भी।
मैं भी फाइल को पलटकर देखती रही और एक एक चिट्ठी पर अंगुलियां फिराते हथेली पसीजती रही, आंखें टपकती रही। वक्त ठहरता नहीं।पूरे पंद्रह साल हो गए कुमुद को गये। पढ़ने गया था आस्ट्रेलिया और वहीं का होकर रह गया। घर भी बसा लिया। मां को सूचना के साथ कुछ फोटो भेज दिए। कुछ किरचें फैल कर बिखर गई जिन्हें समेटा नहीं जा सकता।
बस वासु मेरे साथ रह गई। आज भी है। मैंने कुमुद का बचपन वासु के हवाले कर दिया था कुमुद ने मां की वृद्धावस्था। उसने वहीं सब मुझे लौटाया है जो मैंने उसे दिया है। फिर किस बात का दुःख मनाऊं। वक्त कभी भूलता नहीं। कभी जहां कुमुद खड़ा था आज मैं वहां खड़ी हूं। वहीं खड़ी रहकर उसके दुःख और एकाकीपन को समझ सकती हूं। उस समय वह एक नन्हा सा मासूम बच्चा था जिसे हर वक्त मां की जरुरत थी। अपनी पसीजती हथेलियों में उन खतों को लिए खड़ी हूं जिन्हें कुमुद ने लिखा था। आज वही मेरी पूंजी हैं।
अब मेरी बारी है। मैं कुमुद को पत्र लिखूं और उसके लौटने का इंतजार। कब तक? पता नहीं। तब मेरे लौटने का वक्त था। कुमुद से किया वायदा निभाती रही लेकिन कुमुद अपना वायदा नहीं निभा सका। महानगरों की ऊंची अट्टालिकाओं में गुम हो गया। जहां मेरी आवाज़ उस तक नहीं पहुंचती। क्या यही सब पाने के लिए हाड़ तोड़ मेहनत करती रही। सपनों को ऊंचाइयां देती रही। न सपने मिले न उचांइयां।
अब कुमुद को मां की याद नहीं आती। आड़ी तिरछी रेखाओं वाला पत्र अब नहीं आता। कोई वासु पत्र लिखना नहीं सिखाती। पत्र न सही फोन पर ही दो बोल बोल दे। खाली रिसीवर हाथ में पकड़े वक्त की जुगाली करने के अलावा बचा ही क्या है।
चिंतन चलने लगता है। बीते पृष्ठ पलटने लगती हूं। कुमुद जब दस साल का था मैंने उसे बोर्डिंग स्कूल में डाल दिया। आया की निगरानी की जरूरत नहीं थी। छोटे-छोटे अपने काम करना सुख गया था। स्कूल से लौटने पर अपना स्कूल बैग अलमारी में रखता, जूते मोजे रैंक पर और यूनिफार्म उतारकर कुर्सी के पीछे टांग देता। शाम का खाना हम दोनों साथ खाते।
वह डाइनिंग टेबल पर प्लेट, चम्मचें व सब्जी के डोंगे रख देता। ज्यादा जिद्द भी न करता।
सुबह समय से सोकर उठ जाता। कभी स्वंय तैयार हो जाता कभी मैं कर देती। वह समझदार भी हो रहा था। वासु अब सारे दिन की जगह सुबह शाम आती। मुझे लगा अब कुमुद बोर्डिंग में रह सकता है। यदि वह बोर्डिंग में रहेगा तो उसकी चिंता कम रहेगी। हालांकि कुमुद को बोर्डिंग जाना अच्छा नहीं लगा। आखिर तक मना करता रहा। बस यह मेरी ही जिद्द रही कि कुमुद को उन ऊंचाइयों तक ले जाऊं जिसका वह हकदार हैं। ये सपने उसने नहीं मैंने देखे। वह तो सपने देखने जानता ही न था।
शुरू में कुमुद मुझे रोज फोन करता। फोन पर रोने लगता। मैं उसे समझाती। हर वीकएंड पर मिलने पंहुच जाती। धीरे-धीरे उसने एडजस्ट कर लिया। बोर्डिंग से अपने साथ बाजार ले जाती। उसकी जरूरत का सामान दिलाती, लेकिन यह सब भी थोड़ा दिन चला। वह फिर छुट्टियों में घर आने लगा।
वह बाहर पढ़ रहा था और मेरे सपने उड़ान भर रहे थे। बिना यह सोचे कि कुमुद क्या चाहता है। वह आगे बढ़ता गया और मैं खुश होती गई। उसे जब विदेश से बुलावा आया तो मैं उड़ने लगी। केवल दो साल का अनुबंध था। मैंने सोचा दो साल पलक झपकते ही कट जाएंगे।
कट भी गए, पर एक बार विदेश गया कुमुद अपनी ही राह भूल गया। वह तो उसी राह पर बढ़ रहा था जैसे उसे मैं दिखा रही थी। फिर उसे दोष क्यों दूं। मैं वहीं खड़ी रही गई और वह इतना आगे निकल गया कि पीछे मुड़कर देखने का वक्त भी उसके पास नहीं रहा। मैंने उसे जो दिया वक्त ने वही लौटाया।
परिचय :– सुधा गोयल
निवासी : बुलंद शहर (उत्तर प्रदेश)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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