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विरह की व्यथा

भारमल गर्ग “विलक्षण”
जालोर (राजस्थान)
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प्राण-पखेरू उड़ गया डाली से,
छूट गया संग, रह गई काली से।

चाँदनी रातें अब सूली बनीं,
तारों भरी छत पलकों पर ढली।

हवा के झोंके सिसकियाँ लिए,
दीवारों से टकराकर रुली।

बिना बादल बरसा करती आँखें,
नींद रूठी पलकों पर ठहरी।

तकिया सूनापन लिए खड़ा है,
सपनों के टुकड़े बिखरे पड़े हैं।

सावन की फुहारें याद दिलाएँ,
उस रात की बातें जो बीती।

घनघोर घटा गरजे मन भीतर,
बिजली सी चमकी आँखों में पीड़ा।

पुरवैया के पैरों में लिपटी,
कागज की नाव संदेशा ले चली।

पर लौटकर वह खाली हाथ आई,
मिला न पता उस पथिक का कहीं।

दीपक की लौ सी काँपता मन,
हर छाया में वह मूरत दिखती।

पुकारूँ तो प्रतिध्वनि हँस देती,
दौड़ूँ तो राह रोती-सी खड़ी।

हे विधाता! लौटा दे मेरा साजन,
नभ के तारे गवाही देंगे।

विरह की अँधियारी टूटेगी जब,
प्रीत का इंद्रधनुष फिर छाएगा!

परिचय :-  भारमल गर्ग “विलक्षण”
निवासी :
सांचौर जालोर (राजस्थान)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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