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गहरे बन जाते रिश्ते

ललित शर्मा
खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम)
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रिश्ते अपने हैं या पराये
पर ये रिश्ते ही रिश्ते की
सशक्त डोर बनकर
सच्चे गहरे रिश्ते बन जाते है।

कब कहाँ कैसे किस मौड़पर
कौन अपना बन जाये
बस मिलकर रिश्ते बन जाते है
न जाने यह किस
अदृश्य चमत्कारी
शक्ति का परिणाम
रिश्ते की सशक्त
सच्ची डोर सख्त बनाते है

ये रिश्ते ही अपनों
से अपनों के
टूटकर बिछुड़कर
दरकिनार हो जाते हैं,
खून के रिश्ते
अपने बनकर भी
अपने से अपनापन के
सगे रक्त के रिश्ते रहकर भी
अपनापन का अहसास भाव
अक्सर निभा नहीं पाते हैं।

किसी अनजान
गली मोहल्लों में
किसी गांव से शहर में
किसी महफ़िल,
सभाओं, यात्रा में,
किसी भी अनजान जगहों में
खून के गहरे संबंध से गहरे
रिश्ते बेजोड़ बबनाकर
क्या खूब लोग बखूबी
रिश्ते की परिभाषा निभाते
रिश्ते का सच्चा अर्थ बताते हैं।
रिश्ते में सच्चाई
स्नेह प्रेम ममत्व जगे
ये रिश्ते ही दुःख
सुख की नैया को
रिश्ते ही ढोकर गहरे
रंग में निभकर
भाईचारे के प्रेम में
पिरोकर महक जाते है।

परिचय :- ललित शर्मा
निवासी : खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम)
संप्रति : वरिष्ठ पत्रकार व लेखक
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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