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तिलचट्टे

भीमराव ‘जीवन’
बैतूल (मध्य प्रदेश)
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लगे बिलबिलाने तिलचट्टे,
पाँव जमा के पक्के।
नई दवा भी लगे खोजने,
नेता हक्के – बक्के।।

खोल लिए है सबने तरकश,
तीखे लाँछन वाले।
छेद रहे सपनों के तन को,
लेकर निर्मम भाले।।
अपने पिच पर लगा रहे सब,
लंबे चौके-छक्के।।

शतरंजी चालों पर भारी,
राजा जी के घोड़े।
नग्न पीठ पर लगे बरसने,
तिकड़म वाले कोड़े।।
इन कीड़ों पर फिर छल-छंदी,
विष छिड़केंगे पक्के।।

गली-गली में भेज दिए हैं,
परचे लेकर प्यादे।।
भक्तों को बैकुंठ दिखाने,
करना तगड़े वादे।।
इनके जेबों में डाले कुछ,
काजू और मुनक्के।।

क्रांतिकारियों के स्वागत में,
सजी नई बन्दूकें।
दमनकारियों के घर पहुँची,
भरी बड़ी सन्दूकें।।
छिप जायेंगे फिर तिलचट्टे,
कल खाने को धक्के।।

परिचय :- भीमराव ‘जीवन’
निवासी : बैतूल मध्य प्रदेश
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।


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