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अब तक चले औरों की खातिर

विष्णु दत्त भट्ट
नई दिल्ली

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अब तक चले औरों की खातिर
अब खुद की खातिर चलना होगा।

परिश्रम की राह पकड़कर
साथ वक्त के ढलना होगा,
मुँह ताकना छोड़ पराया
अपने पैरों चलना होगा।

चाहिए गर सुख का सूरज
किरण-किरण अब जलना होगा,
मीठे फल की चाह अगर है
डाल-डाल ख़ुद फलना होगा।

बाधाएँ आएँगी पथ में
डटकर उनसे लड़ना होगा,
आँधी आए चाहे तूफ़ां
हर दौर में पलना होगा।

दीपक जैसे तमस मिटाने
तिल-तिल करके जलता है,
राह दिखाने औरों को अब
दीपक जैसे जलना होगा।

औरों के हित हमने सोचो
सूरत बदली नगर-शहर की,
अब अपनी ख़ातिर मिलजुल कर
हरेक गाँव बदलना होगा।

अब तक चले औरों की ख़ातिर
अब ख़ुद की खातिर चलना होगा।

परिचय :- विष्णु दत्त भट्ट
निवासी : नई दिल्ली
शिक्षा : एम.ए है।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।

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