
12गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
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हे बूंदों के बादशाह, बरसाती महाराज! यह तीसरा महीना है,धरती को सिंचित, पल्लवित, प्लावित और परेशान करते हुए। अब बस भी करो। धरा को थोड़ी धूप चाहिए, मनुष्य को थोड़ी राहत और गृहिणियों को बेसन-तेल का कोटा। तुम्हारी उमड़-घुमड़, ताबड़तोड़ बौछारें अब रोमांच नहीं, विशुद्ध भय पैदा कर रही हैं।
हे मेघराज, आखिर तुम कब जाओगे?
माना, तुम हमारे ‘अतिथि’ हो, स्वागत में कवियों ने गीत गाए, चारण-भाटों ने छंद रचे, मेंढक-मेंढकियों का ब्याह कराया, शिवलिंग डुबोए गए, गधे गुलाबजामुन खाकर, अघाकर हल चलाने उतारे गए। और हम जैसे व्यंग्यकारों ने तुम्हारी ज़िद्दी पुरवाइयों पर तीर छोड़े, ताकि तुम प्रसन्न होकर धरती को तृप्त कर दो। पर तुम तो उस मेहमान की तरह ठहर गए हो जो “कल जाऊँगा, परसों पक्का” कहते हुए बरामदे में स्थायी निवास बना ले।
अब हालत यह है कि जिन मेंढकों की शादी बरसात बुलाने के लिए की थी, उनका तलाक करवा दिया गया है। शिवलिंगों को पानी से निकालकर फिर मंदिर में जमा दिया गया। गधों को आदेश है, अब कोई बारात नहीं निकलेगी। सारे टोटके, अनुष्ठान, हवन, सब बंद। पर तुम हो कि धारा की टोंटी खोले बैठे हो। हे जलझड़ महारथी! लगता है तुम्हारा विभाग भी सरकारी दफ्तर जैसा चलता है, एक बार टोंटी खुली तो बंद करने का कोई कर्मचारी उपलब्ध नहीं। जैसे बिजली के खंभे की लाइटें किसी को बंद नहीं करनी, वैसे ही तुमने बरसात की टोंटी खोलकर फाइल समेट ली।
यहाँ तो वैसे भी नलों में पानी, बल्ब में रोशनी और पंखों में हवा, सब नदारद हैं । तुम क्यूँ अपनी बौछारों से इस इस मरगिले आम आदमी को आशा के हवाई किले बंधवाना चाहते हो । घर-घर पकौड़े तले जा रहे थे, पर अब बेसन-तेल खत्म, गृहस्वामिनियाँ हड़ताल पर हैं। खाना एक बार फिर सूखी दाल-रोटी पर आ गया है। बाढ़ राहत वाले वैसे भी बजट को अग्रिम रूप से खपा चुके हैं, तुम्हारी महिमा से नहीं, अपनी दूरदर्शिता से।
मेरी व्यक्तिगत दुर्दशा देखो, पिछले दस दिनों से घर में मुटियाया पड़ा हूँ। पत्नी के लिए मैं सिरदर्द बन चुका हूँ। मॉर्निंग वॉक पर न जाने के सौ बहाने मेरे पास थे, पर तुम्हारे कारण आज सचमुच धक्के मारकर निकाला गया, और तुम ऊपर से मुझ पर हंसते हुए बरसते रहे। जुकाम, वायरल, खांसी तुम फैला चुके। अब जरा डेंगू-मलेरिया वालों के लिए भी अवसर छोड़ दो, उनके लिए बदबूदार ठहरे पानी की तैयारी सड़क के गड्डों और गटरों ने कर ली है। शहर की सड़कें इतनी साफ हो चुकी हैं कि दिखती ही नहीं। शेष बचे गड्डे अदालत की तारीखों की तरह गला फाड़कर कहते हैं, “मी लार्ड, हम रहेंगे… बरसात जाए या न जाए!”
तालाब, नहरें, नालियां, सब ओवरफ्लो। मगरमच्छ, सांप, बिच्छू,सब घरों में आने लगे। जनता सहनशील है, नेता पाल सकती है तो मगरमच्छ-बिच्छू भी संभाल लेगी, पर मेघराज! तुमने तो अपनी पूरी ताकत दिखा दी। मयूर नाच-नाचकर अकड़ गए, पपीहे गला फाड़कर बेसुरे हो गए, उनका मेडिकल इंश्योरेंस भी नहीं होता। उन पर रहम करो। सभी रिकॉर्ड टूट चुके, अब हर चैनल यही चिल्ला रहा है, “पिछले २० साल में नहीं देखी गई ऐसी बारिश!” लगता है तुम भी ब्रेकिंग न्यूज़ के चस्के में आ गए हो। पर याद रखना, ये चैनल जितनी जल्दी चढ़ाते हैं, उससे तेज भुला भी देते हैं। आज तुम हीरो, कल “अब आगे बढ़ते हैं…एक और ब्रेकिंग न्यूज़ की तरफ” कहकर हवा कर देंगे।
हे वर्षाधिपति! अतिथि देवो भव, पर देवता भी वरदान देकर चले जाते हैं। तुम देवत्व निभाओ, लौट जाओ। धरती तुम्हें याद करेगी, कम से कम अगले नौ महीनों तक तो निश्चित ही। अब जाओ महाराज, पकौड़े खत्म, वॉक बंद, सड़कें गुम, मच्छर तैयार और धरा पूरी तरह संतृप्त। अगली बार आने से पहले सूचना देकर आना, हम मेंढक-मेंढकी रिज़र्व में रखेंगे। मेघराज, कृपा कर, तुम कब वापस जाओगे?
निवासी : गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
व्यवसाय : अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ
लेखन रुचि : कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं
प्रकाशन : शीघ्र ही प्रकाशित पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से), काव्य कुम्भ (साझा संकलन) नीलम पब्लिकेशन, काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन) लायंस पब्लिकेशन।
प्रकाशनाधीन : व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन) किताबगंज प्रकाशन, गिरने में क्या हर्ज है -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह) भावना प्रकाशन। देश विदेश के जाने माने दैनिकी, साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित।
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