
11जयपुर (राजस्थान)
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कच्ची उम्र की लाडो
जब डोली में बैठी थी,
बाबुल की आँखों में
आँसू की लकीरें ऐंठी थीं।
बोझ नहीं थी बेटी,
फिर भी तोल दिया बाज़ार में,
दहेज तुला पर रिश्ते का
सौदा झूठे व्यवहार में।।
माँ ने चूड़ी बेची, बापू के
खेत गिरवी रखे गए,
भाई की पढ़ाई छूटी,
बहन के सपने बेचे गए।
लक्ष्मी कहकर जो लाए,
लक्ष्मी ही चाहे व्यापार में,
बाराती नहीं, सौदागर ठहरे
दहलीज़ और द्वार में।।
वो जो कल तक गुड़िया से
खेला करती आँगन में,
आज ससुराल में जला
करती दहेज के दामन में।
ताने सुनती, गालियाँ सहती
पल पल छुपी हुई आंचल में ,
कम लाई है सुनकर,
बंधी रही रिश्तों की सांकल में।।
स्टोव फट जाते रोज यहां
चीखों की आवाज में,
चीखें ही दब जाती है
परिवार की झूठी लाज में।
धाराएं लिखी बहुत हैं
कानूनों की किताब में,
चिताएं ही घर में जल जाती,
नहीं किसी हिसाब में।
सेतु बंधाया, लंका को
जलाया पत्नी के दीदार में,
सीता को क्यों अग्नि-परीक्षा
देनी पड़ी दरबार में।
तुम समाज के ठेकेदारों,
एक जवाब तो दो ज़रा,
बिन दहेज क्यों तुम चिता
सजाते भीड़ भरे बाजार में।।
शिक्षा : एम ए अर्थशास्त्र , एम बी ए ( रिटेल मैनेजमेंट)
व्यवसाय : उद्यमी, प्रबंधन सलाहकार, कवि, लेखक, वक्ता
निवासी : जयपुर (राजस्थान) ।
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