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अगले जनम मोहे एनआरआई कीजै

डॉ. मुकेश ‘असीमित’
गंगापुर सिटी, (राजस्थान)

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आजकल का सबसे बड़ा अचीवमेंट क्या है? बस यही कि एनआरआई बन जाओ या कोई एनआरआई दामाद घर ले आओ। मेरे मन में पहले कभी ऐसा कोई भाव नहीं था, पर पड़ोसी और रिश्तेदारों ने इतनी बार ताने मारे कि मन में एक टीस-सी बस गई। हर तीसरे दिन कोई न कोई टोक देता, “यार, तुम एनआरआई क्यों नहीं बने? वहाँ डॉक्टरी में ज्यादा पैसा, ज्यादा ठाठ है!” कॉलेज के दिनों में देखा, कई साथी यूएसएमएलई की तैयारी ऐसे करते थे, जैसे भारत की हवा से उन्हें अचानक एलर्जी हो गई हो। शरीर उनका भले यहाँ हो, पर आत्मा अमरीका-यूरोप की सड़कों पर ही टहलती रहती थी। शायद उनकी आत्मा को ग्रीन कार्ड पहले ही मिल चुका था। मेरी आत्मा जिद्दी निकली, इसे तो मुझसे अलग होना ही नहीं था। मैंने लाख मनाया, “जरा बाहर घूम आओ, कम से कम तुमको तो वीज़ा नहीं चाहिए।” आत्मा बोली, “नहीं जी, कहीं नहीं जाना। बस फाइनल टिकट पर जाऊँगी, जब तुम मरोगे।” और इसी के साथ एनआरआई बनने के मेरे सारे सपने धरे के धरे रह गए।
आज मुझे एनआरआई आधुनिक पांडव लगते हैं, स्वर्ग रूपी विदेश में जा बसे सशरीर संत पुरुष। मुझ जैसे देसी अर्जुन के हिस्से में बस घर की मिट्टी और बोनस की धूल ही आई है। एनआरआई न बनने के कारण कई अवसर मेरे हाथ से जाते रहे- अंतरराष्ट्रीय लेखक बनना, विदेशी धुनों में हिंदी मिलाकर कुछ नया साहित्य रचना, दो-चार विदेशी ‘टटपुँजियों’ से अपने लेख पर शोध करवाकर प्रतिष्ठा हासिल करना… यहाँ तक कि बेटे को एनआरआई बनवाकर सरकारी अनुदान पर दो-चार फैमिली टूर करना भी संभव रहा होता। बेटे के घर जाकर पोते-पोतियों की देखभाल कर लेता, क्योंकि विदेशों में बच्चे मिल जाते हैं, पर ‘मेड’ नहीं मिलती। मैं भी अवैतनिक, अप्रशिक्षित, पर अत्यंत विश्वसनीय मेड बनकर पहुँच जाता। साथ ही अपनी विदेशी भ्रमण की खुजली भी मिटा लेता। अब मेरी बात, मैं एनआरआई से नफरत नहीं करता, बस हल्का-सा फ्रस्ट्रेशन है। मैं एनआरआई होते-होते रह गया, मेरा बेटा भी। देश की मिट्टी से प्यार ऐसा कि उखड़ नहीं पाया, इसलिए उखाड़ भी कुछ नहीं पाया। सोचता हूँ, जब भी कोई एनआरआई वापस जाए, उसे थोड़ी-सी मिट्टी, थोड़ा रोड-गड्ढा, थोड़ा कूड़ा-दान उपहार में दे दूँ, ताकि देश की याद ताजा बनी रहे। अंगूर हाथ नहीं लगे, तो उन्हें खट्टा कहने का भी हक मुझे है, सो मैंने भी अपना ‘राग मरसिया’ छेड़ दिया। देखा है लोगों को बेवफा होते हुए, देश की मिट्टी छोड़कर विदेश की रोटी फाँकते हुए।
मौका मुझे नहीं मिला, इसलिए कहता हूँ। सच पूछो तो मैं एनआरआई बन जाता, मेरा प्रमुख काम भी बस डींग हाँकना होता- यहाँ आकर इस
देश की कमियाँ गिनाना और टिशू-पेपर-बिसलेरी का भाव बढ़ाना, और कुछ नहीं। सरकार घर वापसी की बातें करती है; मेरा सुझाव है कि पहले एनआरआई बंधुओं की घर वापसी करा लो। शायद तब मेरा फ्रस्ट्रेशन कुछ कम हो। वैसे मेरा देशप्रेम भी बड़ा चंचल होता- विदेश में होता तो भारत की बड़ी याद आती; भारत में आते ही पलक झपकते गायब हो जाता। मैं भी फ्लेमिंगो पक्षियों की तरह शादी के मौसम में भारत में ब्रीडिंग करने आता। अंडे, मेरा मतलब बच्चे, वहीं विदेश में देता, ताकि ग्रीन कार्ड की जटिलता से बच सकूँ। कॉलेज की कितनी प्रेम कहानियाँ सिर्फ इसलिए फलीं-फूलीं कि सेंट-पॉलियन लड़का ग्रीन कार्ड होल्डर था। मुझ जैसे टाट-पॉलियन के दिल पर तो जैसे साँप लोट जाते। फिर भी सच कहूँ तो एनआरआई बनकर मैं पूर्ण रूप से बुरा भी नहीं होता। अपनी संस्कृति, देसी अंदाज़ और जुबान को विदेश की चाशनी में डुबोकर अनूठे अंदाज़ में परोसता। मेरी जुबान पर गन्ना ‘गाना’, जलेबी ‘जाया- लेबी’, चटनी ‘चाट-नी’, कटहल ‘काट-हॉल’ हो जाता। समीर को सैम कहता, पूजा को ‘पू’ और जय किशन को ‘जैक्सन’। और मेरे खाने की भाषा तो पूछो ही मत। ‘द गॉरमेट स्पाइस्ड पोटैटो विद हर्ब्स’ असल में मेरा जीरा आलू ही
होता। ‘द रेगल बॉटल-गॉर्ड विद इंडियन स्पाइस’ मेरी वही लौकी की भाजी होती। जिस दाल-लौकी को देखकर आज मैं आँखें तरेर देता हूँ, एनआरआई बनकर उसी को रॉयल्टी समझकर ‘ग्रेसफुली’ खाता।
मेरे एनआरआई बनने के कारण भी बड़े दिलचस्प होते, “वहाँ मौसम अच्छा है, क्राइम कम है, ट्रैफिक अनुशासित है।” यानी मुझ जैसा यहाँ का टूटा ढोल वहाँ जाकर भी सुरीला लगता। मेरे लिए छोटी-सी बात भी आपदा होती, “ओह, आय एम अलर्जिक टू पॉलन!” यहाँ तो मैं बुखार को गरम राबड़ी से ठीक करता हूँ, जुकाम को गरारे से। एक्सीडेंट में भी कार की चिंता पहले करता हूँ, इंसान की बाद में। सच यही है, मेरी भी एक दबी-दबी प्रार्थना रही है कि इस जन्म में नहीं, अगले जन्म में तो कम से कम एक एनआरआई दामाद जरूर मिले। और मैं? मैंने इन ऊँची डाल पर लगे अंगूरों को कोसते हुए बस यही कहा है- “मेरी आत्मा को शायद भारत की धूल, मिट्टी और गंगा-जमुनी हवा में ही स्वर्ग का सुख मिलता है।” अब तो बस यही दुआ कर सकता हूँ- अगले जनम मोहे एनआरआई कीजै।

परिचय :-  डॉ. मुकेश ‘असीमित’
निवासी : गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
व्यवसाय : अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ
लेखन रुचि : कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं
प्रकाशन : शीघ्र ही प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से), काव्य कुम्भ (साझा संकलन) नीलम पब्लिकेशन, काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन) लायंस पब्लिकेशन।
प्रकाशनाधीन : व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन)  किताबगंज   प्रकाशन,  गिरने में क्या हर्ज है -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह) भावना प्रकाशन। देश विदेश के जाने माने दैनिकी, साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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