धेनु हूँ मैं
श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
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माता हूँ मैं क्या माँ भी हूँ
क्या हूँ पूजनीय, वंदनीय भी मैं
या हूँ मनुष्य का साधन मात्र?
जिसे साधते आए तुम,
अपनी आस्था और धर्मों से
कहते हैं भक्ति श्रद्धा का आधार हूँ मैं
फिर भी सड़ती, कटती हूँ मैं,
चित्कार कभी जो सुन पाओ
राहों में तिल तिल मरती हूँ मैं
होता नित्य प्रहार मुझ पर,
घर-घर ने दुत्कारा मुझको
मेरे बच्चे भूखे मरते पर मैं
सबका उपकार करूँ
रहे निरोगी काया जन की,
नित घाव की पीड़ा सहती हूँ
माँ बुढ़ी हो भारी लगती,
निज स्वार्थवश ही प्यारी लगती
जो ना हो आसरा श्रद्धा का
माता से भी प्रेम नहीं
पूजा जप-तप, और दान यज्ञ का
भी कोई मोल नहीं
है प्रश्न मेरे अन्तर्मन का
क्या ऋण मेरा चुकाओगे???
नित-नित सहती इस पीड़ा को
क्या तुम हर पाओगे????
तब उठो-उठो हे जन मानस
माता को अगर बचाना है
मानव सब कुछ भू...

























