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अरुणोदय
कविता

अरुणोदय

रशीद अहमद शेख 'रशीद' इंदौर म.प्र. ******************** लुप्त हो गया तिमिर घनघोर! हुआ अब अरुणोदय चहुँ ओर! भूमि से अंबर तक हैं रंग व्याप्त है जीवन के शुभ ढंग नाद ने किया मौन को भंग उड़ रहे अगणित विविध विहंग दृश्य परिवर्तन है चितचोर। हुआ अब अरुणोदय चहुँ ओर। रश्मियाँ रवि की आईं हैं दिशाओं में सब छाईं हैं भूमिगत हुआ कहीं पर तम उजाला अनुपम लाईं हैं प्रकाशित हुए धरा के छोर! हुआ अब अरुणोदय चहुँ ओर। जागरण के गुंजित हैं गीत हवा में है अद्भुत संगीत जगी है जीवन की नव प्रीत हुई है आशाओं की जीत नृत्यरत है सबके मन मोर! हुआ अब अरुणोदय चहुँ ओर! हुए प्रारंभ कई कर्तव्य दृष्टिगत हैं आयोजन भव्य सभी में हैं सहयोगी जन पुरातन हैं कुछ तो कुछ नव्य हुए जड़-चेतन भावविभोर! हुआ अब अरुणोदय चहुँ ओर! . परिचय -  रशीद अहमद शेख 'रशीद' साहित्यिक उपनाम ~ ‘रशीद’ जन्मतिथि~ ०१/०४/१९५१ जन्म स्थान ~ महू ज़िला इन्दौर (म•...
तुम्हीं ने
कविता

तुम्हीं ने

गीता शर्मा सुंदरनगर, रायपुर (छ.ग.) ******************** मुझी से मुझी को चुराया तुम्हीं ने अँगारों पै चलना सिखाया तुम्हीं ने सनी धूल से थे किताबों के पन्ने उन्हें फूल जैसा सजाया तुम्हीं ने नहीं प्रेम का ढाई आखर पढ़ा था वही हँसके मुझको पढ़ाया तुम्हीं ने सजल होती जाती हूँ मैं धीरे-धीरे कमल‌ इस हृदय का खिलाया तुम्हीं ने बनो मत, चलो पास आने की सोचो बहुत यों ही अब तक सताया तुम्हीं ने परिचय :- गीता शर्मा (विश्व कीर्तिमान धारक) जन्मतिथि : १६/८/ जन्मस्थान : रायपुर (छ.ग.) पति : श्री संजीव शर्मा निवासी : सुंदरनगर, रायपुर (छ.ग.) शिक्षा : पी.जी, (विद्यावाच्पति, विद्यासागर ) कार्य : स्वतंत्र लेखन प्रकाशन : चार, तीन शासन से प्रकाशित सम्मान : राज्यस्तरीय. २५, राष्ट्र स्तरीय. २३, अंतराष्ट्रीय..२ आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा...
मन की बात
लघुकथा

मन की बात

माधुरी व्यास "नवपमा" इंदौर (म.प्र.) ******************** एक बार दाँतों और जबान में फालतू की बहस छिड़ गई। जबान बोली- "कितने दिनों से बाहर का खाना नहीं टेस्ट किया।" दाँत ने होशियारी दिखाई बोला क्या बेवकूफ की तरह बात करती हो? सरकार ने लॉक डॉउन यूँ ही लगाया है क्या? मूर्ख कहीं की! दाढ़ बोली- "तुम बहुत ज्यादा पटर-पटर करने लगी हो, इतनी हलचल अच्छी नहीं। मालूम है ना तुम एक हो और हम बत्तीस हैं। "जबान तुनककर बोली- "मुझ पर रौब जमाने की जरूरत नहीं अपने काम से काम रखों समझे!" सामने के दाँत ने गुस्से से कहा- "बाहर मत आना नहीं तो सामने से कट जाओगी तुम समझी! अब जबान से रहा नहीं गया वो भी गुस्से में बोली- "एक बार गलत चल गई ना तो ऐसा घूँसा पड़ेगा कि सब बाहर आ जाओगे। "इस बहस को बढ़ते देख मन चिंतित हो उठा।उसने होंठ को प्रेरणा दी। होंठ बोल पड़े- "अरे भाई सब शांत हो जाओ, कुछ भी करोगे तो नुकसान सबका एक समान ही ह...
अधरों पर
कविता

अधरों पर

जय खीचड़ मोडायत, बिकानेर (राजस्थान) ******************** अधरों पर बुंदे छितरादे अंबर थोड़ा नेह बरसादे!! सुख रही पेड़ो की डाली पंछियों के घर फिरसे सजादे !! धरती पुत्र करे पुकार प्रेम बीज से खेत जुता!दे !! परिचय :-  जय खीचड़ स्नातकोत्तर : फाइनेशियल मैनेजमेंट एम.कॉम निवासी : मोडायत, बिकानेर (राजस्थान) आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमेंhindirakshak17@gmail.comपर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर ९८२७३ ६०३६० पर सूचित अवश्य करें … और अपनी कविताएं, लेख पढ़ें अपने चलभाष पर या गूगल पर www.hindirakshak.com खोजें...🙏🏻 आपको यह रचना अच्छी लगे तो साझा जरुर कीजिये और पढते रहे ...
वर्षा तुम जब
गीत, छंद

वर्षा तुम जब

प्रवीण त्रिपाठी नोएडा ******************** राधेश्यामी छंद में वर्षा गीत… वर्षा तुम जब जब भी आती, मेरा मन दुलरा जाती हो। तरु के पत्तों से टकरा कर, सुरमय संगीत सुनाती हो। तेरे आने की आहट नित, मुझको पहले मिल जाती है। जब तप्त हृदय मेरा होता, तब क्षितिज कालिमा छाती है। हो निनाद जब दूर कहीं पर, नभ हो जाता जिससे गुंजित। विरही मन में तब हूक उठा, प्रियतम की याद दिलाती है। पहले ही संकेतों द्वारा, जैसे भेजी मृदु पाती हो।१ चातक सा रहता मन प्यासा, चाहत बूँदों की है मन में। कुछ स्वाति फुहारें पड़ जायें, शीतलता आये तब तन में। नभ से बरसे जल झर-झर कर, भीगे तब आकुल सा तन-मन। लग जाएँ सावन की झड़ियाँ, आये बहार तब जीवन में। बूँदों की टिप-टिप से उपजे, तुम नवल राग में गाती हो।२ होते हैं भाव विभोर सभी, जब ऋतु परिवर्तन करती हो। तब शुष्क पड़े सब हृदयों के, तुम ताल सरोवर भरती हो। इस भूतल के सारे प्राणी, मिल राह त...
बर्बादी की डगर
कविता

बर्बादी की डगर

संजय जैन मुंबई ******************** किताबो में पढ़ कर, रेडियो में सुन कर। चल चित्र को देखकर, कहानी बड़ेबूड़ो से सुनकर। मोहब्बत करने का मन, दिल में पनापने लगा। और लगा बैठे दिल , पड़ोसी की लड़की से।। अब न दिल धड़कता है, न सांसे ही चलती है। ये कमवक्त मोहब्बत भी, क्या बला होती है। जो न जीने देती है, न ही मरने देती है। चलते फिरते इन्सान को, एक लाश बना देती है।। मोहब्बत के चक्कर में, न जाने कितने लूट गये। और कितने खुदा को, पहले ही प्यारे हो गये। जिसे मिल गई मोहब्बत, वो आबाद हो गया। नही तो जिंदा एक, लाश बनके राह गया।। किसी को इसने पागल, बना कर छोड़ दिया। तो किसीको घायाल करके, बीच मजधार में छोड़ दिया। इसलिए अब मोहब्बत के, नाम से लोग घबराते है। न खुद करते है और, न किसीको सलाह देते है।। परिचय :- बीना (मध्यप्रदेश) के निवासी संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं। करीब २५ वर्ष से बम्बई में प...
दो जून की रोटी
कविता

दो जून की रोटी

दीपक कानोड़िया इंदौर मध्य प्रदेश ******************** दो जून की रोटी खाने को बेबस बैठी है मानवता भांति-भांति के लोग यहां जाने कब आएगी समता कुछ लोलुप सत्ता के लोभी कुछ राजनीति रचते धोबी कुछ है विद्वान प्रकांड यहां कुछ निर्धन से धनवान यहां कितना भी धैर्य रखें जनता जाने कब आएगी समता कुछ को चाहिए आज़ादी रुकती नहीं अब आबादी दर दर पे घूमते हैं गांधी फिर भी नहीं थमती आंधी कर्तव्य निभाने से पहले हक मांगने निकली जनता जाने कब आएगी समता जिस तरह कीट पतंगे भी वृक्षों को काट के खा जाते दीमक बनकर दीवारों पर कण-कण को चाट के खा जाते बस वैसे ही अब मानव है या कह दो सच्चे दानव है ख़ुद को ही काट रही जनता जाने कब आएगी समता दो जून की रोटी खाने को बेबस बैठी है मानवता भांति भांति के लोग यहां जाने कब आएगी समता परिचय :- दीपक कानोड़िया निवासी : इंदौर मध्य प्रदेश आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी...
क्षण फुरसत के है नहीं
कविता

क्षण फुरसत के है नहीं

रीतु देवी "प्रज्ञा" (दरभंगा बिहार) ******************** विषय :- आधुनिक परिवेश में भागता इंसान धन, वैभव पीछे भाग रहा है इंसान सभी पल दो पल भी क्षण फुरसत के है नहीं जब देखो आँखें बुनते रहते हैं स्वप्न सिसकती आहें खो रहे हैं अपनत्व तरसे बच्चे पाने को ममता भरी माँ के आँचल का प्यार दिन, महीने हैं गुजर जाते दे न पाते पिता अपना असीम दुलार वृद्ध चक्षु खोजते हैं रहते शीतल वटवृक्ष छाया हृदय है शून्य सभी हर तरफ बढ गए तार वृक्ष साया अकेलापन समा रहा है जिंदगी में रौनक रही नहीं अब बंदगी में ईर्ष्या, द्वेष का जाल बिछा है चहुँ दिशा फंसाती ही रही है सदैव काली निशा समझ न पाता फिर भी चैन की नींदिया न ले पाता कभी। धन, वैभव पीछे भाग रहा इंसान सभी पल दो पल भी क्षण फुरसत के है नहीं। परिचय :-  रीतु देवी (शिक्षिका) मध्य विद्यालय करजापट्टी, केवटी दरभंगा, बिहार आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी ...
चाँदनी रात
कविता

चाँदनी रात

अर्चना मंडलोई इंदौर म.प्र. ******************** (हिन्दी रक्षक मंच द्वारा आयोजित अखिल भारतीय कविता लेखन प्रतियोगिता "प्रीत की पाती" में प्रेषित कविता) जैसे ही चाँद पर ठहरती है नजर यू ही याद आ जाते हो तुम चाँद के चमकिले उजास में आसमान की सतरंगी परिधि के बीच जैसे ही तुम्हारा अक्स नजर आने लगता है तब लगता है चाँद और मेरे बीच एक अनकहा रिश्ता है। उसके सौन्दर्य मे मै अपने सपनो को निहारती हूँ मन के आकाश मे घुमते मेरी अधूरी कामनाओं के बादल मेरी सपनीली आँखों में मधुर स्मृतियों के चित्र बनाते और क्षण भर में चाँदनी की तरह फिर बिखर जाते।। परिचय : इंदौर निवासी अर्चना मंडलोई शिक्षिका हैं आप एम.ए. हिन्दी साहित्य एवं आप एम.फिल. पी.एच.डी रजीस्टर्ड हैं, आपने विभिन्न विधाओं में लेखन, सामाजिक पत्रिका का संपादन व मालवी नाट्य मंचन किया है, आप अनेक सामाजिक व साहित्यिक संस्थाओं में सदस्य हैं व सामाजिक गतिविधिय...
प्रेम की गली में
कविता

प्रेम की गली में

विनोद सिंह गुर्जर महू (इंदौर) ******************** (हिन्दी रक्षक मंच द्वारा आयोजित अखिल भारतीय कविता लेखन प्रतियोगिता "प्रीत की पाती" में प्रेषित कविता) प्रेम की गली में ये उदारता है क्यों ? ... बार-बार दिल तुझे पुकारता है क्यों ?... तू नहीं तो तेरा एहसास है मुझे, ऐसा लगे जैसे आस-पास है मुझे।-२ तेरे-मेरे चित्र नयन, उतारता है क्यों ? बार-बार दिल तुझे पुकारता है क्यों ? सच मानिए जब से आप मिल गए। मन मधुबन में कई पुष्प खिल गए।-२ अंग-अंग दीप अब उजारता है क्यों ? बार-बार दिल तुझे पुकारता है क्यों ? मीरा श्याम रंग में दीवानी हो गई। भक्ति अनुराग की कहानी हो गई।-२ गरल में सुधा, नेह उतारता है क्यों ? बार-बार दिल तुझे पुकारता है क्यों ? राधा व्याकुल हुई घनश्याम आ गए। शबरी के जूठे बेर राम खा गए । -२ ईश्वर भी प्रेम बस हारता है क्यों ? बार-बार दिल तुझे पुकारता है क्योँ ? परिचय :-...
पापा जिंदा है
लघुकथा

पापा जिंदा है

अर्पणा तिवारी इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** (हिन्दी रक्षक मंच द्वारा आयोजित अखिल भारतीय लघुकथा लेखन प्रतियोगिता में प्रेषित लघुकथा) पांच साल की नन्हीं मासूम गुड़िया की समझ में नहीं आ रहा था कि, पापा के आने की चिट्ठी पढ कर तो दादी और मां दोनों मिलकर पापा की पसंद के पकवान बनाती थीं, फिर आज पापा के आने की चिट्ठी पर घर में सब क्यों रो रहे है? आखिर दादी के पास जाकर गुड़िया ने अपना प्रश्न दादी से पूछा, दादी गुड़िया को सीने से लगाकर फफक फफक कर रोने लगी, गुड़िया मेरी बच्ची तेरे पापा देश की सेवा करते हुए शहीद हो गए है। तुझ पर से पिता साया हट गया है मेरी बिटिया, तेरे पापा अब इस दुनियां में नहीं रहे बेटी, दादी के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे, लेकिन दादी पापा ने तो मुझसे कहा था कि जो देश की सेवा में शहीद होते है, वे हमेशा जिन्दा रहते है, देश की हवाओं में, देश की मिट्टी में और देशव...
चीत्कार उठा ये हृदय मेरा
कविता

चीत्कार उठा ये हृदय मेरा

डॉ. अर्पणा शर्मा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** चीत्कार उठा ये हृदय मेरा अश्रु नही समाते है, इतने निर्दयी, इतने पापी कैसे इंसान कहाते है एक निर्बल ने थामा कसकर जिसको वो रक्षक समझा था उसने ही झोंक दिया पशुओं में रक्षक नही वो भक्षक था पशुओं में भी अपनेपन के हम भाव उजागर पाते है इतने निर्दयी, इतने पापी कैसे इंसान कहाते है... कैसे सभ्य समाज कहूँ मैं दुष्टों की इस टोली को जान न पाया जो साधु की निर्बल मीठी बोली को जो थे दुनिया का दुख हरते वो ही दुख अब पाते है... इतने निर्दयी, इतने पापी कैसे इंसान कहाते है.. भीड़ भरी दुष्टों की थी इंसान कही न नज़र आया कुछ ही पल में अलग हो गई प्राणों से झरझर काया एक निरिह प्राणी को सब मिल मिट्टी में मिलते है.... इतने निर्दयी, इतने पापी कैसे इंसान कहाते है.... पल-पल जिसने है प्रभु मेरे केवल तेरा ही नाम जपा सदाचार और सद्व्यवहार का जिसने था संसार रचा क...
पछ्तावा और सीख
लघुकथा

पछ्तावा और सीख

कंचन प्रभा दरभंगा (बिहार) ******************** (हिन्दी रक्षक मंच द्वारा आयोजित अखिल भारतीय लघुकथा लेखन प्रतियोगिता में प्रेषित लघुकथा) मेरी सहेली गितिका अपने यादों में खोई छत की मुंडेर पर बैठी थी अचानक मुझे वहां देख कर चौंक गई। मैनें पुछा 'क्या हुआ गितिका तुम चौंक क्यो गई' और मैनें उसकी आँखो में आंसु देखे। फिर से उसे अपनी जिन्दगी के वो मनहूस पल याद आ रहे थे जब उसके अनुसार उसके जीवन का अन्त हो गया था शायद इस लिये उसके आँखो में आंशु दिख रहे थे। गितिका मेरे साथ कॉलेज में पढ़ती थी। काफी बाचाल थी हमेशा हँसते रहना उसकी पहचान थी। कॉलेज में भी वो सबकी चहेती थी। उसके इसी हंसमुख स्वभाव के कारण कॉलेज का एक लड़का मयंक उसे चाहने लगा। कॉलेज खत्म हो गई दोनों अपने अपने घरवालों से बात की और हाँ हो गई। दोनों के परिवार बहुत अच्छे थे। काफी धूम-धाम से दोनो की शादी हो गई। नये घर मे जा कर गितिका काफी ...
हे प्रियतम
कविता

हे प्रियतम

रुचिता नीमा इंदौर म.प्र. ******************** (हिन्दी रक्षक मंच द्वारा आयोजित अखिल भारतीय कविता लेखन प्रतियोगिता में प्रेषित कविता) हे प्रियतम कैसे व्यक्त करू.... अपने मन के भावों को वो ह्रदय में उठते वीणा के झंकारों को.... जानती हूं एक हसीन सपना हो तुम, जो कभी मिलकर भी मिल न सको, वो सबसे प्यारा अपना हो तुम...। लेकिन इस अतृप्त ह्रदय को अब समझाना है मुश्किल...। वो तुमसे हुई छोटी सी मुलाकात वो अपना सा स्पर्श, वो चिरपरिचित सी मुस्कान और तुम्हारा यह कहना कि मैं हु न तुम्हारे साथ हमेशा, इतना सकूँ दे गया कि तुम्हारे साथ न होने का सब दर्द भी ले गया, अब तो बस, इतना ही है कहना की इस मुलाकात के सहारे अब जीवन भर है जीना। और तुम्हारी ही होकर रहना.....। परिचय :-  रुचिता नीमा जन्म २ जुलाई १९८२ आप एक कुशल ग्रहणी हैं, कविता लेखन व सोशल वर्क में आपकी गहरी रूचि है आपने जूलॉजी में एम.एस.सी., मइक...
प्रकृति  का कहर
कविता

प्रकृति का कहर

शुभा शुक्ला 'निशा' रायपुर (छत्तीसगढ़) ******************** आधुनिक परिवेश में प्रदूषण हमारी प्रमुख समस्या पर्यावरण सूरक्षित नहीं, नहीं सुरक्षित देश की प्राकृतिकता एक ओर तो चीखते रहते, हम सब पर एहसान जता कर प्लास्टिक का विरोध दिखाते जहां तहां जुलूस निकाल कर हर सरकार आती जाती अपने जलवे बिखेर के जाती पर जो आवश्यक तत्व हैं उनपर उनकी नजर ना जाती जनता भी ना अपनाये पर्यावरण के स्वस्थ उपाय स्वयं तो कुछ कर नहीं पाते एक दूजे पे उंगली उठाए सरकार के साथ हमें भी स्वच्छता का मूलमंत्र याद रखना होगा गीला कचरा सूखा कचरा अलग रखने का सतर्कता से पालन करना होगा पर्यावरण को बढ़ाने दोस्तो एक एक पेड़ लगाना है रास्ते गलियां घर चौबारो में शीतल बयार बहाना हैं प्लास्टिक की मोहमाया को आज भी हम सब तज नहीं पाये यदा कदा डिस्पोज़ल कैरी बैग प्लास्टिक के अपने काम ही आएं जो हम ध्यान ना रख पाए तो भुगतान हमे ही करना ...
पछतावा
लघुकथा

पछतावा

मनोरमा जोशी इंदौर म.प्र. ******************** (हिन्दी रक्षक मंच द्वारा आयोजित अखिल भारतीय लघुकथा लेखन प्रतियोगिता में प्रेषित लघुकथा) आज अमन बहुत खुश है, माँ को पहली नौकरी की खबर देता है। माँ आशीर्वाद देते अतीत में खो गई। वह हृदय विदारक घटना जब पिता देव का दुर्घटना में आकस्मिक निधन हो गया। कैसे ! अमन को बीमार पड़ने पर रात में अकेली हॉस्पिटल लेकर दौड़ती, कैसे! स्कूल लेने छोड़ने...और ना जाने क्या-क्या याद आने लगा। माँ क्या सोचने लगी? कुछ नहीं बेटा जब तू तीन साल का था तब से आज तक....हाँ माँ कैसे सिलाई में दिनभर भीड़ी रहती हो, पर अब मत सोचो ये सब अब! कुछ समय बीता अमन को विदेश भेज जाना पड़ा, केरल के मूल निवासी थे, समय-परिस्थितियों ने यही का रख छोड़ा था। माँ-बेटे का कोई अपना ना था, बेटा माँ को एक वर्ष का वादा कर वृद्धाश्रम में छोड़कर चला गया।दो वर्ष बीत गए, शुरू में अमन का फोन आता था, अब वो ...
कैसी है ये जिद तुम्हारी
कविता

कैसी है ये जिद तुम्हारी

मीना सामंत एम.बी. रोड (न्यू दिल्ली) ******************** उम्र के इस पड़ाव पर मैं भूल गयी थी सब पढ़ा लिखा अब कैसी है ये जिद तुम्हारी कलम देकर कहते हो थोड़ा लिखकर तो दिखा! समझता नही कोई एहसासों को सोचकर यही लिख-लिखकर कभी मन के पन्नों से कभी कापी के पन्नों से कितनी बार देती हूँ मिटा! जिंदगी की उलझनों को एक उम्र न सुलझा पाई कैसी है जिद यह तुम्हारी कलम कापी देकर कहते हो कुछ तो मुझको तू सिखा! लिखे थे जो कभी मैं ने रफ कापी के पन्नों में कुछ टेड़े मेड़े शब्द भाव अपने कैसी है ये जिद तुम्हारी कहते हो उन पन्नों को अब मुझे दिखा! परिचय :- मीना सामंत एम.बी. रोड (न्यू दिल्ली) आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां...
तम अंधेरा
हाइकू

तम अंधेरा

मित्रा शर्मा महू - इंदौर ******************** तम अंधेरा मिटा दो भगवान डरते जन। महामारी ने निगलता जा रहा फैला है तम। छिन रहा है मजदूर की रोटी भूखा जहान। क्रंदन भरा हतोत्साहित मन डरता जन। आखों में आते बिना नीद के ख्वाब आजमाते है। रकीब बन सता रहा है हमे यह समय। जीवन डोर छूट जाने का डर कोरोना काल। हारेंगे नहीं लड़ते ही रहेंगे थमेंगे नहीं। परिचय :- मित्रा शर्मा - महू (मूल निवासी नेपाल) आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमेंhindirakshak17@gmail.comपर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर ९८२७३ ६०३६० पर सूचित अवश्य करें … और अपनी कविताएं, लेख पढ़ें अपने चलभाष पर या गूगल प...
मन ठहरा मन बहता
कविता

मन ठहरा मन बहता

शैलेन्द्र चेलक पेंडरवानी, बालोद, छत्तीसगढ़ ******************** टिक न सके ये क्षण भर, मन चंचल मन बावरा, राममय शांत कभी, कभी रासमय सांवरा, बहे तो सलिल सरिता- जो उद्यत मिलने सागर को, स्वच्छन्दता सा वेग धारे, तोड़ बंधनों के गागर को, पर संघर्षो में चंचलता, व्याकुलता में हो परणीत, खो देता विस्तार स्वयं का, भूलकर जीवन के गीत, बहता मन ठहर जाता , अवसाद लिए, प्रमाद लिए, घिर जाता निराशाओं में, अंतर्द्वद्व का नाद लिए, सुख-दुख कुछ नही रे बंदे, मन की गति, मन का कहना, जीवन चलता रहता पल-पल, तुम धारा संग सीखो बहना, मन आतम मिले तो राह चले ईश्वर की, न मिले तो ये कहता, भाव उद्दीग्नो में बहे चले, रे मन ठहरा रे मन बहता, परिचय :- शैलेन्द्र चेलक निवासी : पेंडरवानी, बालोद, छत्तीसगढ़ आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने ...
घर की छत
कविता

घर की छत

रोहित कुमार विश्नोई भीलवाड़ा, राजस्थान ******************** घर की छत आज भी पुराने दिनों को पुकारती है मुण्डेर पर रोज बैठ कागे का वो कांव-कांव करना, सारे पक्षियों के लिए सुबह रोज परिण्डे पानी के भरना। मक्का-बाजरे का छत की फर्श पर वो बिखरना, सैकड़ों कबूतरों के साथ दो-तीन तोतों का छत पर मस्ती से फिरना। गोरैयों की फौज की जगह एकदम साफ फर्श छत को संवारती है, घर की छत आज भी पुराने दिनों को पुकारती है।। परिचय :- रोहित कुमार विश्नोई स्नातकोत्तर - हिन्दी विषय (राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा-उत्तीर्ण) स्नातक - कला संकाय (हिन्दी, इतिहास, राजनीतिक विज्ञान) स्नातक - अभियान्त्रिकि (यान्त्रिकि शाखा) निवासी - पुर, भीलवाड़ा, राजस्थान आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाश...
प्रणेता साहित्य संस्थान, नई दिल्ली की ऑनलाइन काव्यगोष्ठी संपन्न
साहित्यिक

प्रणेता साहित्य संस्थान, नई दिल्ली की ऑनलाइन काव्यगोष्ठी संपन्न

प्रणेता साहित्य संस्थान, नई दिल्ली के चतुर्थ स्थापना दिवस महोत्सव के उपलक्ष्य में कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कवयित्री श्रीमती पुष्पाशर्मा "कुसुम" (सेवानिवृत हिंदी व्याख्याता राजस्थान शिक्षा विभाग) जी ने की। आ. श्रीमती वीणा अग्रवाल जी ने संचालन की कमान बड़ी कुशलतापूर्वक संभाली। मुख्य अतिथि- श्री सत्येन्द्र सत्यार्थी, कवि, लेखक, संपादक, वरिष्ठ उपाध्यक्ष, दिनकर सोसाइटी दिल्ली व भारतीय नेत्रहीन कल्याण परिषद्, दिल्ली थे। विशिष्ट अतिथि -श्री गोविंद सिंह पवार, रचनाकार, पत्रकार, समाजसेवी। महासचिव (अखिल भारतीय साहित्य सदन) उप सचिव ( दिल्ली मीडिया ऐसोसिएशन) और कर्नल श्री प्रवीणशंकर त्रिपाठी जी थे। माँ शारदे को माल्यार्पण व दीप प्रज्वलन के बाद अतिथि स्वागत के साथ कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ हुआ। प्रणेता अध्यक्ष श्रीमती सुषमा भण्डारी जी ने माँ शारदा वंदना "माँ शारदे सुविचार दे" की बहुत मधुर स्वरों म...
सीता बनना सौभाग्य कहां
कविता

सीता बनना सौभाग्य कहां

अर्पणा तिवारी इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** सीता बनना सौभाग्य कहां अगणित तुमको शूल मिले, वनवासी तो राम रहे पर, तुमको भी कब फूल मिले .. आदर्श बनीं तुम जग में, पतिव्रत धर्म निभाया था, त्याग समर्पण का पथ तुमने, जग को दिखलाया था, जनक सुता होकर भी तुम, महलों में कब रुक पाई थी, आदर्शो की राह दिखाने, पुण्य धरा पर आई थी, राम प्रिया से मानव को, कितने जीवन मूल्य मिले, वनवासी तो राम रहे पर, तुमको भी कब फूल मिले... अग्नि परीक्षा देकर तुम, खुद को निर्दोष बताती हो, परीक्षा स्वीकार करे ना जग तो धरती बीच समाती हो, त्रेता युग की उस अग्नि परीक्षा को कलयुग में ऐसा मोड़ दिया, चरित्र शुद्धता से मानव ने, फिर उसको जोड़ दिया, राम के आदर्शो को भुला नर, नारी सीता तुल्य मिले, वनवासी तो राम रहे पर, तुमको भी कब फूल मिले.... माफ़ करो तुम जनक सुता, ये प्रश्न बड़ा बैचेन किए, अग्नि परीक्षा एक कसौटी हो, न...
स्वर्ग सी धरती
कविता

स्वर्ग सी धरती

डॉ. भवानी प्रधान रायपुर (छत्तीसगढ़) ******************** धरती ओढे हरियाली चुनर मनमोहक लगे सुन्दर अपार मंद-मंद मुस्कुराई धरा रंग बिरंगे फूलों की डाली वृक्षों का हो सघन विस्तार होले -होले चले शीतल बयार प्रकृति की सौंदर्य निखरे आज खिल उठे वन उपवन आज अलबेली अपनी वसुंधरा रानी सरसों फुले पीली धानी खेतों में लहराये फसलें सारी हरियाली प्रतिक खुशहाली का मद में भरकर झूम रही उपवन की डाली -डाली वृक्षों पर खग कलरव तान नाचे वन में मोर पंख पसार पीहू -पीहू पपीहा करें आज आम्र में कोयलिया कूक रहीं मृग विचारते मधुबन में आज सरिता की निर्मल जल धारा मेघ मिलाते धरती अम्बर कण-कण नव जीवन स्पंदित श्यामल तन पर सुमन सुगन्धित अलबेली अनुपम अतिसुन्दर लगती चराचर आनंद की अनुभूति पर्यावरण लगे सुरभित मनभावन धरा की मिट्टी हो उपजाऊ छलकाये प्रकृति प्रेम गगरिया जीव जगत में तब हो उजियारा . परिचय :- डॉ. भवानी प...
दर्द लघुकथा
लघुकथा

दर्द लघुकथा

श्रीमती शोभारानी तिवारी इंदौर म.प्र. ******************** मुन्नी चलो, रमा सब सामान रख लो। राजू को गोदी में बारी-बारी से उठा लेंगे। मुन्नी ने कहा, कहां चले बापू ? रमेश ने कहा, हम अब यहां नहीं रहेंगे। इस शहर ने हमें दिया ही क्या है ? १० वर्ष हो गये, हम यहां कमाने खाने के लिए अपने गांव से शहर "मुंबई "आए थे। इन १० वर्षों में मेहनत और परिश्रम किया भवन का निर्माण किया। कभी गुंबद पर चढ़कर, कभी मंदिर के नींव में दबकर, लेकिन लॉक डाउन में जब लोगों की बारी आई तब हमारा ख्याल रखने को कोई नहीं आया। सबने हाथ झटक दिए। तीन दिनों से हम भूखे और प्यासे हैं। कोई पानी तक को पूछने नहीं आया। सेठ ने हमें नौकरी से निकाल दिया। अब क्या करें? तो हमें हमारा गांव ही दिखाई दे रहा है। धीरे से रमा ने कहां, लेकिन हम गांव जाएंगे कैसे? ट्रेन, बस तो चल नहीं रही है। रमेश ने जवाब दिया, अभी हमारे हाथ पैर सही सलामत हैं। हम पैद...
नि:शब्द
कविता

नि:शब्द

डॉ. यशुकृति हजारे भंडारा (महाराष्ट्र) ******************** मैं चल पड़ी हूँ उस पथ पर डगमगाते है पग मेरे निराशाओं में घिरते जाती, दु: ख और सुख की अनुभूतियों में मैं खो जाती हूँ निहारू निरंतर भावों को, शब्द न जाने कहाँ खो गये नि:शब्द हुई मेरी कवित। मैं हुई एकांकी प्यासे हुए मेरे भाव बंद कमरे में, जिंदगी ठहर सी गई। इंद्रधनुष के रंगों को देखकर मैं समेटना चाहती हूं सतरंगी इंद्रधनुष के रंगों को जीवन में ढालना चाहती हूंँ तुम्हारे ही रंग में रंगना चाहती हूं फिर भी भाव न बनते हृदय प्रफुल्लित होता निरंतर, खिल उठता रोम-रोम, फिर भी भाव न बनते। कल्पनाओं की उड़ान नहीं बनती, यथार्थ में जीने की आदत हो गई है धुंधले दिखाई देते हैं सब कल्पनाओं के चित्र, जिंदगी बदरंग सी हो गई है क्या उषा, क्या निशा, कल्पनाओं की उड़ान, अब तमस में सिमट कर रह गई है... परिचय :- डॉ. यशुकृति हजारे निवासी : भंडारा (महाराष्ट...