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छाई हरियाली (सिहरी)
कविता

छाई हरियाली (सिहरी)

गोविन्द सरावत मीणा "गोविमी" बमोरी, गुना (मध्यप्रदेश) ******************** १ छाई हरियाली गाती गीत कोयल काली बरसे बदरा !! २ घिरी घटा लगती मोहक निर्झरिणी छटा उत्ताल तरंग !! ३ बहते निर्झर कली-कली मंडराए मधुकर महके प्रसून !! ४ रिमझिम-रिमझिम रही बरस बरखा रानी पानी-पानी !! ५ प्रकृति हरसाई दुल्हन बन धरा मुस्काई पल्लवित कानन !!! परिचय :- गोविन्द सरावत मीणा "गोविमी" निवासी : बमोरी जिला- गुना (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हम...
किसी का बसेरा होगा
कविता

किसी का बसेरा होगा

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** चहकने दो मुझे आंगन में झुलती बेलो के साथ बहने दो मुझे निर्बाध गति के साथ मत बांधो हमें बन्धनों में घेर कर चहकने दो दौड़ने दो आंगन सजेंगे कल, कल करता जल पृथ्वी को सिंचता हरित करेगा श्यामल थरा को हरियाली नाचेगी टेसू फुलेगे रवितामृ वर्ण में बिखरेंगे बसन्त बयार में फूलों से आंगन सजेंगे काटो मत शाखाओं को कहीं पन्छी का ठौर होगा कपिल, किल का कलरव होगा चुग्गा चुगने मुंह खुलता होगा चहक कर चिड़िया गाती होगी कोयल कूक सुनाती होगी काटो मत उसे वह किसी का बसेरा होगा। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जु...
भूतकाल का भूत
कविता

भूतकाल का भूत

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** भूतकाल के भूतों ने हमको बहुत सताया है, डरने के कारण अपने हिस्से ठेंगा आया है, आभासी कच्चे चिट्ठों पर आज भी करते भरोसा है, टूटता रहता यकीं अपना मिलता केवल धोखा है, किसी के लिए धंधा ये सब पर हमने बहुत गंवाया है, डर डर सब लुटाया हमने कोई थैली भर भर पाया है, भूतकाल के भूतों का शौक देखो मचल गया, देखने का भाव अब ऊंची नीची जाति में बदल गया, तब के समय के सारे नियम अब भी देखो लागू है, अश्पृश्यता, हिंसा, लिंचिंग करके ये बन जाते साधु है, अब भी मन में मैल भरा जिसे नहीं ये धोते हैं, आगे निकल गया दमित तो खून के आंसू रोते हैं, सदनीयत से जब भी कोई संविधान लागू कराएगा, भूतकाल का भूत फिर तो सरपट भागा जाएगा। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमा...
ननद बहन
कविता

ननद बहन

किरण पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** ननद को जीवन में क्या हम समझे? बहन समझे या ननद हम समझे, मायके का एक अंश ननद है। थोड़ा सा अधिकार ननद है, प्रेम भाव का राज ननद है, मेल मिलाप की जगह ननद है। प्यार की एक जगह ननद है। सहेली और बहन का संबंध ननद है भाई का तो प्यार ननद है। मानसिक दुख का इलाज ननद है, भाई की शक्ति तो ननद है, नहीं किसी से लेना देना बस बिगड़े काम बन जाए ननद है। "दीप से दीप जलाती ननद है, एक पंक्तिबद्ध का भाव ननद है" पीहर में खुशहाली ननद है, हल्ला गुल्ला शोर शराबा, देखो एक माहौल ननद है। काम सुधारे काम बनाये, भाई की उलझन का हल है । पिता के दिल का भाव ननद है माता का तो प्यार ननद है, पीहर की ढाका छाबी ननद है। भाई का तो भाव ननद है। मान अपमान का घुट ननद है। पीहर की तो लाज ननद है, अमीरी गरीबी का मान ननद है। सह लेती सब भार ननद है...
विरह अग्नि
गीत

विरह अग्नि

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** विरह अग्नि झुलसाती तन को, साजन हमें जलाती है। लौट सजन घर आ जाओ अब, ऋतु मिलन की सुहाती है।। बिलखे है शृंगार हमारा, होंठ अंगारे हो रहे। मतवाले जब बादल उमड़ें, बैठे सजन हम रो रहे।। तन पुरवाई आग लगाती, याद तुम्हारी आती है। तार-तार होता है दामन, मन वृंदावन मुरझाता। प्रेम-पिपासा बढ़ती जाती, कौन बता अब बहलाता।। करें याद क्षण अभिसारों की, सारी रात जगाती है। चालें सर्पिल-सर्पिल आहत, लाल कपोल हुए घायल। तान सुनाती जब पिक मधुरिम, मौन रहे पागल पायल।। आजा सुन अब मनुहारों को, यौवन धार बुलाती है परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सुमित्रा पाठक पिता : स्व. हरि मोहन पाठक पुत्र : सौरभ भट्ट पुत्र वधू : डॉ. प्रीति भट्ट पौत्री : न...
भावों की पोटली है : पोटली …एहसासों की
पुस्तक समीक्षा

भावों की पोटली है : पोटली …एहसासों की

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** समीक्षक : सुधीर श्रीवास्तव पिछले दिनों जब अनुजा भारती यादव 'मेधा' का एकल कविता संग्रह "पोटली ...एहसासों की" स्नेह स्वरुप प्राप्त हुई थी, तो बतौर कलमकार से अधिक अग्रज के तौर पर मुझे अतीव प्रसन्नता का बोध हुआ था, तब मन के कोने में यह जिज्ञासा, उत्सुकता अब तक बनी रही कि मुझे कुछ तो अपने विचार व्यक्त करने ही चाहिए। वैसे भी काफी समय से भारती से आभासी संवाद और आभासी मंचों, पत्र पत्रिकाओं में पढ़ने सुनने का अवसर जब-तब मिल ही जाता है। सबसे अधिक प्रसन्नता तब हुई, जबसे यह ज्ञात हुआ कि मेधा के पिता (श्री राम मणि यादव जी) स्वयं एक वरिष्ठ कवि साहित्यकार हैं। तब से लेकर अब तक उनका स्नेह आशीर्वाद मिलता रहने के साथ संवाद भी जब तब हो ही जाता है। गद्य, पद्य दोनों विधाओं में सतत् सृजनशील संवेदनशील मेधा पारिवारिक दायित्...
मेरा भी एक गांव है
कविता

मेरा भी एक गांव है

मानाराम राठौड़ जालौर (राजस्थान) ******************** हार न होय मेहनत की हार होय ईमानदार सत्य की। गांव के चमकीले साथी उठाकर उत्संग में झूठ को फिरे। जय उसी की जय बोले जो विश्वास माने मिथ्या को। निंदिया बनी हरामी ग्रामीणों पर संकट बनी भविष्य पर। जाग्रत जीवनी उसकी लिखी सत्य पर निर्भर ज्ञान सिखी। दोषारोपण में बीज बोय झूठ का साथ चमकीले साथी उकसाने का। सचेत और ईमानदारी की ना जड़ें फिर भी हम गांव में हैं खड़े। यह कैसी पंक्ति है श्रेणी की यह हमारी संगति है श्रेणी की। ना सचेत ना जागरूक इसीलिए तो अंधकार है। जहां प्रकाश नहीं वहां उजाला कैसा मेरा भी एक गांव है यहां उजाला कैसा। गांव के चमकीले साथी उठाकर उत्संग में झूठ को फिरे। कहीं दाल पुरी तो कहीं खीर पुरी यह सब जगह होती है जरूरी। छोटा-सा क्षेत्र गांव का बड़े रास्ते कानाफूसी के। परिचय :- मानाराम राठौड़ निवासी : आखराड...
सुरक्षा-संदेश
दोहा

सुरक्षा-संदेश

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** बढ़ती जब जनसंख्या, बढ़ता है तब भार। हो जाती हर योजना, तब निश्चित बेकार।। बढ़ता है जन भार जब, दुख पाता परिवार। सभी तरह से देश में, फैले तब अँधियार।। दोपहिया पर बैठ जब, एक साथ परिवार। कहे सुरक्षा आ रहा, दुर्घटना का वार।। ध्यान रखें जो वे रहें, सड़कों पर अनुकूल। बिना कायदे जो रहें, चुभते उनको शूल।। सड़कों पर खिलवाड़ तो, लेती जीवन लील। बहुत कीमती ज़िन्दगी, करो ज़रा तुम फील।। लापरवाही त्याग दो, वरना तय है काल। होगा तुमको हर कदम, वरना "शरद" मलाल।। नियम सदा हित को रचें, उन्हें मान नहिं व्यर्थ। डरो रोड कानून से, समझो उसका अर्थ।। मन में धरकर जोश तुम, गँवा न देना होश। वरना विधि या मौत तो, भर लेंगी आगोश।। होगा जब सीमित यहाँ, हर इक का परिवार। तभी प्रखर प्रतिकूलता, का होगा संहार।। दोपहिया की नहिं अ...
हरे भरे खेत
कविता

हरे भरे खेत

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** जब हो हरे भरे खेत तो किसान को तस्सली मिलती है। उसकी की गयी मेहनत फली भूत दिखती है। ****** हरे भरे खेत देखकर किसान खुश हो जाता हैं। और सपनों की दुनियां में खो जाता हैं। ******* हरे भरे खेत किसान की मेहनत का परिणाम है। अपनी जीविका को देता अंजाम है। ****** हरियाली आंखो को भाती हैं। प्रकृति में चारों ओर खुशी छा जाती है। ******* अगर खेत हरे भरे रहेंगे तो देश में खुशहाली आयेगी। और अन्नदाता किसान की जिंदगी बदल जायेगी। परिचय : डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" निवासी : चिनार-२ ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी घोषणा : मैं यह शपथ पूर्वक घोषणा करता हूँ कि उपरोक्त रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा ...
आपको इश्क हो गया है …
कविता

आपको इश्क हो गया है …

रागिनी सिंह परिहार रीवा (मध्य प्रदेश) ******************** जब किसी के पास अच्छा लगने लगे जब किसी का साथ अच्छा लगने लगे जब किसी की बाते अच्छी लगने लगे तो समझ लेना आपको इश्क हो गया। जब किसी की खामोशी खलने लगे जब किसी के अल्फाज सताने लगे जब नजर की नजर से बात होने लगे तो समझ लेना आपको इश्क हो गया। जब किसी के आने से फर्क पड़ने लगे जब किसी के जाने से डर लगने लगे जब किसी के ठहरने का इंतजार होने लगे तो समझ लेना आपको इश्क हो गया। जब किसी के पास आने से हलचल होने लगे जब किसी के छूने से जज्बात मचलने लगे जब किसी के होंठों से शबाब झलकने लगे तो समझ लेना आपको इश्क हो गया। जब किसी की बातें हंसाने लगे जब किसी की यादें रुलाने लगे जब किसी का ख्वाब आने लगे तो समझ लेना आपकों इश्क हो गया। जब अपने पराए लगने लगे जब पराए अपने लगने लगे जब मां-बाप की बातें चुभने लगे तो समझ ले...
उठो द्रोपदी अब अस्त्र उठाओ
कविता

उठो द्रोपदी अब अस्त्र उठाओ

गोविन्द सरावत मीणा "गोविमी" बमोरी, गुना (मध्यप्रदेश) ******************** उठो द्रोपदी अब अस्त्र उठाओ, कब तक जियोगी बनके बेचारी। क्यों लज्जित पग-पग स्वाभिमान, क्यों बढ़ाते नही चीर गिरधारी।। तुम स्वयं सृष्टि की हो सृजक, तुमसे ही कण-कण स्पंदित है। सीने में धधके ज्वालामुखी तेरे तुझसे ही नभ-भू आनन्दित है।। समझो न स्वंय को अब अबला, तुम तो पालक हो महाप्रलय की। तुम ही हो सुख-समृद्धि की दाता, तुम ही हो वर शाश्वत अभय की।। संभव नही मानव जीवन यह, बिन वामांगी के इस संसार में । करो नही मर्दन मान स्वंय का, छल-छदमी कामी व्यवहार में।। अब फिर न दुष्ट दुशासन कोई, केश खींचने का दुःसाहस करे। अब गली-गली दुर्योधन घूमते, सोच-समझकर ही व्यवहार करें।। अनुसुइया-सा तेरा जीवन पावन, फिर क्यों लगे तन पर लिवास भारी। तुम तो हो स्वंय प्रतिमूर्ति सौंदर्य की, तुमसे ही सुरभित यह धरा प...
गहरा गड़ा खूंटा
आलेख

गहरा गड़ा खूंटा

शांता पारेख इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** जेंडर समानता की बात बहुत हो रही है, समान काम का वेतन अलग होना बहुत शर्म की बात इसलिए है कि मुर्मू जी राष्ट्रपति हो, सीतारामन सबसे बड़े लोकतंत्र में दुनिया की तीसरी अर्थव्यवस्था का बजेट पेश करे, हलवा भी बने, तीखे प्रश्नों के जवाब भी आत्मविश्वास से देवे। पायलेट हो, वायुसेना में विशेष भूमिका में हो, सेना के ट्रूप का पुरुषों की टुकड़ी का गणतंत्र दिवस पर नेतृत्व करते देख सारी नारियां उछलने लगे, तब ऊंचे ओहदों डॉक्टर ऑपरेशन थिएटर तक मे अंतर हो तो कुछ सोचने वाली बात है। कल एक बिल्डिंग का सिक्योरिटी ठेकेदार से बात हुईं कहने लगा, मैडम इस बिल्डिंग में चालीस प्रतिशत महिला कर्मचारी है, सुरक्षा की दृष्टि से छत आदि पर ताला लगवाना बहुत जरूती है, एक हादसा होने पर मेरी एजेंसी खतरे में पड़ जाएगी। माना एक की कमाई से घर नही चलता है। आज नर्सिंग घोटाले स...
कारे बदरा देख झूमे मनवा
कविता

कारे बदरा देख झूमे मनवा

निरूपमा त्रिवेदी इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** उमङ-घुमङ कर कारे बदरा छाए देखो-देखो कितना जल भर लाए रिमझिम-रिमझिम देख बरखा खिल-खिल जाए मुखड़ा सबका मतवाला मयूर घूम-घूम नाचता पीहू-पीहू पपीहा भी गाता दादुर टर्र-टर्र टर्राता किसना खेत देख हर्षाता मुनिया रानी नाव बना तैराती छप-छप कर मुन्ना छीटे उङाता गरमा-गरम भुट्टा सबको अति भाता पकोड़े की खुशबू जियरा ललचाता बचपन देखो होता कितना प्यारा मेंढक देख फुदकता मुन्ने का मनवा ताल-तलैया में पानी सुहावना अमुआ की डाल पर झूला मनभावना शीतल सोंधी-सोंधी माटी की खुशबू खुशहाली छा गई देखो-देखो हरसू कभी तितली सा मन रंगों से भरता कभी चिहू-चिहू चिड़ियों सा चहकता परिचय :- निरूपमा त्रिवेदी निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एव...
कृष्ण जी की १६ हजार रानियों का सत्य
आलेख

कृष्ण जी की १६ हजार रानियों का सत्य

डॉ. किरन अवस्थी मिनियापोलिसम (अमेरिका) ******************** ‌‌ कृष्ण जी के जीवनकाल में एक घटना घटी। नरकासुर नामक राक्षस ने १६ हजार स्त्रियों का अपहरण करके अपने महल में बंदी बनाकर रखा था। उसे कृष्ण जी ने नरकासुर को मार कर उन स्त्रियों को मुक्त कर दिया। इतने वर्षों तक राक्षस के यहां रहने के बाद उन्हें कौन स्वीकार करेगा, यह सोचकर सभी नदी में डूबकर जीवन समाप्त करने के लिए चल पड़ी। कृष्ण जी के पूछने पर उन्होंने अपने मन‌ की बात उन्हें बताई। इसपर भगवान श्रीकृष्ण जी ने उन्हें जीवन त्याग करने से रोका तथा कहा कि आप सबको मैं आश्रय दूंगा, आप मेरे साथ रहेंगी। कृष्ण जी तो बहुत सक्षम थे, उन सबके रहने के लिए महल बनवाकर उन्हें सुरक्षा प्रदान की। कृष्ण जी उस समय के सर्वाधिक शक्तिशाली राजा थे, उनकी सुरक्षा के घेरे में आने का किसी में साहस नहीं था। इस प्रकार वो भगवान की आश्रिता थीं, संरक्षण में थीं...
मैं बदल रहा हूं …
कविता

मैं बदल रहा हूं …

खुमान सिंह भाट रमतरा, बालोद, (छत्तीसगढ़) ******************** मेरे जाने या अंजाने में कोई गलतियां गर हुआ है उसका अफसोस है मैं उन गलतियों से बहुत कुछ सीख रहा हूं मैं हरदम परेशानी का कारण हुआ करता था अब ये गलतियां न हो पाये दोबारा इसका बेहतर विकल्प ढूंढ रहा हूं लाख आये राह में कांटे उन कांटों में भी सुंदर फूल ढूंढ रहा हूं जिम्मेदारी के बंधन में बंध जाऊ इस कदर कि मेरे अपने भी कभी न हो पाए तर-बतर मेरे उन सारी हरकतों को अब विराम कर रहा हूं दुनिया में इस प्रेम से बंधे रिश्ते का जो हमें दर्जा दिऐ हो मैं उसे बेहतर ढंग से निभा सकूं अब उसका मैं सूत्र ढूंढ रहा हूं मैं बदल रहा हूं ... परिचय :- खुमान सिंह भाट पिता : श्री पुनित राम भाट निवासी : ग्राम- रमतरा, जिला- बालोद, (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलि...
बदलते मौसम
कविता

बदलते मौसम

डॉ. कांता मीना जयपुर (राजस्थान) ******************** बदलते मौसम का हाल ही कुछ ऐसा है। सवाल हर बार नए से है। जवाबों का हाल ही कुछ ऐसा है। नन्ही चिरैया की चोच से गिर पड़ा है, तिनका फिर से, घरौंदे बनाने का भार ही कुछ ऐसा है। शाम को ढल जाने की फुर्सत ही कहां है। राहगीर को घर जाने की जल्दी है। घर का ख्याल ही कुछ ऐसा है। आप ही आप छाए हो ज़हन में, आपका किरदार ही कुछ ऐसा है। कागज की कश्तियां बना रहा है। अल्हड़मन फिर से, पानी का बहाव ही भी कुछ ऐसा है। दस्तूर नए से हैं, इस शहर के। हर एक मोड़ का सूरत-ए-हाल ही कुछ ऐसा है। बदलते मौसम का हाल कुछ ऐसा है। सवाल हर बार नए से हैं। जवाबों का हाल ही कुछ ऐसा है। परिचय :- डॉ. कांता मीना (शिक्षाविद् एवं साहित्यकार) निवासी : जयपुर (राजस्थान) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी ...
प्रभु नाम महिमा
भजन

प्रभु नाम महिमा

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** मेरे प्रेम को मान इतना दिया प्रभु, कि मैं स्वयं को भूलता जा रहा हूं। तुम स्वामी हो मेरे, मैं सेवक तुम्हारा, इसी भाव को पोस्ता जा रहा हूं। मेरे प्रेम को ... तुम्ही ने लिखाई है, प्रभु नाम महिमा, तुम्ही ने कहा "प्रेम" भक्ति में बह जा। तेरे मार्गदर्शन में कुछ पग बढ़ाए, तो मैं राम जी की कृपा पा रहा हूं। मेरे प्रेम को ... तुम हर पल रमें हो प्रभु नाम जप में, सभी को बताते हो, बस युक्ति है ये। जिसे भा गई युक्ति, और रम गया जो, वो कलयुग में भी मुक्ति ही पा रहा यूं। मेरे प्रेम को ... प्रभु नाम महिमा को जो भक्त गाते, वे हर मंच पर हैं, बहुत मान पाते। तेरे गीत गायक का साधन हैं बनते, इसी प्रेरणा से लिखे जा रहा हूं। मेरे प्रेम को ... तुम्ही नाम महिमा के सर्वज्ञ ज्ञाता, जो हो पूर्ण अर्पित वो "मानस" लिखवाता। प्रभु नाम...
खामोशी सब कुछ कहती है
कविता

खामोशी सब कुछ कहती है

अंजनी कुमार चतुर्वेदी "श्रीकांत" निवाड़ी (मध्य प्रदेश) ******************** बिन बोले मन की सब बातें, खामोशी कह देती। लंबे वक्त रहे खामोशी, प्राण हरण कर लेती। गलत बात को मन में रखकर, स्वतः मौन हो जाना। धीरे-धीरे खामोशी में, बिना वजह खो जाना। कभी जिंदगी में खामोशी, अजब रंग भरती है। पास बुलाती कभी किसी को, कभी दूर करती है। खामोशी के पल जीवन में, कभी रंग लाते हैं। कभी-कभी खामोशी के क्षण, सहे नहीं जाते हैं। समझदार खामोशी लख कर, सावधान हो जाते। क्यों ओढ़ी खामोशी उसका, कारण पता लगाते? मन विरुद्ध जब कुछ भी होता, रोक नहीं हम पाते। खामोशी छा जाती मन पर, शब्दहीन हो जाते। खामोशी सब कुछ कह देती, जो सुविज्ञ वह जाने। बिना कहे जो बात समझ ले, गुणी उसी को माने। बहुत बोलती है खामोशी, जाने क्या-क्या कहती? खामोशी भी अपने भीतर, दर्द छुपाये रहती। परिचय :- अंज...
विमाता (कैकेयी)
कविता

विमाता (कैकेयी)

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** विधाता के संदेश को जानती थीं नियति थी ये भी ज्ञात था ! अवांछनीय कर दी जायेंगी ममता की परिभाषा से विमुख कर दी जाएंगी! मातृत्व प्रेम से नहीं अपितु कुमाता रूप मे जानी जाएंगी! उन्हें दुत्कारा जाएगा तमाम दोषारोपण लगाए जाएंगे, राज काज से बेदखल कर दी जायेंगी! आत्मविश्वास की धनी, कर्तव्य पर अडिग, ममता की मूरत थीं, कुशल योद्धा, उत्कृष्ट राजनीतिज्ञ थीं!! दो वाचनों का वरदान ले जिद पर अडी, राम को मर्यादापुरुषोत्तम श्री राम बना गईं!! नारायण के पुनीत कार्य का आरम्भ बनीं, युगपत में व्याप्त घोर असंतोष का अंत कर रामराज्य लाने का स्त्रोत बनीं! राम के वनवास का कारक बनीं सम्पूर्ण जगत को राम नाम का बीज मंत्र दे गईं! अधर्म पर धर्म की विजय हो स्वयं का जीवन प्राण विहीन बना गईं!! कितने क...
पत्थर हुआ इंसान
कविता

पत्थर हुआ इंसान

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** आजकल इंसान नही रहा इंसान । हो गया है पत्थर समान। ******* प्रत्येक इंसान अपनी दुनियां में खो गया है। इसलिये शायद भावना शून्य हो गया है। ****** समाज में होनी वाली घटना का उस पर कोई असर नहीं होता है। वह तो केवल अपनी मस्ती में मस्त होता है। ****** चाहे हो जाय हत्या चाहे हो जाय बलात्कार उसके कानों पर जूं नही रेंगती। उसको तो केवल अपनी पड़ी रहती हैं। ******* दया,करुणा और सहनुभूति आजकल इंसानों में नहीं मिलती इसलिये दुनियां में अब खुशहाली नही दिखती। ****** अब इंसानियत खो चुका है इंसान। इसलिये पत्थर दिल हुआ है इंसान। ******* परिचय : डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" निवासी : चिनार-२ ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी घोषणा : मैं यह शपथ पूर्वक घोषणा करता हूँ कि उपरोक्त रचना पूर्णतः मौलिक है। ...
जमीर
कविता

जमीर

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** मानव सभी प्राणियों में श्रेष्ठ माना गया है, पर उनका वो हिस्सा जहां दया होता है, जहां करुणा पाया जाता है, जो अच्छे बुरे का अनुभव करता है, जहां नैतिकता को धरता है, लाख मुसीबतें आने पर नहीं बिखरता है, जहां प्राणी मात्र के लिए प्यार होता है, सोच समझ कर आपा नहीं खोता है, जहां से सहयोग की भावनाएं निकलती है, जब मर जाती है, तब जाति, धर्म, सम्प्रदाय, ऊंच नीच की भावना, सिर्फ पाने की कामना, दूसरों से उच्च होने का घमंड, नफरत लिए हुए प्रचंड, चिकनी चुपड़ी बातों से छलने की काया, लाखों वसूल कर बताए सब कुछ है मोहमाया, तब समझिये उसे जिंदा लाश, अंदर से हो चुका है बदहवाश, कितनों भी हो वो अमीर, निश्चित ही मर चुका है उनका जमीर ... परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोष...
सीढ़ी
कविता

सीढ़ी

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** सीढ़ी पर चढ़कर ढूंढ़ता हूँ बादलों में छुपे चाँद को पकड़ना चाहता हूँ चंदा मामा को बचपन में दिलों दिमाग में समाया था। लोरियों, कहानियों में रचा बसा था माँ से पूछा की चंदा मामा अपने घर कब आएंगे ये तो बस तारों के संग ही रहते है ये स्कूल भी जाते या नहीं अमावस्या को इनके स्कूल की छुट्टी होगी। तभी तो ये दिखते नहीं माँ ने आज खीर बनाई इसलिए मामा को खाने पर बुलाने के लिए सीढ़ियों पर चढ़ कर देखा मामा का घर तो बहुत दूर है। इसलिए माँ सच कहती थी चंदा मामा दूर के पोहे पकाए ..... बड़ा हो के रॉकेट से चन्द्रमा पर जाऊंगा जैसे गए थे निल आर्मस्ट्रांग तब माँ के हाथो की बनी खीर का न्यौता अवश्य दूंगा। परिचय : संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता : श्री शांतीलालजी वर्मा जन्म तिथि : २ मई १९६२ (उज्जैन) शिक्षा : आय टी आय निवासी...
बेटियां
कविता

बेटियां

गोविन्द सरावत मीणा "गोविमी" बमोरी, गुना (मध्यप्रदेश) ******************** जमीं-ओ-आस्मां का प्यार हैं, बेटियां, चांद-ओ-सूरज का निखार हैं, बेटियां ! कण-कण में व्यापत सांसों का दिगंत, करती रहती सतत विस्तार हैं, बेटियां !! सुख-ओ-दुःख की साथी हैं, बेटियां, योग-ओ-वियोग भी पाती हैं, बेटियां ! जन्म से मृत्योपरान्त हैं अनेक रूप, भार्या-बहिन ओ माँ कहाती हैं, बेटियां !! अपने-ओ-पराये की प्रिय हैं, बेटियां घर-आंगन की लाज व दिये हैं, बेटियां ! जाती जब लांघकर एक देहरी से दूजी बाबुल की दुआओं को जिए हैं, बेटियां !! सीता-ओ-राधा-सी निर्मल हैं, बेटियां, अनुसूइया, सावित्री-सी प्रबल हैं, बेटियां ! कूद पड़े रणभूमि में, बनके दुर्गा-काली, मीरा, संवरी-सी उज्जवल हैं, बेटियां !! युगों-युगों से सृष्टि का श्रृंगार हैं, बेटियां, धरती की हर हलचल-झंकार हैं, बेटियां ! मिट जाएगा भूमंडल, ब...
बिलख रहे रस अलंकार हैं
गीत

बिलख रहे रस अलंकार हैं

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** बिलख रहे रस अलंकार हैं, चुप है छंद तरंग। रहे उदासी गीतों पर भी, न ग़ज़लों में उमंग।। नवगीतों का दौर चला बस, उसकी है भरमार। नव बिंबों में खोया जीवन, होती है तकरार।। कौन पहेली बूझे इसकी, बदले सभी प्रसंग। रोज़ तंज़ बस रिश्तों पर, महँगाई का नाम। नव चिंतन नव संप्रेषण भी, चले मुक्ति संग्राम।। नई सदी की नई विधा यह, नवल रूप नव रंग। भावों में भी जोश अनोखा, पैनी कटार ओज। जन-जन मोहित रचनाओं पर, करें सत्य की खोज।। डाले रुढ़ियों पर नकेल भी, करता अद्भुत जंग। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सुमित्रा पाठक पिता : स्व. हरि मोहन पाठक पुत्र : सौरभ भट्ट पुत्र वधू : डॉ. प्रीति भट्ट पौत्री : निहिरा, नैनिका सम्प्रति : सेवानिवृत्...
कुरुक्षेत्र में
कविता

कुरुक्षेत्र में

माधवी तारे लंदन ******************** अब की बार चुनावी कुरुक्षेत्र में चाकू, खंजर, तीर, तलवार खूब लड़ रहे थे आपस में कौन ज्यादा गहरा जख्म दे शब्द पीछे बैठे मुस्कुरा रहे थे जिव्हा की लेकर तेज तलवार आई थी महिलाएं भी मंच पर चतुरतर पद की गरिमा भूलकर अपनी वाणी की कला दिखाने और शब्द पीछे बैठे मुस्कुरा रहे थे कुछ सत्तांधों ने एक होकर किया भ्रमण था देश भर सिंहासन की चाह पकड़कर झूठे वादों की वर्षा करने माहौल बिगाड़ने वाले मनोरुग्णो ने चपत मुंह की खाई आखिर सत्य पीछे बैठा मुस्कुरा रहा था... पूर्वकालीन कारनामों को होना था उजागर देश भर तभी तो रामलला ने तीसरी बार कर दिया मोदी जी का बेड़ा पार सनातनता जागृत हो पीछे मुस्कुरा रही थी पक्ष-विपक्ष तो हैं लोकतंत्र की दो सुदृढ़ बाहें वैचारिक मेल-मिलाप से देश को उन्नति के पथ पर लाए फिर क्यों प्रथमग्रासे मक्षिका पतन करने उतावले...