मातृशक्ति
किरण पोरवाल
सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश)
********************
"रोज ही मातृ दिवस मनाओ,
झुझती वह हर रोज है,
हर पल पग-पग देती परीक्षा,
कभी माँ बन कभी सासु वो"
कितनी भी रणचंडी बन ले,
प्रेम झलकता आंखों में,
कभी हाथों में तलवार है उसके,
कभी हाथों में बेटा है।
कभी घोड़े पर असवार है होती,
कभी घोड़ा बन जाती वो,
कभी रक्त से तलवार है धोती,
कभी कलम चलाती वो।
कभी सिंहासन राज है करती,
कभी वन वन में डोले वो,
कभी बेटे का बलिदान है करती,
कभी पन्नाधाय बन जाती वो।
एक आंख में आंसू उसके,
एक में प्रेम झलकाती वो ,
एक पल में रोना है उसका,
एक पल में हंस जाती वो।
कितना त्याग बलिदान है उसका,
कभी चण्डी कभी दुर्गा वो,
कभी जनक दुलारी सीता बनती,
कभी वन देवी बन जाती वो।
कभी हल से वह पैदा होती,
कभी-कभी अग्नि परीक्षा देती वो,
कभी धरती फट समा वह जाती,
वह भारत की बेटी जो।
...

















