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व्यंग्य

महिला उत्थान कार्यक्रम
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महिला उत्थान कार्यक्रम

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** यहाँ एक ठरकी महाशय की महागाथा प्रस्तुत है, जिनकी ठरक किसी मनचले तूफान की तरह है कब, कहाँ, किसे उड़ा ले जाए, इसका कोई भरोसा नहीं। वैसे तो ये सरकारी नौकरी में हैं, लेकिन इन्हें लगता है कि समाज के इस आधे तबके के प्रति भी इनका दायित्व बनता है- जैसे भी, जहां भी, जितना भी बन पड़े… महिला उत्थान करना अनिवार्य है! तो ये खुद को "महिला सशक्तिकरण" का स्वयंभू मसीहा मान बैठे हैं। इनका दर्शन बड़ा स्पष्ट है जितनी अधिक महिलाओं का "उत्थान" करेंगे, उतनी ही अधिक इनकी आत्मा को तृप्ति मिलेगी। यूँ तो शादी-शुदा हैं, लेकिन सिर्फ घर की मुर्गी का ही उत्थान करें इस वहम से कोसों दूर हैं। इनका ध्येय वाक्य है- शादी-वादी सब ढकोसला है, असली मकसद तो महिलाओं के उद्धार में जीवन अर्पित करना है! महिला दिवस नज़दीक आते ही इन्...
सतरंगी दुनिया-१८
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सतरंगी दुनिया-१८

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** ईमानदारी का महत्व इसी बात से समझ में आता है, कि जो व्यक्ति स्वयं गलत काम करता है, परंतु अपने नौकर से ईमानदारी की अपेक्षा करता है। वफादार सभी कोई चाहते हैं, परन्तु स्वयं कोई बनता नहीं चाहता। *हमारे देश में सरकारी अस्पताल का मतलब है- जान से हाथ धोना, और प्राईवेट अस्पताल का मतलब है-जायदाद से हाथ धोना, इसलिए समझदार बनिए और अपनी सेहत का ध्यान रखिए, ताकि आपको अस्पताल के चक्कर काटने पड़ें।* जो दूसरों को इज्जत देता होता है, असल में वो इज्जतदार होता है, क्योंकि इंसान दूसरों को वही दे पाता है, जो उसके पास होता है। *एक बात समझ से परे है कि 2 अक्टूबर गांधी जयंती पर शराब के ठेके बंद रहते हैं और ३० जनवरी गांधी जी की मृत्यु के दिन शराब के ठेके खुले रहते हैं।* रुद्राक्ष हो या इंसान, एकमुखी बहुत कम ही मिलते हैं। उपदेश और सलाह हमारे ...
इलाज का टेंडर
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इलाज का टेंडर

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** "डॉक्टर साहब, आप तो ये बताओ, इलाज में कुल खर्चा कितना बैठेगा?" मरीज़ एक्सीडेंट का है। जाहिर है, मरीज़ के सभी अटेंडेंट डील ब्रेकर बनकर आए हैं। इनमें असली घरवाले कौन हैं, यह पता लगाना मुश्किल है। भीड़ देखकर लगता है कि मामला एक्सीडेंट का है और एक्सीडेंट करने वाले को पकड़ लिया गया है। मरीज़ को अस्पताल के हवाले कर दिया गया है, और बाहर एक्सीडेंट करने वाले का गिरेबान पकड़कर गालियां दी जा ही हैं, धमकाया जा रहा है। पुलिस केस की धमकी से जितना ऐंठ सकते हैं, उतना ऐंठने की कोशिश में लोग लगे हुए हैं। इस बीच, कुछ ऐसे मामलों के दलाल, जो इस मौके का निवाला खाने के आदी होते हैं, तुरंत सूंघकर आ जाते हैं। ये वो लोग होते हैं जो दोनों पार्टियों से अपनी जान पहचान बना लेते हैं। कुछ वकील, जिनकी रोज़ी-रोटी ऐसे ह...
सरसों के चेपे और मेरी पीली टी-शर्ट
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सरसों के चेपे और मेरी पीली टी-शर्ट

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आज मौसम ने जाने किस ज्योतिषीय गणना के बाद यह तय किया कि अब ठिठुरन को रिटायरमेंट दे देना चाहिए। सुबह की धूप में वह पुरानी खीझ नहीं थी, जो हड्डियों में उतरकर ऑर्थोपेडिक चेतना को भी कंपा दे। आज की धूप में वसंती उष्णता थी- हल्की, लुभावनी, आत्मविश्वासी। जैसे बसंत ऋतु ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर घोषणा कर दी हो- “मैं आ चुकी हूँ, कृपया पीला परिधान धारण करें।” वसंती स्वर्णिम रंग ने मुझे भी अपने प्रभाव में ले लिया। अलमारी खोली तो महीनों से अंदर-बाहर होती, मौसम विभाग की अनिश्चितताओं की शिकार, एक आग्नेय वर्ण की पीली टी-शर्ट कोने से झाँकती मिली। वह मुझे देख रही थी- थोड़ी उम्मीद, थोड़ी शिकायत भरे लहजे के साथ। जैसे कह रही हो- “कब तक मुझे सिर्फ बसंत पंचमी की प्रतीक्षा में रखोगे? मैं भी सार्वजनिक जीवन चाहती...
बधाई हो… शर्मा जी अंकल बन गए
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बधाई हो… शर्मा जी अंकल बन गए

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** बधाई हो... शर्मा जी आख़िरकार अंकल बन ही गए। मोहल्ले में आज यही बड़ी खबर है। कल ही गली में खेलती एक बच्ची ने मुस्कराकर उन्हें पुकारा “अंकल!” और शर्मा जी के जीवन में उम्र का यह प्रमोशन स्थायी रूप से दर्ज हो गया। यह बात जैसे ही उनकी पत्नी तक पहुँची, वह हँसते-हँसते दोहरी हो गईं। बोलीं- “मैं तो कब से कह रही हूँ कि आपकी उम्र ‘भैया’ वाली नहीं रही, पर आप ही मानते नहीं।” शर्मा जी ने दर्पण में खुद को देखने की कोशिश की वही रंगी हुई मूँछें, गहरे श्याम रंग की डाई से रंजित बालों की अंतिम बस्ती खुले दालान के किनारे बसी हुई। मगर सच्चाई यह कि जवानी के रंग-रोगन का असर अब शरीर की दीवारों पर नहीं टिकता। समय अपने हस्ताक्षर छोड़ ही देता है। उन्होंने जवानी को बचाए रखने के क्या-क्या जतन नहीं किए विदेशी डाई, घ...
सतरंगी दुनिया- १७
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सतरंगी दुनिया- १७

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** आपका भव्य महल हो या छोटी-सी झोपड़ी, घर उसी को कहते हैं जहां शांति और सुकून मिले। *यदि आप खुश रहना चाहते हैं तो दूसरों के जीवन में अपनी जगह ढूंढना बंद कर दो।* हमें अपनी ज़िंदगी का आनंद अपने तरीके से लेना चाहिए, लोगों की खुशी के चक्कर में तो शेर को भी सर्कस में नाचना पड़ता है। स्टेटस ज़िंदगी का हो या मोबाईल का, स्टेटस ऐसा रखें कि लोग कॉपी करने पर मजबूर हो जाएँ। जब बुरा करने के बाद भी बुरा ना लगे तो समझना चाहिए कि बुराई अब हमारे चरित्र में आ गई है। आज तो मेरा तकिया और बिस्तर भी बोल पड़ा, "मालिक थोड़ा उठकर बैठ जाओ या छत पर घूम लो, हमें भी थोड़ा साँस लेने दो। एक नगर सेठ के यहाँ इन्कमटैक्स का छापा पड़ा। सारे खातों की जांच हुई। एक जगह सेठ ने लिख रखा था कि पाँच लाख की जलेबियाँ कुत्तों को खिलाई। इन्कम टैक्स वालों ने इस खर्च के लिए...
मीटर टेप के साये में – दो पहाड़ों का संवाद
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मीटर टेप के साये में – दो पहाड़ों का संवाद

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** दो पहाड़ एक बड़का भैया, एक छुटका भैया बरसों से बगल-बगल खड़े थे। एक ही माँ, पृथ्वी, की संतान, क़द-काठी में फर्क, पर दायित्व में बराबरी। दोनों ने ही धरती को थामे रखा, हरियाली की चादर ओढ़ाए रखी। मगर इंसान की आदतें कहाँ बदलती हैं। उसने छुटके के कान भरने शुरू किए- तेरी जगह अब यहाँ नहीं; तुझे जान-बूझकर छोटा रखा गया; असली बेटा तो बड़का है। चल, तुझे शहर ले चलते हैं वहाँ नाम बदलेगा, पहचान बनेगी। छुटका बातों में आ गया। उसे भरोसा दिलाया गया कि “पहाड़” नाम का कलंक हटेगा। कहा गया तू नव-निर्माण की नींव है; तेरे ऊपर इमारतें उठेंगी; तू काम आएगा। पहली बार उसे लगा कि खड़ा रहना नहीं, उपयोगी होना ज़रूरी है। “बड़के भैया… सुना है हम दोनों का बिछोह होने वाला है,” छुटका चुप्पी तोड़ता है। आवाज़ में उत्सुकता है...
हुक्का-वार्ता
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हुक्का-वार्ता

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** चौपाल पर दो हुक्के पड़े थे। दोनों पुराने थे इतने पुराने कि इतिहास उन्हें पहचानता था, पर वर्तमान उनसे कतराता था। एक की चिलम में बीते ज़माने की राख जमी थी, दूसरे की नली में राजनीति की नमी। हवा ठंडी थी, पर माहौल में गरमाहट थी वो गरमाहट जो सिर्फ जाति और सत्ता के मेल से पैदा होती है। हुक्का नंबर एक ने गला साफ़ किया- “सुना है भाई, सरकार फिर से लोगों को उनकी जाति याद दिलाने में लगी है।” हुक्का नंबर दो ने गुड़गुड़ाहट भरी- “तो इसमें नई बात क्या है? भूल गए थे क्या लोग?” हुक्का नंबर एक भावुक हो उठा- “हाँ यार, लगता है हमारे दिन फिरेंगे। एक ज़माना था जब हमारी कितनी पूछ थी! हर जाति का अलग हुक्का, अलग शान। ऊँची जात वालों के हुक्के तो जैसे राजमहल की शोभा मीनाकारी, फुँदे, चाँदी की नली। जमींदार जब म...
सतरंगी दुनिया- १६
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सतरंगी दुनिया- १६

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  आप गलती करके सुन रहे हैं तो आप ऑफिस में हैं, और अगर आप बिना गलती के सुन रहे हैं तो आप निश्चय ही घर पर हैं। दुनिया की हर चीज ठोकर लगने से टूट जाती है, लेकिन कामयाबी एक ऐसी चीज है जो कि ठोकर खाकर ही मिलती है। गरीब मांगे तो भीख, अमीर मांगे तो चंदा, करोड़पति मांगे तो डोनेशन और अरबपति मांगे तो सब्सिडी। यहाँ सभी लोग अपने हिसाब से भीख मांगते हैं। मुहुर्त के चक्कर में मत पड़िए, बिना मुहुर्त के पैदा होकर जीवनभर 'शुभ मुहुर्त' के चक्कर में फंसा इंसान एक दिन बिना मुहुर्त के प्राण त्याग देता है। पुरूष की आदत होती है हमेशा महिलाओं के बीच घुसने की, इसलिए शायद 'फीमेल' शब्द में 'मेल' आता है और 'वुमेन' में 'मेन' आता है। झूठ बोलने से पाप लगता है और सच बोलने से आग। अब आप ही बताइए, आप क्या बोलेंगे ? जिसका कोई नहीं होता, उसका खुदा होता ह...
खेल शुरू बजाओ ताली, खेल ख़त्म बजाओ ताली
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खेल शुरू बजाओ ताली, खेल ख़त्म बजाओ ताली

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** एक कवि सम्मेलन में हमें आगे की पंक्ति में बैठा दिया गया। यह आयोजकों की कृपा कम और हमारी जुगाड़-साधना का प्रतिफल अधिक था। वीआईपी दीर्घा का टिकट हमने कबाड़ से खोज निकाला था, पर मंच पर बैठे कवि महोदय ने हमारे भीतर का सारा वीआईपी-पन झाड़कर बाहर कर दिया। इतनी तालियाँ बजवाई गईं कि क्षण भर को आत्मा कांप उठी कहीं पिछले जन्म में हम पेशेवर तालीबाज़ तो नहीं थे? फिर सांत्वना मिली नहीं, वीआईपी दीर्घा में वही बैठ सकता है जो समय-असमय ताली बजाने में पारंगत हो। मन में यह भी संतोष रहा कि यदि इस जन्म में ठीक से तालियाँ बजा दीं, तो शायद अगले जन्म में घर-घर ताले बजाने वाली योनि में जन्म न लेना पड़े। कवि ने इशारों-इशारों में यह आश्वासन भी दिया था। नेता और कवि में एक अद्भुत समानता है दोनों तालियों के भूखे होते...
तांत्रिक चौराहा
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तांत्रिक चौराहा

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** “ज़रा बचकर चलो… कितनी बार कहा है, चौराहे के बीच से मत जाया करो!” यह वाक्य मेरे कानों में हर सुबह वैसे ही पड़ता है, जैसे अलार्म बस फर्क इतना है कि अलार्म बंद किया जा सकता है, श्रीमती जी को नहीं। मॉर्निंग वॉक पर आगे-आगे मैं और पीछे-पीछे चौकन्नी निगाहों से मेरी चाल पर नज़र रखती हुई श्रीमती जी मानो मैं किसी आतंकी संदिग्ध गतिविधि से घिरा हुआ हूँ। हमारी वॉकिंग रोड के बीचोंबीच एक चौराहा है। नगर पालिका ने उसका कोई नाम नहीं रखा, इसलिए हमने रख दिया “तांत्रिक चौराहा”। शहर के तमाम भूत-प्रेत, बाधाएँ, टोटके, यंत्र-तंत्र और अतृप्त आत्माएँ यहीं आकर लोकतांत्रिक ढंग से डंप की जाती हैं। जैसे रेलवे कॉलोनी को जनता ने अनधिकृत रूप से मॉर्निंग वॉक ट्रैक बना लिया, वैसे ही इस चौराहे को तांत्रिकों ने अधिकृत कर्मस्...
खेद है – एक राष्ट्रीय भावना का आधुनिक संस्करण
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खेद है – एक राष्ट्रीय भावना का आधुनिक संस्करण

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** बड़े खेद की बात है कि इस संसार में दो ही चीज़ें सर्वत्र उपलब्ध हैं सड़कों पर खुदा और लोगों की ज़ुबान पर खेद। आजकल खेद बड़े ठसक के साथ प्रकट किया जा रहा है। जहाँ देखो, वहीं खेद। ट्रेन लेट हो जाए तो खेद, ट्रेन रद्द हो जाए तो गहरा खेद, और अगर समय पर आ जाए तो भी एहतियातन खेद क्योंकि इतनी चमत्कारी घटना पर शक होना स्वाभाविक है। रेलवे विभाग तो तब तक आपको डिब्बे में बैठने ही नहीं देता, जब तक सौ बार खेद प्रकट न कर ले। यात्री को भरोसा दिलाना ज़रूरी है कि लापरवाही हुई है, पर भावना सच्ची है। सोशल मीडिया ने खेद को लोकतांत्रिक बना दिया है। पहले खेद करने के लिए घटना चाहिए थी, अब बस नेटवर्क चाहिए। कोरोना काल में तो खेद की ऐसी बाढ़ आई कि कोई अगर गलती से मुस्कुराता हुआ फोटो डाल दे, तो लोग टिप्पणी में RIP ...
लेखकों की पिकनिक
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लेखकों की पिकनिक

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** इस बार पुस्तक मेले में किताबों की नहीं, लेखकों की पिकनिक तय हुई। निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया प्रगतिशील, प्रगतिवादी, प्रतिक्रियावादी, विवादप्रिय, सर्ववादी और सर्वनाशवादी सभी लेखक संघों ने मिलकर ठाना कि जब साल भर साहित्य में एक-दूसरे को स्वाद चखाते ही रहते हैं, तो क्यों न एक दिन सचमुच स्वाद खुद भी चखा जाए। अध्यक्षता का भार स्वाभाविक रूप से परम श्रद्धेय परसादी लाल जी ‘जुगाड़ी’ को सौंपा गया जो एक साथ परजीवी, बहुजीवी, बुद्धिजीवी, आलोचक, समीक्षक और विमोचक हैं। पहले उन्होंने अपनी मरणासन्न व्यस्तता का हवाला देकर आने से इनकार किया, पर प्रथम श्रेणी यात्रा-भत्ते की अग्रिम राशि ने उनमें तुरंत साहित्यिक प्राण फूँक दिए। नियम तय हुआ हर लेखक घर से बना खाना लाएगा। खुद न बना सके तो किसी और का उठा लाए, ...
वर्ष २०२६ में बारह राशियों का हास्यफल (राशिफल)
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वर्ष २०२६ में बारह राशियों का हास्यफल (राशिफल)

आशीष तिवारी "निर्मल" रीवा मध्यप्रदेश ******************** मेष राशि : हर साल की तरह २०२६ भी तुम से मजे ही लेकर जाएगा...अमीर बनने का सपना तुम्हारा केवल सपना ही रह जाएगा। तुम बस आमिर खान की फिल्में देखो, आमिर खान भी इसी लिए फ्लॉप हो रहा है क्योंकि तुम्हारे जैसे पनौती दर्शक हैं उसके ....प्रेम संबंधों के मामलो में लकी रहोगे कोई रुचि ही नहीं लेगी तो ब्रेकअप का भी दूर दूर तक आसार नहीं है...खैर तुम्हारी वाली ऐसा होने भी नहीं देगी....सबको तुम्हारी बहन बना देगी....स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहना, शनि की तीसरी दृष्टि के कारण किसी कन्या पर दृष्टिपात करते हुए धरे पकड़े जाओगे और बुरी तरह जुतियाए भी जा सकते हो.!! वृषभ राशि : जैसी राशि वैसे ही बैल जैसी पर्सनालिटी है और बुद्धि भी। कर्म करने जाते हो और कांड करके आते हो। अच्छा बनने के प्रयास में हमेशा गोबर कर आते हो...आर्थिक स्थिति में सुधार के आस...
कंजूस मक्खीचूस
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कंजूस मक्खीचूस

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** अख़बार में ख़बर आई कि एक अमीर महिला को “दुनिया की सबसे कंजूस करोड़पति” घोषित किया गया है। करोड़ों की मालकिन, मगर खाने-पीने पर खर्च जैसे उसकी जान निकल जाए। कंजूस शब्द का अर्थ तो सब जानते हैं, पर कंजूसी का दर्शन वही समझे जिसने ऐसे जीवों को पास से देखा हो। मानो इनके डीएनए में ही ‘सेविंग’ का जीन बैठा हो। कंजूस लोग धन को संग्रह करते हैं, उपभोग नहीं। मगर यह भी कहना होगा कि ये लुटेरों और सूदखोरों से फिर भी भले हैं- क्योंकि कम से कम किसी का लूट नहीं करते, बस खुद को ही नहीं खिलाते। इनका आदर्श वाक्य है- “चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए।” गाँव में हमारे एक मास्टर साहब थे, जिनकी कोई संतान नहीं थी। अमीरी ऐसी कि सूद पर सोना गिरवी रखते, पर मिठाई सिर्फ़ दिवाली पर। एक किलो इमरती सालभर के लिए पर्याप्त। जैसे ही ...
लोकतंत्र का रक्षा-बंधन पर्व
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लोकतंत्र का रक्षा-बंधन पर्व

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** हमारे यहाँ त्योहारों के पीछे ज़रूर कोई कथा होती है- कभी देवता-पिशाच की लड़ाई, कभी रानी-पुत्र की करुणा। राखी की भी कई कथाएँ हैं, पर लोकतंत्र की एक कहानी ऐसी है जो इतिहास में दर्ज नहीं हुई- क्योंकि यह आज भी हर साल घट रही है। इसे कहते हैं- लोकतंत्र का रक्षा-बंधन। इस पावन पर्व की शुरुआत तब हुई जब स्वतंत्रता के बाद भ्रष्टाचार पहली बार अपनी शीतनिद्रा से बाहर निकला। जन्म तो इसका प्राचीन भारत में ही हो चुका था, पर तब यह एक दुबला-पतला, डरपोक-सा साँप का संपोला था। देवी-देवता, ऋषि-मुनि इसे कभी-कभार डाँटकर भगा देते। आज़ादी के बाद सत्ता के नए पालकों ने इसे देखा- काला, कलूटा, पर उपयोगी। बस, उठा लाए आस्तीन में। कालांतर में यह साँप अपने पालनहारों से भी ज़्यादा ताकतवर हो गया। पर भ्रष्टाचार अकेला नहीं थ...
शरीर की ओवरहॉलिंग का राष्ट्रीय पर्व : रविवार
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शरीर की ओवरहॉलिंग का राष्ट्रीय पर्व : रविवार

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** रविवार! वो दिन जब देश के बहुसंख्यक पुरुष अपने शरीर रूपी वाहन की सर्विसिंग, डेंटिंग-पेंटिंग और फेस एलाइनमेंट की कोशिश करते हैं- और फिर थककर वापस उसी पुराने स्टार्टिंग ट्रबल वाले मोड में लौट जाते हैं। सुबह शीशे में झाँका तो माथे पर दो-चार सफ़ेद बाल ऐसे अठखेलियाँ करते मिले, जैसे मोहल्ले की गली में खड़ी बाइक को किसी मनचले ने ‘की-की’ करते हुए खरोंच मार दी हो। कभी जिन बालों को नजर न लगे, इसलिए बचपन में काजल का टीका लगाया जाता था- अब वही बाल इसलिए सफ़ेद हो रहे हैं कि किसी की नजर पड़ ही  जाए! कभी अपने बालों पर करते थे नाज़, अपना रंग जमाए रहते थे महफ़िलों में- और आज वही बाल अपना रंग बदल रहे हैं! सच कहें तो अब यह काया नामक गाड़ी, आर.टी.ओ. की अयोग्य वाहनों की सूची में और ज़िन्दगी के खेल में “एक्स...
ट्रकों का दर्शनशास्त्र: सड़क का पहलवान और प्रेम का दार्शनिक
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ट्रकों का दर्शनशास्त्र: सड़क का पहलवान और प्रेम का दार्शनिक

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** ट्रक का मिज़ाज हमेशा से दबंग, मजबूत और थोड़ा अहंकारी किस्म का माना गया है- सड़क नुमा अखाड़े का पहलवान, जो अपने वज़न और रफ्तार से किसी भी बाधा को कुचलने की क्षमता रखता है। लेकिन कभी-कभी यही पहलवान आपको दिला चुराने वाला ठग सा भी लग सकता है-जब सड़क किनारे खड़ा किसी नववधू की तरह सोलह श्रृंगार किए मुस्कुराता है,तो अच्छे खासे आदमिया भी दिल पिघल नहीं मेरा मतलब दहल जाए। मेहंदी जैसे पैटर्न से रंगे दरवाज़े, झालरों से सजे शीशे, गोटों और कढ़ाईदार पेंटिंग से लिपटी देह, और पीछे लटकता नज़रबट्टू- मानो हर कोना कह रहा हो, “देखो मुझे… मगर प्यार से।” यह ट्रक नहीं मित्र, सड़क पर खड़ी चलती-फिरती अमूर्त कलाकृति है, और उसके पीछे लिखा वाक्य- “बुरी नज़र वाले तेरा मुँह काला”- उसकी सौंदर्य रक्षा का संस्कार है। यह बा...
काल के कपाल पर
व्यंग्य

काल के कपाल पर

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** कहते हैं, काल के कपाल पर पहले से ही हमारा भूत, वर्तमान और भविष्य अंकित होता है- हम बस वही जीते हैं जो ऊपर वाले ने लिख दिया है। पर कभी-कभी मन करता है कि इस ‘कॉस्मिक पांडुलिपि’ में एक-दो पंक्तियाँ अपनी मर्ज़ी की भी जोड़ दी जाएँ- कम-से-कम एक “फुटनोट” तो लेखक स्वयं भी लिख सके! मेरा मन तो बस इतना चाहता है कि जीवन के इस साहित्यिक कापी पर कहीं लिखा जाए- “यह लेखक किसी गुट का हिस्सा है।” क्योंकि बिना गुट के लेखक का हाल वैसा ही होता है जैसे गली में अकेली चलती अबला- हर किसी की नजर में ‘खतरा’। जबसे कहा है कि “मैं किसी गुट का नहीं”, तबसे मुझ पर शोध-प्रबंध शुरू हो गया है- कौन-से शब्दों से मेरी विचारधारा झलकती है, किस पंक्ति में कौन-सा खेमापन है। साहित्य में गुटबाज़ी आज मठों का नया धर्म है- जहाँ नए लेख...
एआई का झोला-छाप क्लिनिक
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एआई का झोला-छाप क्लिनिक

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** तकनीक गड़बड़झाला का एक झोल सामने आया है l अखबार में विज्ञापनों के मायाजाल में फंसी इस खबर पर नजर पडी l अख़बार में सुर्ख़ी बनी है - "ए आई नीम हकीमी..चैट जीपिटी से परामर्श लेकर खाने का नमक बदला ,खतरे में आई जान" ‘नीम हकीम खतरे जान’ अब महज़ नीम और हकीम के बीच का मामला नहीं रहा, क्योंकि चैट जीपिटी भी बाकायदा झोला-छाप डॉक्टरों की बिरादरी में शामिल हो चुका है। मरीजों का इलाज करते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया है। वो दिन दूर नहीं जब मोहल्लों की दीवारों पर रंगीन पोस्टर चिपके मिलेंगे- “दाद, खाज, खुजली, भगन्दर, पायरिया ,पीलिया,पथरी ,बवासीर, नपुंसकता, नामर्दी- चैट जीपिटी से पक्का इलाज, गारंटी सहित!” अख़बार खोलते ही पंपलेट झड़ पड़ेंगे- “आपके शहर में ही खुला है चैट जी पि टी के क्लिनिक की टापरी l पहुँचे हुए ...
अब ए.आई. भी आई बन सकती है!
व्यंग्य

अब ए.आई. भी आई बन सकती है!

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** सुबह अख़बार हाथ में लिया तो एक खबर ने मेरी चाय में डूबे हुए बिस्कुट को इतना शर्मिंदा किया की वो शर्म से गल कर डूब ही गया l खबर थी - "अब ए.आई. से पैदा होंगे बच्चे!" मतलब अब ‘प्यार में धोखा’ नहीं, सीधा ‘कोड की कोख में होगा गर्भधारण!’ कृत्रिम बुद्धि अब कृत्रिम बुद्धिपुत्र को जन्म देगी। इस दुनिया में हम क्यों आए... इसका कोई "नियर-टु-ट्रूथ" उत्तर हो सकता है तो यही कि शायद शादियाँ करने... और शादियाँ क्यों कराई जाती हैं? ताकि महिला ‘माँ’ यानी कि ‘आई’ बन सके। हमारे समाज में आज भी बिना ब्याही लड़की और बिना औलाद की स्त्री को अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता। शादी होते ही लड़के और लड़की दोनों के माँ-बाप इस आस में लग जाते हैं कि घर में किलकारियाँ गूंजें, बधाइयाँ गायी जाएँ। एक साल बीतते न बीते कि पडौसी ...
अंतिम दर्शन का दर्शन शास्त्र
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अंतिम दर्शन का दर्शन शास्त्र

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** जीवन क्या है- पानी का एक बुलबुला है, साहब! दिन-रात हम लगे रहते हैं- भागदौड़ में... निन्यानवे के फेर में... और कब ऊपर वाले का इशारा हो जाए, साहब, पता ही नहीं चलता। पाप-पुण्य की गठरी... भवसागर... मोक्ष... ऐसी मौत सभी को नसीब हो, साहब! माया, धन, समृद्धि, वैभव- नाम सब धरे रह जाते हैं, साहब। बस, कब ऊपर वाले का बुलावा आ जाए, कह नहीं सकते! साथ जाएगा तो राम-नाम ही, और आपके भले कर्म ही। भारतीय दर्शन शास्त्र अब कहीं बचा है, तो इसी क्षणिक वार्ता में, जो अक्सर किसी शवयात्रा में शामिल लोग अपने मुख से उच्चारित करते ही हैं। ये बातें प्रायः टाइमपास के लिए, मृतक के दुख में औपचारिक रूप से शामिल होने के प्रमाण के रूप में, और यह अपेक्षा लेकर कही जाती हैं कि जब हमारी बारी आए, तो हमारे बारे में भी लोग ऐसा ही ...
पर्दा है पर्दा
व्यंग्य

पर्दा है पर्दा

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** राजा अपने विशेष आरामगाह में आराम फरमा रहा था। विशेष इसलिए कि वह पहली बार इस आरामगाह में आया था। राजा को एक ही दुःख कचोटे जा रहा था- आज वह अकेला था। बार-बार उसे दरबारियों के साथ की गई गुप्त महफ़िलें याद आ रही थीं। राजा के दरबारी, जो उसके हर बुरे काम में साथ देते थे, आज पास में नहीं थे। कुछ तो बाहर ही छूट गए थे। राजा को मालूम था कि इस नए आरामगाह में एक दिन उसे भी आना होगा, इसलिए उसने पहले ही कुछ दरबारियों को वहाँ भिजवा दिया था। यह सोचकर कि जब वह यहाँ आएगा, तो कंपनी देने के लिए दरबारी मौजूद रहेंगे। राजा की यह भी माँग थी कि उसके हर बुरे काम में साथ देने वालों को अलग कक्ष में क्यों रखा जाए? उन्हें तो उसके शयन कक्ष में ही रखा जाना चाहिए। लेकिन किसी ने राजा की बात नहीं मानी। राजा चिल्लाता रहा,...
भगवान परीक्षा ले रहा है
व्यंग्य

भगवान परीक्षा ले रहा है

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** “धैर्य रखो, सब ठीक हो जाएगा। भगवान परीक्षा ले रहे हैं।“ बचपन से ही आप, मैं, सब सुनते आए हैं- यह रामबाण औषधि जैसे हर घाव पर बर्नॉल लगाने का काम करती है। चाहे घरवाले हों, रिश्तेदार, पड़ोसी, या राह चलते कोई अजनबी, हर कोई आपके घावों पर यह बर्नॉल लगाने को तैयार रहता है। अगर आप ज़्यादा ख़ुशनसीब हैं, तो राह चलता कोई भी यह बर्नोल चुपड़ता हुआ मिल जायेगा । मैं सोचता हूं, भगवान के पास और कोई काम नहीं है क्या? सिर्फ परीक्षा लेने का ही काम बचा है? भगवान ने इंसान बनाया, उसे पृथ्वी पर भेजा- ज़िंदगी जीने के लिए या सिर्फ प्रश्नपत्र हल करने के लिए? ज़िंदगी के बारे में कहते हैं, "ये जिन्दगी के मेले कभी ख़त्म न होंगे", लेकिन सच में तो ऐसा लगता है कि यहाँ कभी ख़त्म नहीं होंगे तो कये प्रश्नपत्रों की लड़ी । ये प्...
बाढ़ में डूबकर भी कैसे तरें
व्यंग्य

बाढ़ में डूबकर भी कैसे तरें

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** इधर बाढ़ आई और उधर सरकारी महकमों में, सखी, ऐसा उत्सव-सा माहौल बन पड़ा मानो बरसों से पेंडिंग मनौती की फाइल पर अफसर की चिडया बैठ गयी ! जैसे ही नदियाँ उफान पर आईं, वैसे ही कागज़ों में ‘हर घर नल-जल’ योजना बिना कोई पत्ता हिलाए ही पूर्ण घोषित हो गई। देखो तो जरा इन सरकारी नुमाइंदों को-नदी के उफान के साथ इनके चेहरे भी कैसे उल्लास से उफनने लगे हैं! बाढ़ इनके लिए मानो ‘मुँह माँगी मुराद’ बन गई हो, और जो अभागे सच में डूब गए, वे भी सरकारी आँकड़ों में तैरकर चमक बढ़ा रहे हैं। जो बचे, वे ‘राहत लाभार्थी’ कहलाए, और जो न डूबे, न बचे-वे चाय की चुस्कियों के साथ टीवी न्यूज़ चैनलों पर ‘बाढ़-आपदा विशेषज्ञ’ बन बैठे हैं। रहत कर्मचारियों को लगा दिया है काम पर..दूरबीन लगाये देख रहे है, हांक लगा रहे हैं..”तनिक हाथ-प...