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गद्य

पॉकेट मनी 
लघुकथा

पॉकेट मनी 

पॉकेट मनी  रचयिता : विजयसिंह चौहान मृद्धि कॉलेज क्या गई उसकी पॉकेटमनी दिन-ब- दिन छोटी पड़ने लगी, अत्यधिक  खर्च को लेकर मिथिलेश अक्सर टोकती रहती है । आज फिर समृद्धि ने उसके पापा से पॉकेट मनी बढ़ाने को लेकर 'दुलार' किया।  इस बार उसका तर्क था ....ग्रीष्म ऋतु है इसलिए कुछ ज्यादा पैसे दे देना। पिताजी ने भीआंखों ही आँखों मे नजरें घुमाई और सोचा की गाड़ी का पेट्रोल फुल टैंक है, मोबाइल का रिचार्ज भी है, ड्रेसेस तो कल परसों ही खरीद लाई थी । खैर.... बिटिया ने कहा है, तो पिताजी ने भी हा कर दी। पॉकेट मनी पाकर समृद्धि चहक रही थी, वही मिथिलेश बड़बड़ा रही थी ....बेटी को ज्यादा पैसे मत दिया करो, कुछ कंट्रोल रखो, नहीं तो नाम  निकालेगी। शाम को जब पिताजी घर लौटे तो घर के कोने में कुछ मिट्टी के सकोरे और अनाज का थैला देख उत्सुकतावश पूछा कि यह क्या है ? ...तभी मिथिलेश ने मुस्कुरा कर कहा बेटी आज अपनी पॉके...