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कहानी

चुहिया और बुढ़िया
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चुहिया और बुढ़िया

=============================== रचयिता : विनोद वर्मा "आज़ाद" एक बुढ़िया कचरा जलाकर खाना बना रही थी, एक चुहिया उधर से गुजरी, देखकर बुढ़िया से बोली-का हम लकड़ी लाय दे तुमको। बुढ़िया ने कहा-लाय दो । चुहिया दौड़ी-दौड़ी गई और लकड़ी लाकर बुढ़िया को दे दी। बुढ़िया रोटी उतार रही थी, ठीक उसी वक्त चुहिया रोटी पर उछलकूद करने लगी । बुढ़िया बोली--ए चुहिया ये का कर रही। चुहिया बोली--मैं डांग गई, डांग से मैं लकड़ी लई, लकड़ी मैंने तोए दय। का एक चंदिया भी नय देगी? बुढ़िया --ले जा । चुहिया चंदिया लेकर जा रही थी, उसकी निगाह एक कुम्हार पर पड़ी जी बच्चे को मिट्टी की गोली दे रहा था। चुहिया --ए भाई तेरे को चंदिया दूँ। वह तुरन्त बोल उठा--हाँ-हाँ.. चुहिया ने चंदिया कुम्हार को दी और उसकी मटकियों पर उछलकूद करने लगी। कुम्हार बोला--ए चुहिया! ये का कर रही? चुहिया --मैं डांग गई, डांग से मैं लकड़ी लई, लकड़ी मैंने...
पागल – कहानी
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पागल – कहानी

रचयिता : जितेंद्र शिवहरे =============================== पागल स्मिता और उसकी सहेली निशा आज हाॅस्पीटल की ड्यूटी पूरी कर शहर के मेघदूत उपवन में कुछ पल सुस्ताने आई थी। सायं चार-पांच बजे का वक्त हो रहा था। दोनों सहेलियां शहर के भण्डारी हाॅस्पीटल में नर्सिंग का कोर्स कर रही है और अन्य शहर से होकर इसी हाॅस्पीटल के हाॅस्टल में रहती है। उवपन में बैठने के लिए समुचित स्थान तलाशती उनकी आंखे एक कोने में रखी छायादार बेंच पर पड़ी। बेंच पर पुर्व से ही एक युवक बैठा था। उसके हाथों में एक किताब थी। वह उसे ही पढ़ रहा था। बेंच पर अभी दो व्यक्ति और बैठ सकते थे। धुप की तपन के बीच स्मिता और निशा ने बिना वक्त गंवाये उस बेंच की ओर पैदल ही दौड़ लगा दी। मई का महिना चल रहा था। चारों ओर तपन ही तपन थी। गार्डन में छायादार पेड़ शीतल हवा बरसा रहे थे। गार्डन की जमीन पर माली द्वारा अभी-अभी छिड़काव किये गये पानी की ठण्...
पल दो पल की खुशियां
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पल दो पल की खुशियां

पल दो पल की खुशियां रचयिता : जितेंद्र शिवहरे संध्या आज पहली बार प्रभात के साथ सफ़र कर रही थी। त्यौहार के सीज़न के कारण बस वाले छोटी यात्रा करने वाले पेसेन्जर को बस में बैठा नहीं रहे थे। उस पर जो बस वाले बैठा भी लेते तो बैठने की सीट मिलना मुश्किल थी। संध्या की समस्या अभी खत्म नहीं हुयी थी। उसने देखा सड़क पर चक्काजाम की स्थिति निर्मित हो गयी है जो इस सड़क पर एक आम समस्या थी। संध्या ने विचार किया की आज स्कूल पहुंचने में वह निश्चित ही विलंब से पहुंचेगी। स्कूल के हेडमास्टर की डांट से वह भली-भांति परिचित थी। उसका विलंब से स्कूल पहुंचने का कारण अधिकतर सड़क जाम होना ही होता था। सड़क पर वाहनों के जाम की स्थिति का हवाला देते-देते वो थक गई थी। क्योंकि हेडमास्टर चिरपरिचित इस समस्या का हल संध्या को पुर्व में बहुत बार सुझा चूके थे। या तो संध्या मोपेट से स्कूल आया करे क्योंकि मोपेट से आने-जाने में सड़क...