Friday, March 6राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर आपका स्वागत है... अभी सम्पर्क करें ९८२७३६०३६०

व्यंग्य

पापों का स्टॉक क्लीयरेंस
व्यंग्य

पापों का स्टॉक क्लीयरेंस

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** मानव जाति भी कमाल की चीज़ है। अपने पापों को वह ऐसे संजोकर रखती है मानो कोई व्यापारी पुराने माल को गोदाम में ठूँस रहा हो। व्यापारी सोचता है- “सीज़न आएगा तो क्लीयरेंस सेल में निकाल दूँगा।” और यही फॉर्मूला धर्म के बाज़ार में भी चलता है। फर्क बस इतना है कि वहाँ माल एक्सचेंज की सुविधा है- “पाप लाओ और बदले में पुण्य ले जाओ।” मानो धर्म की दुकान चलाने वालों ने भगवान से बाकायदा लाइसेंस ले रखा हो। हर पाप की एक तय एक्सचेंज वैल्यू है- आपके सारे काले पापों को पुण्य की व्हाइट मनी में बदलने की दरें निर्धारित हैं। सावन का महीना तो जैसे खास इसी काम के लिए बना है। ठीक वैसे ही जैसे दुनियावी धन-दौलत का हिसाब-किताब मार्च क्लोज़िंग के दबाव में निपटता है, कुछ ऐसा ही दबाव सावन में पाप-पुण्य के वार्षिक ऑडिट क...
औकात की बात
व्यंग्य

औकात की बात

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आज फिर उनकी औकात उन्हें दिखने लगी है। दुखी हैं बहुत। एक बार हो जाए, दो बार हो जाए, लेकिन बार-बार कोई औकात दिखा दे तो भला किसे बर्दाश्त होगा? इस बार तो हद ही कर दी। संस्था वाले भी पीछे ही पड़े हैं... क्या यार, इस बार तो मात्र दस रुपये की माला को मोहरा बना दिया, औकात दिखाने के लिए! उन्हें पता चला कि सम्मान करने के लिए जो माला उनके गले में डाली गई थी, उसकी बाजार कीमत दस रुपये थी, और संस्था द्वारा थोक में मंगवाने के कारण वह महज आठ रुपये में पड़ी थी। बस, तभी से अपसेट हैं। कार्यक्रम संस्था द्वारा उनकी शादी की वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित था। संस्था वालों ने उनकी वर्षगांठ पर उन्हें दस रुपये की माला पहनाकर उनकी औकात दिखा दी! पिछली बार भी एक कार्यक्रम हुआ था। तब इसी संस्था के एक अन्य सदस्य को...
बिजली का बिल- ४४० वोल्ट है छूना है मना …
व्यंग्य

बिजली का बिल- ४४० वोल्ट है छूना है मना …

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आजकल बिजली का करंट सिर्फ पागलखाने में या बिजली के तारों में ही नहीं दिया जाता, बल्कि आपके घर में हर महीने बिल के रूप में भी आता है। यह पागल का इलाज करने के लिए नहीं, बल्कि आपको पागल बनाने के लिए है! पहले यह बिल दो महीने में आता था। लेकिन सरकार को लगा कि लोग कम पागल हो रहे हैं, इसलिए इसकी आवृत्ति बढ़ाकर मासिक कर दी गई। सरकार की महावारी की तरह यह भी हर महीने बिना नागा के आता है- इसमें मीनोपॉज़ की कोई गुंजाइश नहीं! वैसे सरकार भी लोगों की चिल्लपों से बड़ी परेशान थी। जब बिजली का बिल दो महीने में आता था तो सुरसा के मुँह की तरह दिखाई देता था। इसलिए उसे हर महीने कर दिया गया, ताकि बिल आधा लगे। लेकिन जैसे ही बिल आधा हुआ, लोगों का बजट गड़बड़ा गया। बचे हुए पैसों से गृहिणियाँ अपनी शॉपिंग करने लगीं, ब...
जब नानी मरती है
व्यंग्य

जब नानी मरती है

सुधा गोयल बुलंद शहर (उत्तर प्रदेश) ********************  "मेरे बराबर काम करोगी तो नानी याद आ जाएगी"- मैने बेटी को उलाहना देते हुए कहा। "किसकी नानी मम्मी? आपकी या मेरी? आपकी नानी को हम जानते नहीं और अपनी नानी तो यहां हैं हीं। फिर याद करने की जरूरत ही क्यों?" मुस्कराते हुए बिटिया बोली। गलती का एहसास होते ही मैंने अपनी जीभ काट ली। बिटिया ठीक ही तो कहती हैं। काम और नानी का क्या संबंध? भला हो इन लिखने वालों का जिन। होंने नानी की वृद्धावस्था का ख्याल न कर उन्हें भी मुहावरों की लाइन में लगा दिया। नानी के आराम करने के दिन हैं या काम की लाइन में लगने के? "जरा से काम का नाम सुनते ही इनकी नानी मरने लगती है। "बिट्टू रुआंसा होकर बोला- "मम्मी क्यों वे वक्त नानी को कोसती रहती हो।नानी मर जाएंगी तो छुट्टियों में किसके घर जाएंगे? तुम्हें अपनी मम्मी के लिए ऐसा नहीं कहना चाहिए।" बेटा नसीहत दे रहा है पर...
नौकरी- क्यों करी
व्यंग्य

नौकरी- क्यों करी

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** पहले के ज़माने में हमारे युवा मुल्क जीतने, फतेह करने निकलते थे। यात्राएँ करते थे, या फिर किसी के प्यार में पागल होकर फ़रहाद-मजनूँ-महीवाल बन जाते थे- क्रमशः शीरीं, लैला और सोनी की तलाश में भटकते रहते थे। वे इब्ने-बतूता, वास्को-डी-गामा और राहुल सांकृत्यायन की तरह सभ्यताओं, संस्कृतियों, द्वीपों-महाद्वीपों की खोज में निकलते थे। लेकिन आज की तारीख़ में युवाओं ने इन सबको अलविदा कह दिया है- अब तो एक ही खोज बची है- वो है नौकरी। कोई पूछे कि नौकरी क्यों करी? तो हम कहेंगे-गरज पडी इसलिए करी। और गरज है कि- बिन नौकरी छोकरी नहीं आती। विद्या ददाति सरकारी नौकरी, सरकारी नौकरी ददाति सुंदरी कन्या। बड़ी हसीन है ये नौकरी। ये जिधर भी निकले, इठलाती-बलखाती, भाव खाती ..नौकरी इतना भाव खाती है की एक बार मिल जाने...
एक राष्ट्र, एक चुनाव- बेरोज़गारी के बढ़ते भाव
व्यंग्य

एक राष्ट्र, एक चुनाव- बेरोज़गारी के बढ़ते भाव

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** देश में "वन नेशन, वन इलेक्शन" का पुछल्ला बड़े जोर-शोर से उछाला जा रहा है। जाहिर है, जब सभी अपनी राय उंडेल रहे हैं, तो भला मैं क्यों चुप रहूँ? राय देने में रत्ती भर भी गुरेज नहीं है अपुन को… कोई माने या न माने। मुझे तो देश के युवाओं की रोज़ी-रोटी पर लात मारने जैसा लग रहा है यह! ज़रा उन लोगों की सोचो जो चुनावों के चूल्हे पर ही अपनी दो जून की रोटी सेंकते हैं । उनकी तो रोज़ी-रोटी ही छिन जाएगी साहब! वैसे ही देश में रोज़गारों की भट्टी बुझ चुकी है… थोड़ा-बहुत रोज़गार इस चुनावी सीज़न में मिल भी जाता है… सरकार उस पर भी छीना-झपटी करना चाहती है! देखो न, नज़र उठाकर… भारत के नक्शे पर उंगली फेरो ज़रा… कहीं न कहीं कोई न कोई राज्य पर लटकी हुई हैं चुनावी झालरें… चुनावी सावों का दौर- जुलूस, जलसा, जुगाड़…...
बस दो शब्द
व्यंग्य

बस दो शब्द

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** कहते हैं, शब्दों का प्रयोग सोच-समझकर करना चाहिए। शब्द वो हथियार हैं जो घाव भी करते हैं और मलहम भी लगाते हैं। इन्हें ब्रह्मस्वरूप माना गया है। शायद इसी कारण "दो शब्द" का कॉन्सेप्ट जन्मा। मंचों पर अक्सर देखा जाता है कि वक्ता से "दो शब्द"कहने का अनुरोध किया जाता है। मगर "दो शब्द" की सच्चाई इससे कहीं आगे है। दो शब्द आपको सही कहने में जायें तो आपको कोई भी भाषाधिकारी, वादव्य, वाकपति, वाक्य विशारद वागीश, शब्देश्वर, ब्राह्मणोत्तम, शब्द शिल्पकार, वाक नायक, वागीश्वर, वाग्मी, वाग्विलासी, वाचस्पति, वादेंद्र, वाद वित्त, विदग्ध, साहबे जबा, सुवक्ता, सुवग्नी कहलाने से नहीं रोक सकताl शब्द बड़े हिसाब से खर्च करने चाहिए, इसलिए मौन को मूर्खों का आभूषण बताया गया है। क्योंकि मूर्ख अगर मौन ही रहें तो ठीक है, ...
मकान मालिक की व्यथा
व्यंग्य

मकान मालिक की व्यथा

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** सच पूछें तो आज के ज़माने में सबसे कठिन काम है मकान मालिक बनना। शादी में ३६ गुण नहीं मिलें तो चल जाता है, पर मकान मालिक और किरायेदार के बीच तो हमेशा ३६ का आंकड़ा रहता है। कहते हैं ना कि आपके किए का फल इसी जन्म में मिलता है। इसी कारण "क्योंकि सास भी कभी बहू थी" की तर्ज़ पर जो आज मकान मालिक है, वो कभी किरायेदार भी रहा होगा। जिस प्रकार आपने किरायेदार रहते हुए अपने मकान मालिक की नाक में दम कर दिया था, उसी का बदला भगवान आपको इसी जन्म में मकान मालिक बनाकर लेता है। पता नहीं कब हमारे भाग्य में शुक्र ग्रह अतिक्रमण करके मेष राशि की कुंडली में बैठ गया कि हमें एक विला बनाने का शौक चढ़ा। इस शौक को चढ़ाने में कुछ मेरे यार भी थे, जो “चढ़ जा बेटा सूली पे, तेरा भला करेंगे राम” की तर्ज़ पर पूरा योगदान दे र...
पहली बारिश मेरे शहर की
व्यंग्य

पहली बारिश मेरे शहर की

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** रविवार, शाम का वक्त थोड़ा सा सुकून भरा होता है, क्योंकि मेरे रेलवे अस्पताल की ड्यूटी से राहत रहती है। इसलिए दिन के नैपिंग टाइम को थोड़ा ज़्यादा खींच लेता हूँ। सोकर उठा तो पाँच बज गए थे। हड़बड़ाकर नीचे फ़ोन किया कि क्या हुआ, आज ओपीडी से बुलावा नहीं आया? स्टाफ बोला- “सर, बाहर बारिश हो रही है।” बारिश! मुझे पता ही नहीं चला। शहर में पहली बारिश और हम यहाँ कमरे में पड़े कृत्रिम एसी की हवा में बरसात के विलक्षण आनंद से वंचित। ये बारिश भी न! सबसे ज़्यादा ख़ुशी अगर किसानों को देती है तो उसके बाद मेरे स्टाफ को। क्योंकि बारिश है तो मरीज़ कोई आएँगे नहीं, और बिना कुछ एक्स्ट्रा प्रयास के ही उनकी ढींगामस्ती में चार चाँद लग जाएँगे। शहर के मकान कुछ इस तरह से बन गए हैं कि पहली बारिश कब हो जाए, कब चली जाए,...
बधाई हो! आपको किताब हुई है …
व्यंग्य

बधाई हो! आपको किताब हुई है …

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** अभी तक तो बस हम बधाई ही देते आए थे, किसी लेखक के पुस्तक होने की बधाई! जी, बढ़िया बात तो है ही, जनाब... लेखक का "गर्भाधान" तब होता है, जब विचारों का मिलन स्याही से होता है। "गर्भस्थ शिशु" की तरह रचना पलती है- कभी उबकाई (लेखक का असंतोष), कभी मूड स्विंग (संशोधन), और कभी पौष्टिक खुराक (प्रेरणा) मिलती है। संपादक स्त्री रोग विशेषज्ञ बनकर जांचता है, प्रकाशक अल्ट्रासाउंड करता है-"किताब स्वस्थ है या सी-सेक्शन लगेगा?" प्रकाशन के दिन प्रसव पीड़ा चरम पर होती है, और किताब कागज़ पर जन्म लेती है। समीक्षकों की गोदभराई में तारीफ और आलोचना के टीके मिलते हैं। फिर वह पाठकों के संसार में किलकारी भरती है- कुछ इसे पालते हैं, कुछ अनाथालय में छोड़ देते हैं! लेकिन अब हम भी बधाई के पात्र बन गए जी... अरे, हमारी भी...
नाई चाचा की दुकान
व्यंग्य

नाई चाचा की दुकान

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** ओपीडी में बैठा, प्लास्टर रूम से एक अधेड़ उम्र की महिला की चीख सुन रहा था। दरअसल उसका प्लास्टर काटा जा रहा था। प्लास्टर कटाई मशीन की धरधाराती आवाज़ और महिला की चीख, दोनों ने माहौल को बेहद डरावना बना रखा था। मैं सोच रहा था कि क्या मेरे जीवन में इससे भी बुरा और डरावना दृश्य हो सकता है। तभी मुझे याद आया कि हां, बिल्कुल है, और शायद उससे भी ज्यादा डरावना अनुभव था बचपन में नाई चाचा के सैलून में हेयर कटिंग का। किसी रामसे ब्रदर्स की डरावनी फिल्म की स्क्रीनिंग से भी डरावना वह दृश्य होता, जब हम लगभग घिसटते हुए पिताजी के हाथों नाई चाचा की दुकान तक पहुंचाए जाते। नाई चाचा की दुकान गाँव के हिसाब से सबसे आकर्षक, रहस्यमयी, डरावनी और रोमांच भरी होती थी। दुकान में एक पुरानी, टूटी-फूटी मेज थी, जिसकी एक टूट...
हड्डियों की चीख़…
व्यंग्य

हड्डियों की चीख़…

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** “कृपया कमजोर दिल वाले इस रचना को नहीं पढ़ें“ अपने प्रतिष्ठान में, अपनी कुर्सी में गहराई से धँसा, कुछ मरीज़ों की हड्डियों और पसलियों को एक साथ मिला रहा था, तभी पास के प्लास्टर कक्ष से, जहाँ एक अधेड़ उम्र की महिला थी, उसके चिल्लाने की आवाज़ आई। साथ ही, प्लास्टर काटने के लिए इस्तेमाल की जा रही कटर मशीन की गड़गड़ाहट सुनाई दी, मानो कोई मशीनगन चल रही हो। यह प्लास्टर काटने का खौफनाक मंज़र किसी रामसे ब्रदर्स की हॉरर फ़िल्म से भी ज़्यादा डरावना। यूँ तो प्लास्टर काटने का समय मैं ओ.पी.डी. के बाद का रखता हूँ, इसका एक विशेष प्रयोजन है... मुझे आवाज़ के शोरगुल में बच्चों को पेरेंट्स की गोद में दुबकते सिसकते देखना अच्छा नहीं लगता। कई मरीज़, जिनका प्लास्टर लगना होता है, अपना इरादा बदल देते हैं। बोलते हैं- ...
एक रिटायरी की कहानी- “पिया घर आया”
व्यंग्य

एक रिटायरी की कहानी- “पिया घर आया”

सुधा गोयल बुलंद शहर (उत्तर प्रदेश) ********************  हां जी यह सही है कि पिया यानि मेरे पतिदेव पैंतालीस साल आफिस में एक कुर्सी पर बैठ कर थक चुके और बिना कुर्सी के घर आए हैं बलैयां लूं या पूजा का थाल लेकर आरती उतारुं,गल हार पहनाऊं और कहूं -"पधारो सा"।उम्र के इस पड़ाव को चूम लूं। अब हम दोनों गलबहियां डालकर रहेंगे। तुम रिटायर हो ही गये हो में भी बहू पर घर परिवार छोड़ कर रिटायर हो जाती हूं। अभी इतना सोच ही पाई थी कि बहू रानी की भृकुटी देखकर चौंक पड़ी- "सासू मां, अब आप रिटायर होने की मत सोचना। दो-दो रिटायरियों को कैसे झेल पाऊंगी?" मैंने घूम कर देखा-सुना बहू के चेहरे पर चिंता की लकीरें थीं। पर क्यों- ? यह मैं समझ नहीं पा रही थी। अगले दिन से घर में रिटायरमेंट का कार्यक्रम शुरू होने वाला था। अथ कथा रिटायरमेंट सुनाकर अपना जी कुछ हल्का कर लेती हूं। दस बज गए हैं पर पतिदेव के पांव बिस्तर से न...
चूहों का आतंक
व्यंग्य

चूहों का आतंक

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** सरकारी दफ़्तर-सा था... नहीं-नहीं, सरकारी दफ़्तर ही था... अब आप कहेंगे, कौन-सा दफ़्तर? भई, मुझे तो सब दफ़्तर एक जैसे ही नज़र आते हैं। दफ़्तरों की शक्ल एक जैसी, वहाँ कुर्सी पर बैठे अधिकारियों की शक्ल बिल्कुल एक जैसी... जैसे माँ-जाए भाई या बहन हों। सरकारी नाम आते ही एक चिर-परिचित छवि आपके मन में बन ही गई होगी... बननी ही चाहिए... क्योंकि मेरी तरह आप सभी का भी नित-प्रतिदिन इन सरकारी दफ़्तरों से पाला पड़ता ही है। बस ऐसे ही किसी दफ़्तर के बरामदे में पड़ी टूटी बेंच पर मैं पड़ा हुआ हूँ। क्योंकि मुझे बुलाया नहीं गया था, अपनी मनमर्ज़ी से मुँह उठाए यहाँ चला आता हूँ, इसलिए घर के बाहर गली के कुत्ते की तरह मालिक की रहमो-करम की नज़रों की इनायत हो जाए, बस यही इंतज़ार कर रहा हूँ। एक लफ़ड़ा हो गया... न ज...
किसी न किसी का आदमी
व्यंग्य

किसी न किसी का आदमी

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आजकल किसी का आदमी होना कितना जरूरी हो गया है! अगर आप किसी के आदमी नहीं हैं, तो आप आदमी कहलाने लायक ही नहीं हैं। यह पक्का मान लीजिए- आप दो पाये जानवर हो सकते हैं, पर आदमी नहीं। जहाँ देखो, वहाँ कोई न कोई किसी न किसी का आदमी ही नजर आ रहा है । नौकरी, प्रमोशन, जॉब, डिग्री, राशन, वजीफा, पुरस्कार- सब उसी को मिल रहे हैं जो किसी न किसी का आदमी है। मेरी ओपीडी में भी हर दूसरा मरीज किसी न किसी का आदमी होता है। मरीज आते भी यह देखने के लिए हैं कि डॉक्टर साहब भाव देते हैं या नहीं। सलाह तो डॉक्टर साहब देंगे ही, लेकिन भाव भी देंगे या नहीं, मसलन चाय भी तो पिलाएँगे, नहीं तो तो जिनके आदमी हैं, उनका फोन आ जाएगा- 'अरे, हमने अपना आदमी भेजा था! बताओ, आपने ध्यान ही नहीं रखा। मरीज मरा जा रहा था, और आपने उसे बाहर ...
झूठ बोले कौआ काटे
व्यंग्य

झूठ बोले कौआ काटे

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** वो झूठ बहुत बोलते हैं… नहीं, मेरा मतलब है, झूठ ही बोलते हैं। अरे, कभी-कभार मुँह से सच निकल भी जाए तो बड़ा पछताते हैं। क्या करें, उनकी आदत जो है। झूठ उनके रग-रग में बसा हुआ है। ऐसा नहीं कि झूठ वो किसी विशेष उद्देश्य से बोलते हों। वो बिना किसी का अहित किए -और कभी-कभी तो खुद का अहित कर-किसी भी परिस्थिति में झूठ बोल सकते हैं। और अगर उनके झूठ से किसी का नुकसान हो भी जाए, तो बड़ा पछताते हैं, माफ़ी माँगते हैं अपने व्यवहार पर। लेकिन उनकी मासूमियत भरी शक्ल देखकर हर कोई पिघल जाता है। उन्हें झूठ के लिए माफ़ी मिल जाती है। फिर तो उनके झूठ की ट्रेन रिश्तों की पटरी पर सरपट दौड़ने लगती है। निरुद्देश्य, निर्बाध और निष्कलुष भाव से धारा-प्रवाह झूठ बोलते हुए उनकी भाव-भंगिमा निहायत ही शरीफ़, मासूम बालक की तर...
अक्ल बड़ी या भैंस
व्यंग्य

अक्ल बड़ी या भैंस

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** बहस वाजिब है या नहीं, ये तो नहीं पता, लेकिन इस बहस ने भैंस को जरूर परेशान कर रखा है। भैंस भी कह रही है, "यार, ये फालतू की बहस में अक्ल लगाने के बजाय एक लाठी ले लो हाथ में। फिर भैंस भी तुम्हारी और अक्ल भी तुम्हारी... दोनों को बाँध दो खूंटे से।" इस बहस में न जाने कितने पढ़े-लिखे लोगों की अक्ल भैंस चरने गई कि उन्हें समझ में ही नहीं आ रहा कि करें तो क्या करें ! अक्ल का काला अक्षर भी भैंस बराबर दिख रहा है। बताओ, जब दोनों ही घास चरने चले जाएंगे, तो यह तो होना ही था। अब भैंस तो घास चरने के बाद दूध भी दे देगी, लेकिन अक्ल का क्या करोगे? भुर्ता बनाओगे क्या? वैसे, अक्ल हमेशा से प्रतियोगिता में रही है- कभी शक्ल के साथ, तो कभी भैंस के साथ। लेकिन आप को बता दें, अक्ल के द्वारा किए गए कोरे कागज़ काले क...
मंदिर में जूते चोरी
व्यंग्य

मंदिर में जूते चोरी

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ रहा हूँ, श्रीमती जी आगे-आगे, मैं पीछे-पीछे। श्रीमती जी से नज़रें चुराकर बार-बार उस दिशा में देख ही लेता हूँ, जहाँ अभी-अभी हमने अपने जूते छुपाए हैं। सच पूछो तो जूते चुराए जाने के ख्याल से ही बेचैन हो उठता हूँ। अभी १० दिन पहले ही श्रीमती जी ने दीवाली सेल में बाज़ार से नए जूते खरीदे थे। इस महंगाई के दौर में विचार तो यह था कि एक पैर का जूता इस साल और दूसरे पैर का जूता अगले साल खरीद लेंगे, लेकिन दुकानदार ने इस प्रकार की किश्तों में जूतों की आपूर्ति की कोई व्यवस्था नहीं होने पर खेद जताया। वैसे हमारी श्रीमती जी बिल्कुल निश्चिंत हैं कि आज हमारे जूते चोरी नहीं हो सकते। उन्होंने ऐसा अचूक इंतज़ाम आज कर रखा है। उन्होंने एक जूता मंदिर के प्रांगन में आराम कर रही आराम कुर्सी के...
थू थू की थाह की थीसिस
व्यंग्य

थू थू की थाह की थीसिस

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आज एक थीसिस, जो हमारी डिग्रियों की धूल सने कागज़ों के बीच में हमें मिल गई, उसके कुछ पन्ने पलटकर आपको सुनाते हैं। थीसिस का शीर्षक है- "थू थू की थाह" थू थू करना एक कला है, बिलकुल जुगाड़ कला की तरह शुद्ध भारतीय कला। मैं तो कहता हूँ, इस कला का कॉपीराइट लेना चाहिए! विदेशी लोग हमारी कला को हथियाने में लगे हैं- योग ले गए, कामसूत्र ले गए, हरे कृष्णा-हरे राम ले गए- हमारी हिंदुस्तानी कला को चमकीले कवर में लपेटकर वापस हमें ही बेच रहे हैं। ये सब प्रपंच अंग्रेज़ों के ज़माने से चला आ रहा है। उस समय भी तो कच्चा माल लेकर, पका-पकाया माल देते थे। वैसे भी हम भारतीयों को कच्चा खाया नहीं जाता, हमें तो पका-पकाया चाहिए थू थू एक एब्सट्रैक्ट आर्ट है। कला के क्षेत्र में ऐसी कला हर किसी को समझ में नहीं आती, पारखी नज...
छोटू चायवाला
व्यंग्य

छोटू चायवाला

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** "अरे छोटू, इधर आ!" "दो कट चाय लेकर आ!" "खाने में क्या है, छोटू? सलाद लगा दे ना!" "छोटू, जा! दो नंबर टेबल पर कपड़ा फेर के ऑर्डर लेकर आ!" इन सभी वाक्यों में एक शब्द कॉमन है- "छोटू"। यह कोई चायवाला हो सकता है, किसी ढाबे पर वेटर हो सकता है, आपकी गाड़ी पोंछने वाला हो सकता है, सड़क पर भीख मांगने वाला हो सकता है, जूते पॉलिश करने वाला, फुटपाथ पर गुब्बारे बेचने वाला, या फिर किसी रईस के कुत्ते घुमाने वाला भी हो सकता है। मंदिरों के बाहर भी आपको ये छोटू मिल जाएगा—हाथ में चंदन-तिलक की प्याली पकड़े हुए, श्रद्धालुओं के माथे पर रोली-तिलक लगाता हुआ। यह कोई भी हो सकता है, भाई! इसका नाम राम, रहीम, रहमान, सुलेमान, श्याम या एंथनी कुछ भी रखा गया होगा, लेकिन हम और आप इसे सिर्फ "छोटू&" के नाम से जानते ह...
मुझे भी बिकना है
व्यंग्य

मुझे भी बिकना है

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आईपीएल मैच का सीजन चल रहा था। क्रिकेट के बारे में मेरा ज्ञान शुरू से ही सिर्फ फील्ड के बाहर गई गेंद को दौड़-दौड़ कर लाकर बॉलर को पकड़ाने तक सीमित है। कभी-कभी मेरे साथी किसी पड़ोस वाली आंटी के मकान का शीशा तोड़ने पर मेरा झूठा नाम लगा देते थे। इसी बहाने यह झूठी तसल्ली मिल जाती थी कि चलो, पड़ोस की आंटी और अंकल ही सही, कोई तो मानता है कि गेंद हम भी मार सकते हैं, शीशा हम भी तोड़ सकते हैं। क्रिकेट का बाजारीकरण भी देखा है। क्रिकेट अब गलियों से निकलकर बड़े-बड़े उद्योगपतियों की जेब में आ गया है और सेलिब्रिटी के तीसरे पेज पर अपनी जगह बना चुका है। आईपीएल शुरू होते ही मीडिया हाउस की चांदी हो जाती है। बड़े-बड़े होर्डिंग्स और विज्ञापन, आईपीएल की बिडिंग से ही शुरू हो जाते हैं। हर तरफ गहमागहमी का माहौल ...
चलो बुलावा आया है
व्यंग्य

चलो बुलावा आया है

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** चलो बुलावा आया है, दिल्ली ने बुलाया है। इनकी निगाहें दिल्ली पर टिकी हुई हैं। क्या नेता, क्या लेखक, क्या कलाकार सबकी नजरें दिल्ली की ओर लगी रहती हैं। जैसे गली-गली में आवारा घूम रहा आशिक, जो बस दिल्ली के एक इशारे भर की देर में अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर दिल्ली को कूच कर दे। कोई रैली के लिए, कोई धरना-प्रदर्शन के लिए, कोई टिकट के लिए, कोई पुरस्कार के लिए सबके लिए बस एक ही मंजिल...एक ही सहारा...हारे का सहारा... "चलो दिल्ली।" दिल्ली एक मंजिल है, एक आकर्षण है, एक मानक है, एक वॉशिंग मशीन भी, जहां हर प्रकार के दाग धुल जाते हैं। राजनेताओं की तो एक टांग अपने क्षेत्र में है, तो दूसरी दिल्ली में। कुछ ऐसे हैं, जिनका बुलावा नहीं आता, फिर भी हर दूसरे दिन दिल्ली जा पहुँचते हैं। शायद बुलाने वाले भूल गए हो...
औकात की बात
व्यंग्य

औकात की बात

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आज फिर उनकी औकात उन्हें दिखने लगी है। दुखी हैं बहुत। एक बार हो जाए, दो बार हो जाए, लेकिन बार-बार कोई औकात दिखा दे तो भला किसे बर्दाश्त होगा? इस बार तो हद ही कर दी। संस्था वाले भी पीछे ही पड़े हैं... क्या यार, इस बार तो मात्र दस रुपये की माला को मोहरा बना दिया, औकात दिखाने के लिए! उन्हें पता चला कि सम्मान करने के लिए जो माला उनके गले में डाली गई थी, उसकी बाजार कीमत दस रुपये थी, और संस्था द्वारा थोक में मंगवाने के कारण वह महज आठ रुपये में पड़ी थी। बस, तभी से अपसेट हैं। कार्यक्रम संस्था द्वारा उनकी शादी की वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित था। संस्था वालों ने उनकी वर्षगांठ पर उन्हें दस रुपये की माला पहनाकर उनकी औकात दिखा दी! पिछली बार भी एक कार्यक्रम हुआ था। तब इसी संस्था के एक अन्य सदस्य को...
एक डिज़ायर की व्यथा कथा
व्यंग्य

एक डिज़ायर की व्यथा कथा

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** पिछले दस दिनों से मंत्री जी के ऑफिस के कोने में पड़े कचरे के डिब्बे में पड़ी हुई हूँ। मेरे ऊपर मेरी जैसी न जाने कितनी अबला बहनें गिरी पड़ी हैं। न जाने कितने बेसहारा भाई-सरीखे सिफारिशों के लेटर, इनविटेशन, ग्रीटिंग्स, और ज्ञापन मेरे ऊपर गिर-गिरकर मुझे दबाए जा रहे हैं। साँस लेना मुश्किल हो गया है। दो दिन से कचरा उठाने वाला भी नहीं आया। मेरी आखिरी इच्छा है कि कम से कम इस घुटन से बाहर होकर किसी कचरा निस्तारण प्लांट में जाकर रीसायकल हो जाऊँ, कुछ देश के काम आ सकूँ। इससे बढ़िया तो मुझे सड़क पर फेंक देता। किसी कबाड़ वाले को रद्दी में बेच देता, कम से कम किसी खोमचे वाले के समोसे के लिए प्लेट का काम कर जाती। किसी बच्चे की कागज की नाव बनकर सड़क के गड्ढों में बह जाती, भले ही थोड़ी देर के लिए ही सही...
गणतंत्र दिवस
व्यंग्य

गणतंत्र दिवस

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** सर्दी की कड़कड़ाती ठंड में खिड़की के बाहर देख रहा हूँ। अलसुबह उनींदे से बच्चे अपनी स्कूल यूनिफ़ॉर्म में रिक्शों पर लदे स्कूल जा रहे हैं। यूँ तो सर्दियों में स्कूल का समय दोपहर बाद का होता है, खासकर सरकारी स्कूलों में, लेकिन गणतंत्र दिवस पर झंडा फहराने का समय सुबह का ही होता है। गणतंत्र की स्वर्णिम भोर की किरणों में झंडा फहराना है। आसमान की ओर देखता हूँ। घना कोहरा छाया है, कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा। सूरज पिछले सात दिनों से सरकारी दफ्तरों की कार्यप्रणाली की तरह काम कर रहा है- ऑफिस खुले से हैं, पर ऑफिसर गायब हैं। ऐसे ही आसमान खुला सा है, बस सूरज गायब है। कम से कम नेता की तरह तो दिखे, जो अपने चुनाव क्षेत्र से गायब होकर दिल्ली में तो नजर आता है। सूरज भी न, दोपहर में सीधे माथे पर चढ़ता है, थोड...