उपन्यास : मैं था मैं नहीं था : भाग – २३
विश्वनाथ शिरढोणकर
इंदौर म.प्र.
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दूसरे दिन स्कूल जाते वक्त सुशिलाबाई मुझे एक बार फिर स्कूल जाने का बोल कर गयी। मैंने उनकी बात का कोई जवाब ही नहीं दिया पर स्कूल के समय चुपचाप तैयार होकर सुरेश के साथ स्कूल गया। बीच की छुट्टी में मैंने सुरेश को सब बताया। मैं सुरेश को एक तरफ ले गया और उससे कहा, 'तुम्हें मालूम है क्या कि इन सुशिलाबाई की इच्छा अपने दादा से शादी करने की है?'
'करने दो। अपने को क्या करना है?' सुरेश का जवाब मुझे निराश करने वाला था।
'अरे, पर इससे तो वें हमारी सौतेली माँ हो जाएंगी?'
'होने दो। हमें क्या फर्क पड़ने वाला है?'
अरे, पर वो तो घर का कुछ भी काम ही नहीं करती?'
तो माँजी होती है ना साथ में। वही तो करती है सब काम।' सुरेश बोला।
'पर मुझे वें दोनों बिलकुल अच्छी नहीं लगती।' मैंने कहां।
'पर दादा को तो ताई अच्छी लगती है? एक दिन दादा राजाभाऊ को कह रहे थे की उन्हें व...





















