Monday, October 19राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर आपका स्वागत है... अभी सम्पर्क करें ९८२७३६०३६०

ग़ज़ल

उजालों की निशानी
ग़ज़ल

उजालों की निशानी

पुरु शर्मा अशोकनगर (म.प्र.) ******************** . उजालों की निशानी संभाले रखना उम्मीदों की लौ जलाऐ रखना गुजरेंगी मुश्किलों की हवाएँ भी बस होठों पे मुस्कुराहट बनाएँ रखना मंजिलें मुकम्मल होंगी जरूर, बस सदाक़त का सफ़ीना थामे रखना ग़र हैं बेसबब मोहब्बत वतन से तो अमन-ए-पैगाम बनाए रखना यह धरती हैं माँ का आँचल इसकी आन को संभाले रखना . परिचय :-  पुरु शर्मा निवास : बहादुरपुर, जिला - अशोकनगर (म.प्र.) कई समाचार पत्रों में लेख व कविताएँ प्रकाशित, निरंतर लेखन कार्य जारी। वर्तमान में भोपाल में स्नातक की पढाई में अध्ययनरत आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख...
दस्तक
ग़ज़ल

दस्तक

धैर्यशील येवले इंदौर (म.प्र.) ******************** अदब से रहने का ये सिला मिला पाक दामन पे किचड़ उछाल रहे हैं। क्या मैं इतना मशहूर हो गया हूं मुझे बदनाम कर अपना नाम कर रहे हैं। मुद्दई वो गवाह वो मुंसिफ भी वो मुल्ज़िम करार दे मुझे इंसाफ कर रहे है। किसे करेगा फरियाद नाइंसाफी की सभी हुक्मरान गहरी नींद सो रहे है। किसी से उम्मीद न कर इमदाद की सभी अपना अपना रंजोगम ढो रहे है। सितमगर हो सके तो बचाले अपना घर बद्दुआ ओ के साये तेरे दर पे दस्तक दे रहे है। . परिचय :- नाम : धैर्यशील येवले जन्म : ३१ अगस्त १९६३ शिक्षा : एम कॉम सेवासदन महाविद्याल बुरहानपुर म. प्र. से सम्प्रति : १९८७ बैच के सीधी भर्ती के पुलिस उप निरीक्षक वर्तमान में पुलिस निरीक्षक के पद पर पीटीसी इंदौर में पदस्थ। सम्मान - हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिंदी रक्षक २०२० सम्मान आप...
उनसे जब टकराई आँखें
ग़ज़ल

उनसे जब टकराई आँखें

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** उनसे जब टकराई आँखें। तब कितनी घबराई आँखें। देखे उनके आँसू थोड़े, अपनी भी डबराई आँखें। दुःख के लम्हों में लगती है, हो जैसे पथराई आँखें। थाह नहीं मिल पाया इनका, सागर सी गहराई आँखे। भीतर कितना हाल छुपाये, रहती जग बिसराई आँखें। पाकर सब कुछ खोया उसने, जिसने ख़ूब चुराई आँखें। . परिचय :- नाम - नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार मप्र सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन। तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.c...
दोहा गजल
ग़ज़ल, दोहा

दोहा गजल

रजनी गुप्ता "पूनम" लखनऊ ******************** धारण कर लो फिर गरल, शिवशंकर भगवान। धरती कर दो फिर धवल, शिवशंकर भगवान।। भस्मासुर के राज में, जीना था दुश्वार। जीवन कर दो फिर सरल, शिवशंकर भगवान। गाता जग गुणगान है, त्रयंबकं यह रूप। मानस कर दो फिर तरल, शिवशंकर भगवान।। चंद्र सुशोभित माथ पर, डम-डम-डमरू हाथ। तांडव कर दो फिर अमल, शिवशंकर भगवान।। गण-गणपति-गौरादि अरु, सजते भूत-भभूत। जागृत कर दो फिर अनल, शिवशंकर भगवान।। . परिचय : पूनम गुप्ता साहित्यिक नाम :- रजनी गुप्ता 'पूनम' पिता :- श्री रामचंद्र गुप्ता पति :- श्री संजय गुप्ता जन्मतिथि :- १६ जुलाई १९६७ शिक्षा :- एम.ए. बीएड व्यवसाय :- गृहणी प्रकाशन :- हिंदी रक्षक मंच इंदौर म.प्र. के  hindirakshak.com पर रचना प्रकाशन के साथ ही कतिपय पत्रिकाओं में कुछ रचनाओं का प्रकाशन हुआ है सम्मान :- समूहों द्वारा विजेता घोषित किया जाता रहा है। दो बार नागरिक अभ...
उजड़ी उजड़ी बस्ती
ग़ज़ल

उजड़ी उजड़ी बस्ती

शाहरुख मोईन अररिया बिहार ******************** उजड़ी उजड़ी बस्ती बिखरे पत्थर देख रहा हूं। मैं भी ज़ालिम का लश्कर देख रहा हूं। सोच में हूं कब बदलेगा मुकद्दर गरीबों का, धनवानों के हाथों में जो मैं खंजर देख रहा हूं। भूख गरीबी में उनको बेघर देख रहा हूं, हीरे-मोती वाली धरती को मैं बंजर देख रहा हूं। फटे लिवास बेरोजगारों की कतारें ये कैसा मंज़र, सियासी चेहरों में मैं अजगर देख रहा हूं। नकली दुध, ज़हरीला खाना, कसाई डॉक्टर, बापु मैं भी तेरे तीनों बंदर देख रहा हूं। महंगाई की मार, भ्रष्टाचार की लाठी, हाल गरीबों के क्यों इतने बदतर देख रहा हूं। कांटी जो ज़ुबान उसने तो कलम कहां गूंगी है, शाहरुख़ तुझमें पौरस भी, तुझमें सिम्न्द्र देख रहा हूं। . परिचय :- शाहरुख मोईन अररिया बिहार आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हि...
रात भर
ग़ज़ल

रात भर

प्रमोद त्यागी (शाफिर मुज़फ़्फ़री) (मुजफ्फरनगर) ******************** रात भर आपकी याद आती रही चाँदनी मेरे दिल को जलाती रही मानिन्दे शमाँ मैं भी जलता रहा लौ शमाँ की मुझे आजमाती रही उनकी आँखों की मय का असर देखिए ज़िंदगी उम्रभर लडखडाती रही साँसें उनके बिना मैं भी गिनता रहा एक आती रही एक जाती रही जिसपे मरते रहे हो के अंजान सी उनकी ज़ल्फें यूँ ही बल खाती रही बेवफा वो रहे फिर भी क्यूँ आजतक उनकी तस्वीर हमको रुलाती रही वो गये जब से "शाफिर" क्यूँ आँखें तेरी झूठ की आड में मुस्कुराती रही . परिचय :- प्रमोद त्यागी (शाफिर मुज़फ़्फ़री) ग्राम- सौंहजनी तगान जिला- मुजफ्फरनगर प्रदेश- उत्तरप्रदेश आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, ले...
बासी रोटी
ग़ज़ल

बासी रोटी

प्रेम प्रकाश चौबे "प्रेम" विदिशा म.प्र. ******************** बासी रोटी, प्याज नौन से। उतरत नइं है, कहें कौन से? बहुएं सुनें न मोड़ी-मोड़ा, को सुन रओ है? रोएं जौन से। गईया खों अब, चरबन नइयां, पौवा पे, आ गई पौन से। हम ने खाये दूध निपनिया, हम पुसात जा, निरे धौंन से? घर-घर में मटयारे चूल्हे, कहो "प्रेम" का भलौ मौन से? . परिचय :-  प्रेम प्रकाश चौबे साहित्यिक उपनाम - "प्रेम" पिता का नाम - स्व. श्री बृज भूषण चौबे जन्म -  ४ अक्टूबर १९६४ जन्म स्थान - कुरवाई जिला विदिशा म.प्र. शिक्षा - एम.ए. (संस्कृत) बी.यु., भोपाल प्रकाशित पुस्तकें - १ - "पूछा बिटिया ने" आस्था प्रकाशन, भोपाल  २ - "ढाई आखर प्रेम के" रजनी  प्रकाशन, दिल्ली से अन्य प्रकाशन - अक्षर शिल्पी, झुनझुना, समग्र दृष्टि, बुंदेली बसन्त, अभिनव प्रयास, समाज कल्याण व मकरन्द आदि अनेक  पाक्षिक, मासिक, त्रैमासिक पत...
फिर तैयारी रख
ग़ज़ल

फिर तैयारी रख

डाॅ. हीरा इन्दौरी इंदौर म.प्र. ******************** परवाना सरकारी रख। राग सभी दरबारी रख।। दाल रखी तरकारी रख। रोटी गरम करारी रख।। आग जले चाहे दिल में। होठों पर फुलवारी रख।। जैसे मिसरी घोली हो। बोली मीठी प्यारी रख।। करजा लेने दैने की। दूर अलग बीमारी रख।। नंगा नाचे सङकों पर। कुछ तो परदादारी रख।। बात सही तेरी लेकिन। कुछ तो बात हमारी रख।। गीत गजल पढना है तो। "हीरा" फिर तैयारी रख।। . परिचय :-  डाॅ. राधेश्याम गोयल, प्रचलित नाम डाॅ. "हीरा" इन्दौरी  जन्म दिनांक : २९ - ८ - १९४८ शिक्षा : आयुर्वेद स्नातक साहित्य लेखन : सन १९७० से गीत, हास्य, व्यंग्य, गजल, दोहे लघु कथा, समाचार पत्रों मे स्वतंत्र लेखन तथा विभिन्न पत्रिकाओं में रचनाओं का पचास वर्षों से प्रकाशन अखिल भारतीय कविसम्मेलन, मुशायरों में शिरकत कर रचना पाठ, आकाशवाणी तथा दूरदर्शन पर रचना पाठ विभिन्न साहित्यिक सामाजिक संस्थाओं द्वारा सम्...
अंजुमन छोड दे
ग़ज़ल

अंजुमन छोड दे

प्रमोद त्यागी (शाफिर मुज़फ़्फ़री) (मुजफ्फरनगर) ******************** इस नये हिंद की अंजुमन छोड दे अब तु अपना पुराना चलन छोड दे सिर्फ मिट्टी नहीं हर गुल है अज़ीज़ ख़ुशबू बन के महक या चमन छोड दे टुकड़े टुकड़े बिखर जायेंगे जिस्म के बंद मुठ्ठी के चैनों-अमन छोड दे नाज़ है जिन परों पे उखड जायेंगे ख़ैर है अब इसी में गगन छोड दे दोस्ती में दगा की जो आदत तेरी तु जो करता रहा आदतन छोड़ दे इश्क करना तुझे ना हो मुमकिन अगर फिर ये झूठी मुहब्बत का फन छोड़ दे सब कुर्बान है इस वतन के लिए "शाफिर" के लिए बस कफन छोड़ दे . परिचय :- प्रमोद त्यागी (शाफिर मुज़फ़्फ़री) ग्राम- सौंहजनी तगान जिला- मुजफ्फरनगर प्रदेश- उत्तरप्रदेश आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताए...
कोई हमारा न हो सका
ग़ज़ल

कोई हमारा न हो सका

शरद जोशी "शलभ" धार (म.प्र.) ******************** हमको कभी किसी का सहारा न हो सका।। दरिया ए इश्क में कई गोते लगा लिए अपने क़रीब कोई किनारा न हो सका।। मिलने की कोशिशें भी कई उनसे की मगर उनकी नज़र का कोई इशारा न हो सका कितना उनसे प्यार उन्हें कैसे हम कहें उनसे ज़ियादा कोई प्यारा न हो सका।। दिल में हमारे हर लम्हा उनका मुक़ाम है उनसा मुक़ीम कोई दुबारा न हो सका ग़र नहीं तो ज़िन्दगी जीना मुहाल है। उनके बिना"शलभ"का गुज़ारा न हो सका।। . परिचय :- धार (म.प्र.) निवासी शरद जोशी "शलभ" कवि एवंं गीतकार हैं। विधा- कविता, गीत, ग़ज़ल। आप विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं द्वारा वाणी भूषण, साहित्य सौरभ, साहित्य शिरोमणि, साहित्य गौरव सम्मान से सम्मानित हैं। म.प्र. लेखक संघ धार, इन्दौर साहित्य सागर इन्दौर, भोज शोध संस्थान धार आजीवन सदस्य हैं। आप सेवानिवृत्त शिक्षक हैं, अखिल भारतीय साहित्य परिषद धार (म.प्र.) के जिला अध्...
उनसे कह दो
ग़ज़ल

उनसे कह दो

प्रमोद त्यागी (शाफिर मुज़फ़्फ़री) (मुजफ्फरनगर) ******************** उनसे कह दो फिर दिलकश बाहर लाया हूँँ लुट गया था जो उनका करार लाया हूँँ उनको देख लूँ बस इतनी सी तमन्ना लेकर जिंदगी से मैं कुछ लम्हे उधार लाया हूँँ उदास क्यों हो क्या जख्म देने बाकी है कदम बढ़ाओ खंजर लो आबदार लाया हूँँ यकीं नहीं तो बस एक नजर काफी है अपनी गुमनामी का एक इश्तिहार लाया हूँँ नुमाइश क्या करूं छोड़ो भी छिपे रहने दो हजारों जख्म है उनमें से बस दो-चार लाया हूँँ मयकदे में जो आया तो तन्हाँ नहीं आया साथ मैं और भी इश्क के बीमार लाया हूँँ इबादत कर रहा हूं मानकर उनको खुदा "शाफिर" तिजारत वो करें उनके लिए बाजार लाया हूँँ . परिचय :- प्रमोद त्यागी (शाफिर मुज़फ़्फ़री) ग्राम- सौंहजनी तगान जिला- मुजफ्फरनगर प्रदेश- उत्तरप्रदेश आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित क...
दर्द-ए-ग़म
ग़ज़ल

दर्द-ए-ग़म

डॉ. बीना सिंह "रागी" दुर्ग छत्तीसगढ़ ******************** जब भी दर्द-ए-ग़म मिला हम सोचते रहे कब कैसे और कब मिला हम सोचते रहे शायद उम्मीद ए वफ़ा लगा रखी थी हमने मिली बेवफाई तो वजह हम खोजते रहे राज ए मोहब्बत जो ना बता सके उसे ख्वाबों में उससे बाराहा हम बोलते रहे रूख ए मौसम साखे गुल सा बदन मेरा यू अर्रजे नियाजी इश्क को हम रोकते रहे इश्क मोहब्बत माना एक छलावा है बीना गुनहगार समझ खुद को ही हम कोसते रहे. परिचय :- डॉ. बीना सिंह "रागी" निवास : दुर्ग छत्तीसगढ़ कार्य : चिकित्सा रुचि : लेखन कथा लघु कथा गीत ग़ज़ल तात्कालिक परिस्थिति पर वार्ता चर्चा परिचर्चा लोगों से भाईचारा रखना सामाजिक कार्य में सहयोग देना वृद्धाश्रम अनाथ आश्रम में निशुल्क सेवा विकलांग जोड़ियों का विवाह कराना उपलब्धि : विभिन्न संस्थाओं द्वारा राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मान द्वारा सम्मानित टीवी ...
रिश्ता मेरा
ग़ज़ल

रिश्ता मेरा

विवेक सावरीकर मृदुल (कानपुर) ****************** यहां के हर बाशिंदे से है रिश्ता मेरा मैं नहीं जानता एनआरसी क्या है सफर भर अपना शहर साथ रखो फिर मुंबईया औ बनारसी क्या है? दिल को समझा दो प्यार की बोली हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू , फारसी क्या है? झूमो, नाचो कि अब तक जिंदा हो जिंदगी रक्खी उधार-सी क्या है ? जम्हूरियत बाँटने पर हो आमादा ये जुनूनी आरजू बेकार-सी क्या है . परिचय :-  विवेक सावरीकर मृदुल जन्म :१९६५ (कानपुर) शिक्षा : एम.कॉम, एम.सी.जे.रूसी भाषा में एडवांस डिप्लोमा हिंदी काव्यसंग्रह : सृजनपथ २०१४ में प्रकाशित, मराठी काव्य संग्रह लयवलये, उपलब्धियां : वरिष्ठ मराठी कवि के रूप में दुबई में आयोजित मराठी साहित्य सम्मेलन में मध्यप्रदेश का प्रतिनिधित्व, वरिष्ठ कला समीक्षक, रंगकर्मी, टीवी प्रस्तोता, अभिनेता के रूप में सतत कार्य, हिंदी और मराठी दोनों भाषाओं में समान रूप से लेखन। संप्रति : माख...
विरह का रोग
ग़ज़ल, दोहा

विरह का रोग

रजनी गुप्ता "पूनम" लखनऊ ******************** मुझको देखो आज फिर, लगा विरह का रोग। पिय बिन सूना साज फिर, लगा विरह का रोग। जोगन बनकर फिर रही, गाऊँ विरहागीत, भूल गई सब काज फिर, लगा विरह का रोग। बिसरी जग की रीत सब, खुद से हूँ अनजान। छुपा रही सब राज फिर, लगा विरह का रोग। प्रियतम जब से दूर हैं, बिखरा सब शृंगार। हृदय पड़ी है गाज फिर, लगा विरह का रोग। 'रजनी' तेरी याद में, तड़प रही दिन-रात। भूल गई सब लाज फिर, लगा विरह का रोग।। . परिचय : नाम :- पूनम गुप्ता साहित्यिक नाम :- रजनी गुप्ता 'पूनम' पिता :- श्री रामचंद्र गुप्ता पति :- श्री संजय गुप्ता जन्मतिथि :- १६जुलाई १९६७ शिक्षा :- एम.ए. बीएड व्यवसाय :- गृहणी प्रकाशन :- हिंदी रक्षक मंच इंदौर म.प्र. के  hindirakshak.com पर रचना प्रकाशन के साथ ही कतिपय पत्रिकाओं में कुछ रचनाओं का प्रकाशन हुआ है सम्मान :- समूहों द्वारा विजेता घोषित किया जाता रहा है। ...
काँटों ने महक
ग़ज़ल

काँटों ने महक

प्रमोद त्यागी (शाफिर मुज़फ़्फ़री) (मुजफ्फरनगर) ******************** काँटों ने महक दर्द ने आराम दिया है बोसा जो उसनें आज खुलेआम दिया है आगोश में शर्मा के वो आयें हैं इस कदर जैसे की किसी फर्ज़ को अंजाम दिया है अहसान दर्द का है जो हासिल हूए हमें मर जाते ख़ुशी से इन्होंने थाम लिया है साजिश है कोई या मेरे अब दिन बदल गये दुश्मन ने आज भर के मुझे जाम दिया है पैमाना जो ख़ाली मेरे लब से लगा रहा दुनिया ने इसे मयकशी का नाम दिया है उसनें जो निभाई है मुहब्बत में तिजारत हमनें भी उसको दाम सुबह शाम दिया है तुफान बहुत तेज है "शाफिर" जरा संभल हल्दी सी इक आहट ने ये पैगाम दिया है . परिचय :- प्रमोद त्यागी (शाफिर मुज़फ़्फ़री) ग्राम- सौंहजनी तगान जिला- मुजफ्फरनगर प्रदेश- उत्तरप्रदेश आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मं...
साँसों में सरगम सी
ग़ज़ल

साँसों में सरगम सी

नफे सिंह योगी मालड़ा सराय, महेंद्रगढ़ (हरि) ******************** साँसों में सरगम सी बहती। दिल की हर धड़कन में रहती।। जब थक जाता चलते-चलते। मत रुकना मन ही मन कहती।। खुशियाँ छा जाती आँगन में। जब तुम चिड़िया बनके चहती।। होंठों पर मुस्कान बिठाकर। हँस-हँस दुख, दर्दों को सहती।। रोशन रखती घर, आंगन को। जगमग दीये की ज्यों दहती।। घर से दूर, पिया सरहद पर। सोच इसी गम में है गहती।। यादों की कच्ची दीवारें। रोज नफे की बनती ढहती।। . परिचय : नाम : नफे सिंह योगी मालड़ा माता : श्रीमती विजय देवी पिता : श्री बलवीर सिंह (शारीरिक प्रशिक्षक) पत्नी : श्रीमती सुशीला देवी संतान : रोहित कुमार, मोहित कुमार जन्म : ९ नवंबर १९७९ जन्म स्थान : गांव मालड़ा सराय, जिला महेंद्रगढ़(हरि) शैक्षिक योग्यता : जे .बी .टी. ,एम.ए.(हिंदी प्रथम श्रेणी) अन्य योग्यताएं : शिक्षा अनुदेशक कोर्स शारीरिक प्रशिक्षण कोर्स योगा कोर्स मे...
जमीर बेचकर
ग़ज़ल

जमीर बेचकर

शाहरुख मोईन अररिया बिहार ******************** जमीर बेचकर रकासो के बाजार में आ जाऊ, बुजदिल नहीं जो तेरे अख़्तियार में आ जाऊ। जब तलक लिखूंगा, सच्चाई ही लिखूंगा, वो प्यादा नहीं मैं, तेरे साथ सरकार में आ जाऊ। ये सच है तुम हमें दहस्तगर्द बना दोगे, क्या पता बनावती खबरों के साथ अख़बार में आ जाऊ। बेईमानों गद्दारों के साथ नहीं चलता मुझे, मुफलिसी में बेशक, सरे बाजार में आ जाऊ। जमीन दोज हो जाएगी, तेरे जुल्म की ईमारत, बांध के जो मैं सर पे, दस्तार में आ जाऊ। सबसे अफजल है मालिक मेरा जहां में शाहरुख़, खताए सारी माफ अदब से जो, उसके दरबार में आ जाऊ। . लेखक परिचय :- शाहरुख मोईन अररिया बिहार आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहान...
टैलेंट चाहिए
ग़ज़ल

टैलेंट चाहिए

आशीष तिवारी "निर्मल" रीवा मध्यप्रदेश ******************** चेहरे के हाव भाव, इनोसेंट चाहिए ब्वायफ्रेंड उनको डिफरेंट चाहिए। हसरतें भी यूँ शेष ना रहें कोई भी होनी डिमाण्ड पूरी, अर्जेंट चाहिए। हो रिच पर्सन ही ब्वॉयफ्रेंड उनका घूमने हेतु इनोवा-परमानेंट चाहिए। दारु संग सिगरेट भी पीती हैं मैडम दुर्गंध ना आए इसलिए, सेंट चाहिए। रोज तोड़ कर जोड़ रही हैं दिल को ऐसी नीचता के लिए, टैलेंट चाहिए। गर्लफ्रेंड रखना है सस्ता काम नहीं क्रेडिट कार्ड, कैश में पेमेंट चाहिए। फेसबुक पर फालोवर्स भी लाखों में हर पिक में लाईक्स, कमेंट चाहिए।   परिचय :- कवि आशीष तिवारी निर्मल का जन्म मध्य प्रदेश के रीवा जिले के लालगांव कस्बे में सितंबर १९९० में हुआ। बचपन से ही ठहाके लगवा देने की सरल शैली व हिंदी और लोकभाषा बघेली पर लेखन करने की प्रबल इच्छाशक्ति ने आपको अल्प समय में ही कवि सम्मेलन मंच, आकाशवाणी, पत्र-पत्रिका...
मेरी आवारगी
ग़ज़ल

मेरी आवारगी

धैर्यशील येवले इंदौर (म.प्र.) ******************** मेरी आवारगी को पनाह दे अपने दिल मे जगह तो दे थक चुका अब ये बंजारा रिश्ते को कोई नाम तो दे प्यार के सिवा कुछ नही आता जीने के कुछ उसूल सीखा तो दे इस शहर में हूँ मैं नया नया शीशे का दिल कहा रखु पता तो दे जख्म हरे है सुखाना चाहता हूँ थोड़ी सी तेरे होंठो की नमी तो दे . परिचय :- नाम : धैर्यशील येवले जन्म : ३१ अगस्त १९६३ शिक्षा : एम कॉम सेवासदन महाविद्याल बुरहानपुर म. प्र. से सम्प्रति : १९८७ बैच के सीधी भर्ती के पुलिस उप निरीक्षक वर्तमान में पुलिस निरीक्षक के पद पर पीटीसी इंदौर में पदस्थ। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17...
बाती में जब …
ग़ज़ल

बाती में जब …

रशीद अहमद शेख 'रशीद' इंदौर म.प्र. ******************** बाती में जब कभी समाहित होता स्नेह! दीपशिखा से तभी प्रकाशित होता स्नेह! उस बस्ती में कभी नहीं रहता है चैन, जिस बस्ती से अगर विलोपित होता स्नेह! लाभ उठाते धरा निवासी सारे लोग, हर सरिता से सतत् प्रवाहित होता स्नेह! कालजयी हैं अनुपम हैं वे सब रचनाएँ, जिनसे जग में नित्य प्रसारित होता स्नेह! महिला कोई प्रसू कहाती है जिस रोज़, अविभाजित है मगर विभाजित होता स्नेह! कलह नहीं हो सकती हावी उस घर में! निशि-दिन प्रति क्षण जहाँ विराजित होता स्नेह! उल्फ़त के ही दीप जलाया करो ''रशीद' नफ़रत से हर ओर समापित होता स्नेह! . लेखक परिचय :-  नाम ~ रशीद अहमद शेख साहित्यिक उपनाम ~ ‘रशीद’ जन्मतिथि~ ०१/०४/१९५१ जन्म स्थान ~ महू ज़िला इन्दौर (म•प्र•) भाषा ज्ञान ~ हिन्दी, अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्कृत शिक्षा ~ एम• ए• (हिन्दी और अंग्रेज़ी साहित्य), बी• एससी•, बी•...
मुहब्बत में …
ग़ज़ल

मुहब्बत में …

तबस्सुम अश्क़ उज्जैन ******************** मुहब्बत में मुझे इतना बहुत है तेरा ख़्वाबो में ही मिलना बहुत है तुझे मंज़िल मिले मेरी दुअ़ा से मेरे हक़ में तो ये रस्ता बहुत है न मुझसे दूरियां इतनी बढ़ाओ ये दिल पहले से ही तन्हा बहुत है तू मुझको देख ले तुझको मै देखूं हमारा बस यही रिश्ता बहुत है समझता है बड़ा ख़ुद को जो यारों हक़ीक़त में वही छोटा बहुत है ज़ियादा कुछ नहीं है मेरी ख़्वाहिश तू जितना प्यार दे उतना बहुत है किसी के इश्क़ में टूटा हुआ है वो हर इक बात पे हंसता बहुत है अभी से उंगलियां थकने लगी है मुहब्बत पर अभी लिखना बहुत है न समझो तो ग़ज़ल ज़ाया है पूरी अगर समझो तो इक मिस्रा बहुत है . लेखक परिचय :- तबस्सुम अश्क़ उज्जैन आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, ...
आईना चांद को …
ग़ज़ल

आईना चांद को …

शरद मिश्र 'सिंधु' लखनऊ उ.प्र. ********************** बतौरे खास भी कहना न कभी आया है। मगर वो कहता है हमने भी गजल गाया है। शहर में आज मेरे फिर उसी की आमद है, हवाओं ने ही हमें यह खबर सुनाया है। ये रंग इंद्रधनुष का व चमन की खुशबू, वो आ गया है तो मेरे लिए ही आया है। कभी फिर होगी बात पूजा और सजदे की, मुझे वहीं वो मिला सर जहां झुकाया है। वो मेरे साथ ही रहने को अमादा अचरज, सोचता था कि उसे मैंने खुब सताया है। लुटाता ही रहा हूं प्यार मुहब्बत लोगों, वही लुटाया है हमने जो सदा पाया है। बनी शागिर्द जमाने में "सिंधु" की लहरें, आईना चांद को जब भी कभी दिखाया है। . लेखक परिचय :-  नाम - शरद मिश्र 'सिंधु' उपनाम - सत्यानंद शरद सिंधु पिता का नाम - श्री महेंद्र नारायण मिश्र माता का नाम - श्रीमती कांती देवी मिश्रा जन्मतिथि - ३/१०/१९६९ जन्मस्थान - ग्राम - कंजिया, पोस्ट-अटरामपुर, जनपद- प्रयाग राज (इलाहाबाद) नि...
बस यूं ही …
ग़ज़ल

बस यूं ही …

शरद मिश्र 'सिंधु' लखनऊ उ.प्र. ********************** इस तरह से चलो जिया जाए। घाव दिल के सभी सिया जाए। एक आंधी न हैं कई शायद, हर तरफ दीप रख लिया जाए। हम जुटाएं जरूर असि पर वह, बंदरों को नहीं दिया जाए। पथ निहारें न सदा शंकर का, विष स्वयं भी कभी पिया जाए। लांघने पर अवश्य दें उत्तर, जुल्म की हद बना लिया जाए। चाहता हूं गजल कहूं लेकिन, भागता दूर काफिया जाए। बन गए रूप का हिमालय वो, चांद को भी गगन दिया जाए। "सिंधु" वह चांद हारकर देगा, रार नभ से चलो किया जाए . लेखक परिचय :-  नाम - शरद मिश्र 'सिंधु' उपनाम - सत्यानंद शरद सिंधु पिता का नाम - श्री महेंद्र नारायण मिश्र माता का नाम - श्रीमती कांती देवी मिश्रा जन्मतिथि - ३/१०/१९६९ जन्मस्थान - ग्राम - कंजिया, पोस्ट-अटरामपुर, जनपद- प्रयाग राज (इलाहाबाद) निवासी - पारा, लखनऊ, उ. प्र. शिक्षा - बी ए, बी एड, एल एल बी कार्य - वकालत, उच्च न्यायालय खंडपीठ लखन...
फिर कोई …
ग़ज़ल

फिर कोई …

प्रमोद त्यागी (शाफिर मुज़फ़्फ़री) (मुजफ्फरनगर) ******************** फिर कोई इंतजाम हो जाए झुक के उनको सलाम हो जाये मौत के खेल में कुछ ऐसा हो ज़िंदगी महंगे दाम हो जाये छोड़ो खुशियों को आगे जाने दो गमों का एहतराम हो जाये वो पियें तो शौक है उनका मैं पियूं तो हराम हो जाये यहाँँ जो है सब खुदा का है चलो एक एक जाम हो जाये अभी ठहरा हूँँ आ गले लग जा सफर न यूं ही तमाम हो जाये हमें आजमानेंं वो आयें "शाफिर" और अपना भी काम हो जाये . लेखक परिचय :- प्रमोद त्यागी (शाफिर मुज़फ़्फ़री) ग्राम- सौंहजनी तगान जिला- मुजफ्फरनगर प्रदेश- उत्तरप्रदेश आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमेंhindirakshak17@gmail.com...
बस यूं ही …
ग़ज़ल

बस यूं ही …

शरद मिश्र 'सिंधु' लखनऊ उ.प्र. ********************** दग्ध चमन। है अनबन। गजल महज, पैनापन। उर्वर है, यह कन कन। वीणा की गूंज सघन। सूरज तुम, किरन किरन। पायल बस, छनन छनन। नारों में, हल्कापन। नेता का सिर्फ कथन। आंखों में, आग तपन। व्यथित देख, जन गन मन। देखें क्या, सूर नयन। भारत का, तन मन धन। "सिंधु" महज, अब न उफन। . लेखक परिचय :-  नाम - शरद मिश्र 'सिंधु' उपनाम - सत्यानंद शरद सिंधु पिता का नाम - श्री महेंद्र नारायण मिश्र माता का नाम - श्रीमती कांती देवी मिश्रा जन्मतिथि - ३/१०/१९६९ जन्मस्थान - ग्राम - कंजिया, पोस्ट-अटरामपुर, जनपद- प्रयाग राज (इलाहाबाद) निवासी - पारा, लखनऊ, उ. प्र. शिक्षा - बी ए, बी एड, एल एल बी कार्य - वकालत, उच्च न्यायालय खंडपीठ लखनऊ सम्मान - सर्वश्रेष्ठ युवा रचनाकार २००५ (युवा रचनाकार मंच लखनऊ), चेतना श्री २००३, चेतना साहित्य परिषद लखनऊ, भगत सिंह सम्मान २००८, शिव सिंह सरोज ...