आखिर नाक का सवाल
डॉ. मुकेश ‘असीमित’
गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
********************
इस विचित्र दुनिया में, जहां हर चीज़ की अपनी एक खास पहचान होती है, वहां "नाक" ने भी अपनी एक अनोखी जगह बना ली है। अरे, यह वह नाक नहीं है जो चेहरे के बीचोबीच शान से बैठी रहती है, बल्कि यह तो उस नाक का किस्सा है जो आजकल समाज में हर जगह अपना रंग जमाए बैठी है। किसी जमाने में नाक सिर्फ सांस लेने और खुशबू महसूस करने का जरिया हुआ करती थी, लेकिन कालांतर में इसने कुछ ऐसे रूप धारण कर लिए हैं कि बस, पूछो मत! कहीं यह "नाक का सवाल" बनकर समाज में इज़्ज़त की नाव को समाज की अपेक्षाओं के भंवर जाल में डुबोने से बचाती है, तो कहीं "नाक के बाल" बनकर ज़िंदगी की जटिलताओं में उलझाती नज़र आती है। कहीं नाक कट जाने के डर से न जाने कितने गरीबों के दो वक्त के चूल्हे की रोटी ठंडी हो जाती है।
अब आप ही बताइए, जब कोई आपक...


